सौरभ अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है। वह अपनी माँ सुषमा और पिता विशाल के साथ दिल्ली में रहता है। उसके माता-पिता दोनों पेशे से डॉक्टर हैं। सौरभ दिल्ली के एक बहुत बड़े स्कूल में पढ़ता है। वह पढ़ाई में बहुत ज़्यादा होशियार नहीं है पर संगीत में उसकी बहुत रुचि है। जब भी वह गीत गाता तो उसके पिता को अच्छा नहीं लगता। वे उसे हमेशा
डाँटते व कहते," सौरभ पढ़ाई की तरफ़ ध्यान दिया कर, तुझे डॉक्टर बनना है, इन गीतों में कुछ नहीं रखा। आज के बाद तुम गाना नहीं गाओगे।"
सौरभ उदास हो जाता और कुछ भी न कह पाता क्योंकि कोई भी उसकी बात सुनने व समझने को तैयार नहीं था। दसवीं की अर्धवार्षिक परीक्षा में जब सौरभ के अंक ज़्यादा अच्छे नहीं आए तो उसके पिता ने उसे खूब जली-कटी सुनाई कि वह जिन्दगी में कभी कुछ नहीं कर सकता। हमारे ख्वाब को भी पूरा नहीं कर सकता। पढ़ने में ध्यान लगाओ। इन सब बातों से सौरभ तनावग्रस्त रहने लगा। उसकी रुचि डॉक्टर बनने में नहीं थी। वह तो गीतकार बनना चाहता है। पर पिता की कही बातें उसे अंदर- ही- अंदर तोड़ रही थीं कि तभी एक प्रतियोगिता में भाग लेने का उसे अवसर मिला। उसने अपने पिता से बात की तो उन्होंने साफ़ मना करते हुए उसे खूब जली कटी सुनाई। सौरभ उस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहता था। उसकी माँ ने उसका साथ दिया और उसने अपनी आवाज़ से सबका दिल जीत लिया। प्रतियोगिता में उसे प्रथम स्थान प्राप्त हुआ और उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। राजीव और सुषमा को ढेरों बधाइयाँ मिलीं। राजीव की सोच में भी बदलाव आया कि ज़रूरी नहीं हर बच्चा डॉक्टर या इन्जीनियर ही बने। बच्चों के सपनों को पंख दें तो वे किसी भी क्षेत्र में अपना नाम रोशन कर सकते हैं। उन्होंने भी सौरभ का साथ दिया और संगीत अकेडमी में उसका दाखिला करवाया। आगे चलकर सौरभ एक बहुत बड़ा गीतकार बना और उसने अपने माता-पिता का नाम रोशन किया।
स्वरचित
रचना गुलाटी
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