पहली राखी

 शालिनी की शादी को अभी सिर्फ़ चार महीने हुए थे। मायके की इकलौती बेटी, जिस पर माँ-पापा का दुलार और भाई आशीष का ढेर सारा लाड़ बरसा था। शादी के बाद वह ससुराल के बड़े परिवार में आकर ज़िम्मेदार बहू बन चुकी थी।

ससुराल का माहौल अच्छा था। सास-ससुर उसे बेटी की तरह मानते, जेठ-जेठानी का भी खूब स्नेह था। पति अंशुल भी बहुत समझदार और प्यार करने वाला निकला। इन चार महीनों में उसे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वह पराई हो गई है।

लेकिन आज उसका मन बहुत बेचैन था। आज रक्षाबंधन था, और मायके की छत पर भाई को राखी बाँधने के दृश्य उसकी आँखों में घूम रहे थे। बचपन से हर साल राखी पर आशीष उसके लिए ढेरों तोहफ़े लाता, और शालिनी उसके माथे पर तिलक लगाकर राखी बाँधती। आज वही दिन था, और पहली बार वह अपने भाई से दूर थी।

सुबह से ही घर में हलचल थी। जेठानी अपने भाई के आने की तैयारी कर रही थी। सास ने भी मिठाइयाँ बनवाई थीं। सभी ओर उत्साह था।

शालिनी बाहर से हँसती-मुस्कुराती सबका साथ दे रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर उसकी आँखें नम थीं। पूजा की थाली सजाते हुए उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

सास ने गौर किया। धीरे से उसके पास आईं—
“क्या हुआ शालिनी? तुम तो आज कुछ बुझी-बुझी लग रही हो।”

शालिनी ने मुस्कुराने की कोशिश की—
“कुछ नहीं मम्मी जी… बस यूँ ही।”

लेकिन सास तो समझ गईं। उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“मुझे पता है, तुम्हें अपने भाई की याद आ रही है। पहली राखी है न शादी के बाद? चिंता मत करो, भगवान सब ठीक करेगा।”

शालिनी चुप हो गई, मगर दिल में हलचल बढ़ गई।


दोपहर का समय था। सब लोग बैठक में जुटे थे। तभी गेट पर घंटी बजी। अंशुल दरवाज़ा खोलने गए। कुछ क्षण बाद जैसे ही वह अंदर लौटे, उनके पीछे एक परिचित चेहरा था।

शालिनी की आँखें फैल गईं।
“आशीष…!”

सचमुच उसका भाई खड़ा था, हाथ में मिठाई का डिब्बा और चेहरे पर वही बचपन वाली शरारती मुस्कान। शालिनी दौड़कर उसके गले लग गई और फूट-फूटकर रोने लगी।

“पगली बहन, रो क्यों रही है? सोच लिया था कि तुझे पहली राखी पर अकेला नहीं छोड़ूँगा। भले ही काम से छुट्टी मुश्किल थी, लेकिन बहन के बिना राखी कैसी!”

आशीष को घर में जैसे परिवार का सदस्य मानकर जगह दी गई। सास ने प्यार से कहा—
“बेटा, शालिनी तो सुबह से उदास थी। अब तो चेहरा खिल उठा है। अच्छा किया तू आ गया।”

ससुर ने हँसते हुए कहा—
“अब जल्दी से बैठ, बहन को राखी बाँधने दे। इस घर में भी तेरे लिए हमेशा जगह है।”

आशीष भावुक हो गया। उसे लगा कि बहन सचमुच भाग्यशाली है, जिसने इतना अपनापन पाया।

शालिनी ने पूजा की थाली सजाई, आशीष को तिलक लगाया और काँपते हाथों से राखी बाँधी। आँसू मोतियों की तरह झरते रहे।

“भैया, आज पहली बार लगा था कि राखी अधूरी रह जाएगी। पर अब मन को सुकून है।”

आशीष ने उसकी हथेली में उपहार रखते हुए कहा—
“तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा भाई हमेशा तुम्हारे साथ है। यह घर तुम्हारा दूसरा घर है, पर तुम्हारे रिश्ते हमेशा पहले जैसे रहेंगे।”

सास ने भी आगे बढ़कर कहा—
“शालिनी, तुम्हारे रिश्ते सिर्फ मायके से नहीं हैं। अब तुम्हारे ससुराल में भी भाई मिलेंगे। पर मायके का भाई तो मायके का ही रहेगा। इसलिए ये दोनों घर मिलकर तुम्हारी खुशियाँ पूरी करेंगे।”

पूरे घर में हँसी-खुशी का माहौल हो गया। आशीष ने सबके साथ खाना खाया, बच्चों के साथ खेला और शाम को लौटते समय ससुराल वालों का आशीर्वाद लेकर गया।

शालिनी देर तक दरवाज़े पर खड़ी उसे जाता देखती रही। उसके दिल में अजीब-सा सुकून था।

उस रात शालिनी ने अपने पति अंशुल से कहा—
“आज की राखी मेरी ज़िंदगी की सबसे यादगार राखी रही। भैया तो आए ही, पर सास-ससुर और आप सबने जिस तरह मुझे समझा और सहारा दिया, उससे लगा कि मैं अकेली नहीं हूँ। अब यह घर सचमुच मेरा घर है।”

अंशुल ने मुस्कुराते हुए कहा—
“यही तो परिवार की खूबसूरती है। रिश्ते खून से ही नहीं, दिल से भी निभते हैं।”

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