संयुक्त परिवार की बहू

 रविवार की सुबह थी, लेकिन मीरा के लिए रविवार और सोमवार में कोई खास फर्क नहीं था। सुबह के सात बजते ही घर में एक अजीब सी हलचल शुरू हो चुकी थी। रसोई में कुकर की सीटियां, ससुर जी के रेडियो पर बजते पुराने गाने और सासू माँ की पूजा की घंटी—इन सब आवाजों के बीच मीरा अपनी नींद को जबरदस्ती खींचने की कोशिश कर रही थी, पर नाकाम रही। उसने रजाई मुंह से हटाई और छत को घूरते हुए बुदबुदाई, "क्या कभी इस घर में शांति मिलेगी?"

बगल में सोए उसके पति, सुमित की खर्राटों में कोई कमी नहीं थी। मीरा ने खीझकर उसे हिलाया, "सुमित, उठो। नल में पानी आ गया है, मोटर चलानी है। और बाबूजी की चाय का समय हो गया है।" सुमित ने करवट बदली और तकिए के नीचे सिर छिपा लिया। मीरा ने एक गहरी सांस ली और बिस्तर छोड़ दिया।

यह कहानी मीरा के जीवन की रोज़ की दास्तान थी। एक बड़े संयुक्त परिवार की बहू होने के नाते, उसकी दिनचर्या दूसरों की ज़रूरतों के हिसाब से तय होती थी। नाश्ते की मेज पर जब वह पराठे परोस रही थी, तो उसकी ननद ने कहा, "भाभी, आज नमक थोड़ा कम है।" मीरा ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया, लेकिन भीतर ही भीतर एक ज्वालामुखी सुलग रहा था। उसे लगता था कि उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है, बस एक मशीन है जो सुबह से रात तक चलती रहती है।

दोपहर को जब सब अपने कमरों में आराम करने चले गए, मीरा अपनी कॉलेज की सहेली वंदना के घर गई। वंदना का घर मीरा के घर से बिल्कुल उल्टा था। पॉश सोसाइटी में 10वीं मंजिल पर एक शानदार फ्लैट। वहां सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी सुनाई दे रही थी। वंदना सोफे पर पैर फैलाए एक किताब पढ़ रही थी और पास में कॉफी का मग रखा था।

"आ गई तुम? मैं तो कब से राह देख रही थी," वंदना ने मुस्कुराते हुए किताब बंद की।

मीरा ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। घर एकदम व्यवस्थित था। कोई शोर नहीं, कोई बिखरा हुआ सामान नहीं। "यार वंदना, तेरी किस्मत कितनी अच्छी है," मीरा ने सोफे पर धंसते हुए कहा। "देख, कितना सुकून है यहाँ। न सास की टोक-टाक, न ससुर जी की न्यूज़ चैनल की तेज़ आवाज़। तुम जो चाहे करो, जब चाहे उठो। मैं तो तरस गई हूँ इस शांति के लिए।"

वंदना फीका सा मुस्कुराई, "हाँ, शांति तो है। पर कभी-कभी यह शांति काटने को दौड़ती है, मीरा।"

मीरा ने उसकी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया। उसकी आँखों में तो सिर्फ आज़ादी का सपना तैर रहा था। "तू नहीं समझेगी वंदना। तुझे नहीं पता कि बीस लोगों के लिए तीन वक्त का खाना बनाना और फिर भी सुनना कि 'दाल में तड़का सही नहीं लगा', कैसा लगता है। मैं तो बस सुमित को मनाने में लगी हूँ। हम भी अलग फ्लैट लेंगे। मैं अपनी शर्तों पर जीना चाहती हूँ।"

घर लौटते ही मीरा ने सुमित से फिर वही बहस छेड़ दी। इस बार उसका इरादा पक्का था। "सुमित, अब और नहीं। या तो हम अलग घर लेंगे, या मैं कुछ दिनों के लिए मायके जा रही हूँ। मुझे भी सांस लेने के लिए जगह चाहिए।" सुमित, जो हमेशा टाल देता था, आज मीरा की आँखों में एक अलग ही दृढ़ता देख रहा था। उसे झुकना पड़ा। माता-पिता को समझाना मुश्किल था, बहुत आंसू बहे, ताने मिले, लेकिन अंततः दो महीने बाद मीरा और सुमित अपने पाँच साल के बेटे आरव के साथ एक नए फ्लैट में शिफ्ट हो गए।

