कुछ लोग अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने के बाद गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं।इसी मुहावरे से सम्बन्धित कहानी प्रस्तुत है।
हमारे पड़ोस में गुप्ता दम्पत्ति रहते थे।मनोज गुप्ता और सुमन गुप्ता उनका नाम था। दोनों ही पति -पत्नी काफी हँसमुख और मिलनसार थे।जीवन में बस एक औलाद की कमी थी।समय के साथ इसे भी ईश्वर की इच्छा समझकर अपने दिल को बहला लिया।सुमन जी से यदा-कदा मेरी भेंट हो जाया करती थी।
एक दिन सुमन जी ने मुझे खुशी से बताते हुए कहा -"सुनो! अब मेरी छोटी बहन मधु अपने पति और बच्चों के साथ मेरे घर के ऊपर में रहने लगी है।उसके पति का व्यवसाय में अचानक काफी नुकसान हो गया है,तो उसके दोनों बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी हमने ही ले ली है!"
इसपर मैंने कहा -"सुमन जी!इससे तो अच्छा था कि आप एक बच्चे गोद ही ले लेतीं!"
मेरी बातों से असहमत होते हुए सुमन जी ने कहा -"अरे!गोद लेने का दिखावा क्या करना!ये दोनों बच्चे भी तो अपने ही हैं।इनसे तो खून का रिश्ता है।ये हमें कभी भूलेंगे थोड़े ही।"
मैंने उनसे कुछ और कहकर उनका दिल दुखाना नहीं चाहा और अपने घर आ गई। परन्तु पड़ोस में होने के कारण उनके बारे में मेरे पास सभी जानकारी रहती।इतना तो सत्य अवश्य था कि उनलोगों के आ जाने से सुमन जी का खामोश घर अब गुलजार रहने लगा था।उनकी ठहरी हुई ज़िन्दगी में रवानगी आ गई थी।उनके अकेलेपन की उदासीपन की पीड़ा धीरे-धीरे छँटने लगी।दोनों बच्चे भी उन्हें अपने माता-पिता से ज्यादा प्यार करते थे।बहन मधु भी मीठी बोलियों का पिटारा लिए बहन-बहनोई के आगे-पीछे डोलती रहती।ऐसा महसूस होता मानो सुमन जी की रेगिस्तान-सी सूखी जिन्दगी में बरबस जीवनदायिनी फुहारें आ गईं हों।बच्चों के आ जाने से सुमन दम्पत्ति को जिन्दगी जीने का मकसद मिल गया।
देखते-देखते समय में दिन-पर-दिन जुड़ते चले गए और समय पंख लगाकर उड़ चला।एक दिन सुमन जी हँसती-खिलखिलाती बड़ा सा मिठाई का डिब्बा लेकर आईं।मैने उत्सुकता से पूछा -" सुमन जी!किस खुशी की मिठाई है?"
सुमन जी ने भावविभोर होते हुए कहा-"मेरी बहन की बेटी मेधा बैंक में ऑफिसर बन गई है!"
मैंने उन्हें बधाई दी।सुमन जी जितनी देर तक मेरे घर बैठी रहीं उतनी देर तक अपनी बहन मधु उसकी बेटी मेधा और उसका बेटा अनूप की प्रशंसा करतीं रहीं।उन्हें खुश देखकर मेरे शंकित मन का भी भ्रम छू-मंतर हो चुका था।
मेधा की शादी में भी सुमन दम्पत्ति दिल खोलकर खर्च किया।उसकी शादी में वे खुद को माँ की तरह गौरवान्वित महसूस कर रहीं थीं।बहन का बेटा अनूप इंजिनियरिंग पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना चाहता था।उसने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से सुमन जी को मना लिया।वह पढ़ाई के लिए विदेश खर्च देने को सहर्ष तैयार हो गईं,परन्तु उनके पति मनोज जी इतना खर्चा देने में आना-कानी कर रहे थे।आखिरकार पत्नी और साली की जिद्द से मजबूर होकर उन्होंने बैंक से ढ़ेर सारा कर्ज ले लिया तथा भविष्य निधि से भी पैसा निकाल लिया।
अनूप भी अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु मनोज जी और सुमन जी की खूब खुशामद करता।मनोज जी को अपनी मीठी वाणी से बहलाते हुए कहता -" मौसाजी!आप पैसों की चिन्ता मत करना।नौकरी लगते ही दो साल के अंदर सारा कर्ज चुका दूँगा।अपने दीक्षांत समारोह में बस आप दोनों को ही बुलाऊँगा।आप ही मेरे माता-पिता हो।"
सुमन दम्पत्ति उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों से उत्साहित होकर उनपर खूब खर्च करते।कुछ समय बाद मेधा को बेटी हुई उसने छठी में केवल अपने सगे माता-पिता को बुलाया,परन्तु बाँझ होने के कारण मेधा के ससुरालवालों ने सुमन जी को नहीं बुलाया।पढ़ी-लिखी होने के बावजूद मेधा ने ससुरालवालों की बात मानकर उन्हें नहीं बुलाया।इस अपमान से सुमन दम्पत्ति के दिल को गहरी ठेस लगी।
उससे भी बढ़कर चोट अनूप ने दिया।पढ़ाई पूरी होने पर दीक्षांत समारोह में अपने सगे माता-पिता को बुलाया,उन्हें पूछा तक नहीं!
दिन बदलते ही उनकी बहन ने उनसे दूर घर ले लिया।दिन फिरते ही उनलोगों ने गिरगिट की तरह रंग बदलना शुरु कर दिया।
उनलोगों के विश्वासघात से सुमन जी के दिल में वर्षों पूर्व निःसंतान होने की जो सिसकारी उठी थी,एक बार फिर विश्वासघात बनकर उनकी आँखों से फूट पड़ी।उनके पति मनोज जी ने भी अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा -" सुमन!दो-चार रातों की चाँदनी की शीतलता ही किसी रेगिस्तान की यथार्थ नहीं होती,बल्कि हमारी जिन्दगी रूपी रेगिस्तान की नियति ही है प्रचंड झुलसने की।"
सुमन जी ने पति का हाथ पकड़कर बिलखते हुए कहा-"ज़िन्दगी में अपनों से ऐसे धोखे की उम्मीद तो हमने कभी भी न की थी। हमारे स्नेह की पैनी कुल्हाड़ी से भी मेरी बहन और दोनों बच्चों का मन नहीं पिघला।हमने तो उसके पूरे परिवार की जिन्दगी बदल दी और बदले में उनलोगों ने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया।"
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा (स्वरचित)
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