सीतापुर में आज बहुत गहमागहमी वाली शांति थी। पूरा बाज़ार खचाखच भीड़ से भरा हुआ था। क्यों न हो! कल होली जो थी। सारे लोग खरीदारी में लगे हुए थे।
शर्मा जी के घर पर भी ऐसा ही माहौल था। पकवानों की तैयारी चल रही थी। उनकी खुशबू आज शाम से ही मिलने लगी थी। खुशबू ने माहौल को और भी मस्त बना दिया था। शर्मा जी गाँव के नामचीन व्यक्ति थे। ईश्वर की बड़ी कृपा थी उन पर—तीन बेटे और दो बेटियों से भरा पूरा परिवार, धार्मिक आस्थाओं वाली अर्धांगिनी, गाँव में इज्ज़त और पंचायत में प्रतिष्ठा—क्या नहीं था उनके पास!
लेकिन अफसोस, आज दोनों पति-पत्नी बिस्तर पर पड़े थे। होली के माहौल में कोई भी खुद से उठने लायक नहीं था। और फिर उठे भी तो क्या करें?
इंजीनियर बेटे ने आने से साफ़ मना कर दिया। सबसे छोटे बेटे ने हाल ही में अमेरिका में नौकरी पकड़ ली थी। लिहाज़ा, जब तक ग्रीन कार्ड नहीं मिलता, उसका आना संभव नहीं था। बेटियाँ ब्याही जा चुकी थीं, अब अपने ससुराल में थीं।
मध्यम बेटे अरुण ने अंतरजातीय विवाह कर लिया था, इसलिए वह शर्मा जी की नज़रों से गिर गया। वहीं सीतापुर में रहकर वह कचहरी में मुंशियाई का काम करता था। इतना दौलतमंद और प्रतिष्ठित परिवार का बेटा गरीबी में ज़िंदगी गुजार रहा था। पर उसने अपनी ज़िम्मेदारियों से कभी मुँह नहीं मोड़ा। भले ही माता-पिता से दूर किराए के मकान में रहता, पर शर्मा जी और उनकी पत्नी की देखभाल वही करता।
वे अपने इस बेटे की कर्मठता से चिढ़ते थे। पर सच यह था कि बिस्तर पर पड़े-पड़े वे उसी बेटे के सहारे अपने जीवन के अंतिम दिन काट रहे थे। जिन बेटों पर शर्मा जी ने आजीवन गुमान किया, उनमें से एक भी इस अवस्था में पास नहीं था।
शर्माइन तो आखिर माँ ही थीं। नौकर-चाकर से भरे पूरे परिवार में अरुण एक नौकर की ही ज़िंदगी जी रहा था।
भूले-भटके, शर्मााइन को भी लगता था कि पर्व के दिन मेरा बेटा और उसका परिवार कैसे मनाएँगे? बेचारा किस हाल में होली मनाएगा? अपनी दोनों बेटियों के लिए कपड़े खरीद भी पाया होगा या नहीं? बहू मीरा को नई साड़ी भी दिला पाया होगा या नहीं? अब ऐसे में होली की क्या खुशी!
होली की तड़के सुबह जैसे ही बिस्तर पर शर्मा जी ने राम भजन समाप्त किया, किसी ने बाहरी गेट पर दस्तक दी। इतने सवेरे कौन हो सकता है? नौकर ने दरवाज़ा खोला। सामने उनकी मंझली बहू मीरा खड़ी थी, हाथ में मुट्ठीभर सामान और साथ में दो बच्चियाँ।
नौकर ने जाकर शर्मा जी को खबर दी। शर्मा जी ने जैसे ही सुना, उनका तेवर सातवें आसमान पर पहुँच गया। नौकर से बोले—
“पूछ तो रामू, किसलिए आई है? वह भी आज के दिन! होली में कुछ चाह रही है क्या?”
शर्माइन ने मामले की गंभीरता को समझा और रामू से बोलीं—
“जा, पहले अंदर ले आ। इन्हें कुछ मत पूछ, इन्हें इधर ले आ।”
बहू मीरा ने सारा दुखद हाल सुनाया कि अरुण कई दिनों से अस्पताल में भर्ती था। खून की उल्टियाँ आ रही थीं। अब जब पैसे खत्म हो गए तो बहू उनके पास मदद को आई थी।
शर्मा जी ने यह दुखद समाचार सुनकर सबसे पहले यही कहा—
“हमारी सुनी होती तो आज यह दिन न देखना पड़ता! होली का दिन है। मेहमान लोग देख रहे हैं। अस्पताल वाले नवाब साहब को और इन बच्चियों का चेहरा दिखाकर लूटने आई है क्या तू?”
शर्माइन भी मौन रहकर शर्मा जी की बातों से सहमत हो गईं। फिर कुछ सोचकर बोलीं—
“आज के दिन ऐसे सड़क पर घूमेगी तो लोग क्या कहेंगे? आज के दिन कम से कम इस घर की इज्ज़त का ख्याल कर लो। बाकी कल से जो मन हो, करना।”
फिर रामू को आदेश दिया गया कि वह अस्पताल जाकर सही जानकारी ले आए।
होली के माहौल में दुख का रंग पड़ चुका था। एक तरफ़ शर्मा जी और उनकी पत्नी को मेहमानों की फिक्र थी, तो दूसरी तरफ़ बेटे की चिंता भी।
चार घंटे बाद रामू वापस लौटा तो खबर अच्छी नहीं थी। डॉक्टर लोग हाथ खड़े कर चुके थे। मंझला बेटा अरुण अब बचना संभव नहीं था। टी.बी. अपने चरम पर थी और उसकी जान लेने पर आमादा।
शर्मा जी ने यह बात और किसी को न बताने की रामू को कसम दी। होली की शाम जैसे-तैसे बीती।
अगले दिन अस्पताल से खबर आई कि अरुण रात में ही चल बसा। उस वक्त अस्पताल में वह अकेला था, कोई भी नहीं था साथ।
घर पर जब उसकी लाश आई तो औपचारिकता ही बाकी रह गई। बेटे का अंतिम संस्कार तो शायद उस दिन ही हो गया था जब उसने अंतरजातीय विवाह किया था।
आसपास के लोग भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे।
शर्मा जी की सबसे छोटी बेटी ने पूछा—
“माँ, बाबूजी को यहाँ क्यों ले आए हो? अपने घर चलो न। यहाँ हमारा क्या है?”
तो माँ ने जवाब दिया—
“बिट्टो, यहाँ पहले भी हमारा कुछ नहीं था और आज भी नहीं है। पर जो इनका है—तुम्हारे दादा-दादी का—उसे लौटाना हमारा ही काम है। इन्हें इनका बेटा लौटाना भी तो ज़रूरी है।”
मोहल्ले वाले सारा तमाशा देख रहे थे। कानाफूसी चल रही थी—
“बेटे का कैसा विरोध किया शर्मा जी ने कि आज बेटा उनका वापस तो आया, पर बिना प्राण के! क्या नहीं किया इस बेटे ने इन बूढ़े माँ-बाप के लिए। देखो, जान तक दे दी। ऐसे माँ-बाप शत्रुओं को भी न मिलें।”
बहू मीरा अपनी बेटियों के साथ लाश वहीं छोड़कर चली गई। फिर किसी ने उन तीनों को दोबारा नहीं देखा।
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