शुरुआती दिन किसी सपने जैसे थे। मीरा सुबह नौ बजे उठती। सुमित और आरव के लिए हल्का नाश्ता बनाती और फिर घंटों बालकनी में बैठकर चाय पीती। कोई टोकने वाला नहीं था कि "बहू, अभी तक नहाया नहीं?" या "बहू, आज पूजा में क्या बनेगा?"। रात को वे तीनों देर तक मूवी देखते, पिज्जा मंगवाते और जब मन करता सो जाते। मीरा को लगा उसने जंग जीत ली है। वंदना को फोन करके वह घंटों अपनी नई आज़ादी के किस्से सुनाती।

लेकिन वक्त का पहिया घूमा। तीन महीने बाद सुमित को ऑफिस के काम से पंद्रह दिनों के लिए विदेश जाना पड़ा। मीरा ने कहा, "तुम जाओ, मैं सब संभाल लूँगी। अब तो हम इंडिपेंडेंट हैं।"

सुमित के जाने के दूसरे ही दिन, मौसम बदला और आरव को तेज़ बुखार हो गया। मीरा पूरी रात पट्टियां रखती रही। सुबह होते-होते, थकान और नींद की कमी से मीरा का शरीर भी टूटने लगा। उसने थर्मामीटर लगाया—उसे 102 डिग्री बुखार था।

घर में सन्नाटा था, लेकिन आज वह सन्नाटा सुकून नहीं, खौफ दे रहा था। आरव भूख से रो रहा था, "मम्मा, कुछ खाने को दो।" मीरा की हिम्मत नहीं थी कि वह बिस्तर से उठकर किचन तक जाए। उसने जैसे-तैसे मोबाइल उठाया और फूड डिलीवरी ऐप खोला, लेकिन बाहर बारिश हो रही थी और डिलीवरी में एक घंटा लगने वाला था।

तभी डोरबेल बजी। मीरा को लगा शायद कामवाली बाई आई है। वह दीवार का सहारा लेकर, लड़खड़ाते कदमों से दरवाजे तक पहुंची। गेट खोलते ही बाई ने कहा, "दीदी, आज मैं काम नहीं कर पाऊँगी, मेरी बेटी बीमार है," और चली गई। मीरा के पास उसे रोकने की ताकत नहीं थी।

वह वापस सोफे पर गिर पड़ी। आरव उसके पास आकर रोने लगा। मीरा का सिर चकरा रहा था। उसे याद आया पुराने घर का वह दिन जब वह बीमार पड़ी थी। सासू माँ ने आरव को अपने कमरे में सुला लिया था, ससुर जी ने डॉक्टर को फोन किया था, और ननद ने उसके लिए खिचड़ी बनाकर उसके सिर में तेल की मालिश की थी। उसे उस दिन पता भी नहीं चला था कि घर कैसे चला। लेकिन आज... आज उसे पानी का एक गिलास लेने के लिए भी मीलों का सफर तय करना पड़ रहा था।

शाम होते-होते आरव की तबीयत और बिगड़ गई। उसे उल्टियां होने लगीं। मीरा घबरा गई। उसने वंदना को फोन लगाया।

"वंदना, प्लीज घर आ जा। मेरी और आरव की तबीयत बहुत खराब है। सुमित यहाँ नहीं है।"

वंदना की आवाज़ में हिचकिचाहट थी, "मीरा, मैं अभी कैसे आऊं? मेरे पति की गाड़ी खराब हो गई है और वो कहीं फंसे हुए हैं, मुझे उन्हें पिक करने जाना है। तू डॉक्टर को ऑनलाइन कंसल्ट कर ले न।" फोन कट गया।

उस पल, उस आलीशान फ्लैट की दीवारों से टकराती अपनी ही सांसों की आवाज़ ने मीरा को सच का आईना दिखा दिया। वह "आज़ादी" दरअसल "अकेलापन" थी जिसका नाम उसने बदल दिया था। उसने महसूस किया कि संयुक्त परिवार में "प्राइवेसी" भले ही कम थी, लेकिन "सुरक्षा" और "अपनापन" भरपूर था। वहाँ जिम्मेदारियाँ बँटी हुई थीं, दुख बँटे हुए थे। यहाँ वह अकेली मालकिन तो थी, लेकिन मुसीबतों की भी अकेली वारिस थी।

रात के दस बजे, जब मीरा ने हिम्मत हार दी, तो उसने कांपते हाथों से अपनी सासू माँ को फोन मिलाया।

"माँ जी..." उसके गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी।

"मीरा? क्या हुआ बेटा? तेरी आवाज़ ऐसी क्यों लग रही है?" उधर से माँ जी की चिंतित आवाज़ आई।

"माँ जी, मैं... हम... बीमार हैं। सुमित नहीं है..." मीरा फफक कर रो पड़ी।

"तू चिंता मत कर, हम आ रहे हैं। बस आधे घंटे में पहुँच रहे हैं। तू गेट का लॉक खोल कर लेट जा," ससुर जी की आवाज़ पीछे से सुनाई दी।

