बांझपन

 रीना — यह नाम सारे मोहल्ले में आम था। मोहल्ले वालों के मुँह पर रीना का नाम हमेशा रहता था।

रीना यानी रेखा। रेखा हँसमुख और चंचल स्वभाव की महिला थी। दूसरों की सहयोग करने वाली, मिलनसार महिला। उसकी आवाज़ हर गली में गूँजती थी। मोहल्ले की हर महिला जब तक रेखा से बात नहीं कर लेती, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता।

रेखा के दो बेटे थे। बड़े बेटे की शादी 3 साल पहले हो गई थी और उसका एक बेटा भी था। रेखा उसे हर घर में लिए घूमती थी। उसके घर में पूरे दिन खुशियों की किलकारियाँ गूँजती रहती थीं।

रेखा के छोटे बेटे की शादी तय हुई थी। वह आजकल घर के कामों में व्यस्त रहती—कभी बाज़ार से सामान खरीद लाती, तो कभी घर की सफ़ाई करती। इसलिए मोहल्ले में उसका चहल-पहल वाला अंदाज़ कुछ कम हो गया था।

छोटे बेटे का बड़े धूमधाम से विवाह हुआ। घर में खूबसूरत और गुणवान बहू आई। मोहल्ले भर में उसकी प्रशंसा होने लगी। रेखा के घर में खुशियों का खजाना भर गया था। हर कोई उसके परिवार की तारीफ़ करते नहीं थकता था।

धीरे-धीरे समय बीतता गया। लगभग 3 साल हो गए, पर छोटे बेटे की कोई संतान नहीं हुई। अब रेखा परेशान रहने लगी। लोग जब छोटी बहू के बारे में पूछते तो वह क्या जवाब देती? धीरे-धीरे वह बहू पर गुस्सा करने लगी। लेकिन फिर सोचती—“यह सब तो भगवान की मर्जी है”—और गुस्सा दबा देती।

छोटी बहू अंदर ही अंदर घुटने लगी। जब घर में इस तरह की बातें होतीं, तो वह रोने लगती। अब घर के सभी लोग उसे ताने देने लगे। पर बहू क्या कर सकती थी?

रेखा ने हर जतन किए। हर मंदिर में जाकर मन्नत माँगी, पर सब विफल रहे। जिस घर में कभी किलकारियाँ गूँजती थीं, आज वहाँ मायूसी छा गई थी।

रेखा का छोटा बेटा, अमन, पास के शहर में नौकरी करता था। जब भी छुट्टी पर आता, यह सब देखकर दुखी हो जाता। वह अपनी पत्नी का दर्द समझता था। उसने तय कर लिया कि वह पत्नी को अपने साथ शहर ले जाएगा।

अमन जब ड्यूटी पर चला जाता, तो उसकी पत्नी अकेली घर पर परेशान रहती और अंदर ही अंदर रोती। ससुराल में उसे हर सुख मिला, पर एक महिला का सबसे बड़ा दुख—बांझपन—उसे सहना पड़ा।

एक दिन उसने अपने दोस्त को अपना दर्द बताया। दोस्त ने कहा—
“तुम किसी डॉक्टर की सलाह लो। हमारे शरीर में बहुत सी कमज़ोरियाँ होती हैं, जिनका इलाज संभव है।”

अगले दिन अमन और उसकी पत्नी, प्रिया, डॉक्टर के पास गए और अपनी समस्या बताई। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट कराए और कहा—
“चिंता की कोई बात नहीं है। आपको संतान सुख मिल सकता है। इसके लिए हमें आईवीएफ प्रणाली का सहारा लेना पड़ेगा।”

अमन और प्रिया ने सहमति दी। सही समय पर इलाज हुआ और प्रिया को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

जब यह खबर घर पहुँची, तो खुशी का ठिकाना न रहा। जो लोग कभी ताने देते थे, उनके सिर शर्म से झुक गए। हर किसी की आँखों में खुशी के आँसू थे।

जो कलंक प्रिया ने सालों तक सहा, उसका अंत हुआ और उसे संतान का सुख मिल गया।


संदेश:
यह कहानी उन महिलाओं की है, जो ऐसी समस्याओं से जूझती हैं और डॉक्टर की सलाह लेने की बजाय सिर्फ़ देवी-देवताओं में विश्वास करती हैं। हमें नियत समय पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि हमारे शरीर की बहुत सी बीमारियाँ और समस्याएँ डॉक्टर की मदद से हल हो सकती हैं।


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