ठीक चालीस मिनट बाद, जब मीरा की आँखें बुखार से जल रही थीं, उसने अपने माथे पर एक ठंडा, सुकून भरा स्पर्श महसूस किया। उसने आँखें खोलीं तो देखा सासू माँ उसके सिर पर गीली पट्टी रख रही थीं। ससुर जी आरव को गोद में लेकर उसे दवाई पिला रहे थे। रसोई से कुकर की सीटी की आवाज़ आई—वही आवाज़ जिससे मीरा चिढ़ती थी, लेकिन आज वह आवाज़ उसे दुनिया का सबसे मधुर संगीत लग रही थी। वह आवाज़ बता रही थी कि अब सब ठीक हो जाएगा, अब वह अकेली नहीं है।

अगले दो दिन सासू माँ ने मीरा को बिस्तर से उतरने नहीं दिया। घर फिर से व्यवस्थित हो गया था। सूप की खुशबू, दवाइयों का समय और बड़ों की मौजूदगी ने घर के सन्नाटे को भर दिया था।

तीसरे दिन शाम को वंदना मीरा से मिलने आई। मीरा तब तक काफी ठीक हो चुकी थी और बालकनी में सासू माँ के साथ बैठी धूप सेक रही थी।

वंदना ने देखा कि मीरा अपनी सासू माँ के साथ हंस-हंसकर बातें कर रही है। वंदना के चेहरे पर एक उदासी तैर गई।

जब वे दोनों अकेले हुए, तो वंदना ने कहा, "सॉरी यार मीरा, मैं उस दिन आ नहीं पाई। सच कहूँ तो... मुझे तुझसे जलन हो रही है।"

मीरा चौंक गई, "जलन? मुझसे? तेरे पास तो वो सब है जो मैं चाहती थी—आज़ादी, शांति, अपना स्पेस।"

वंदना की आँखें भर आईं, "हाँ, मेरे पास शांति है, इतनी शांति कि कभी-कभी लगता है मैं दीवारों से बातें कर रही हूँ। जब मैं बीमार पड़ती हूँ, तो मुझे खुद उठकर पानी लेना पड़ता है। जब मेरा मन उदास होता है, तो घर में कोई नहीं होता जो बस इतना पूछ ले कि 'चेहरा क्यों उतरा है?'। तूने उस दिन सही कहा था कि संयुक्त परिवार में काम बहुत होता है, लेकिन मीरा, वहां 'लोग' होते हैं। यहाँ हम पिंजरे के पंछी हैं, जिन्हें लगता है कि हम खुले आसमान में हैं, लेकिन असल में हम अकेले हैं।"

मीरा ने वंदना का हाथ थाम लिया। सुमित भी टूर से वापस आ चुका था। शाम को चाय पर मीरा ने सुमित और अपने सास-ससुर को एक साथ बैठे देखा। आरव अपने दादाजी की पीठ पर चढ़ा हुआ था और दादी उसे कहानी सुना रही थीं।

सुमित ने मीरा की तरफ देखा और इशारों में पूछा, "अब कैसा लग रहा है? वापस पुराने घर चलें?" उसे लगा था मीरा मना कर देगी।

लेकिन मीरा ने मुस्कुराते हुए अपनी सास की तरफ देखा, जो अभी भी उसके लिए सेब छील रही थीं। मीरा ने कहा, "सुमित, यह फ्लैट बहुत सुंदर है। लेकिन यह 'मकान' है। 'घर' तो वही है जहाँ हमारे बड़े हैं। दीवारें हमें धूप और बारिश से बचा सकती हैं, लेकिन ज़िंदगी के तूफानों से बचाने के लिए परिवार की छत ही चाहिए होती है।"

मीरा समझ चुकी थी कि स्वतंत्रता का अर्थ अकेले जीना नहीं है, बल्कि सबके साथ सामंजस्य बिठाकर जीना है। उसने जो "स्पेस" माँगा था, वह उसे मिल गया था, लेकिन उस स्पेस की कीमत अपनों का साथ थी, जो वह चुकाने को तैयार नहीं थी।

अगले रविवार की सुबह, मीरा की नींद फिर उसी कुकर की सीटी और ससुर जी के रेडियो से खुली। उसने करवट ली, लेकिन इस बार खींझ नहीं, चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। वह उठी, और रसोई की तरफ चल दी, क्योंकि वह जानती थी कि वहां काम का बोझ नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट उसका इंतज़ार कर रही थी।

मूल लेखिका 

संगीता त्रिपाठी


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