सोने का कंगन

 सुधा के हाथ से पीतल का गिलास छूटकर ज़मीन पर गिरा और उसके लुढ़कने की आवाज़ ने पूरे घर की खामोशी को चीर कर रख दिया. रसोई में बैठी कौशल्या देवी का हाथ वहीं रुक गया, जहाँ वह दाल बीन रही थीं. एक अनजानी आशंका से उनका दिल ज़ोर से धड़कने लगा.

कमरे से सुधा की दबी हुई सिसकियों की आवाज़ आ रही थी. कौशल्या देवी घुटनों के दर्द को अनदेखा करते हुए तेज़ी से उठीं और बहू के कमरे की ओर लपकीं.

"क्या हुआ सुधा? तू ठीक तो है?" कौशल्या देवी ने दरवाज़े पर खड़े होकर पूछा.

सुधा पलंग के कोने पर बैठी थी, उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था और वह अपनी कलाई को बार-बार सहला रही थी. सास को देखते ही वह फफक कर रो पड़ी.

"मां जी... मेरा कंगन... दाहिने हाथ का सोने का कंगन नहीं मिल रहा," सुधा ने हकलाते हुए कहा.

कौशल्या देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई. "क्या कह रही है बहू? वो कंगन? जो रवि ने पिछले साल दीवाली पर अपनी पीएफ (PF) की सारी जमा-पूंजी निकालकर बनवाया था?"

सुधा ने बस सिर हिलाया. "मैंने अभी देखा... कलाई सूनी है. मैंने पूरा कमरा छान मारा, अलमारी, बिस्तर, बाथरूम... कहीं नहीं है."

कौशल्या देवी का चेहरा पीला पड़ गया. "सोने का खोना तो वैसे ही अपशकुन माना जाता है, ऊपर से घर की हालत वैसे ही ठीक नहीं चल रही. रवि की फैक्ट्री में पिछले तीन महीने से मंदी है... हे भगवान! यह कौन सी नई मुसीबत आ गई."

दोनों सास-बहू ने मिलकर घर का कोना-कोना छान मारा. आटे के कनस्तर से लेकर वॉशिंग मशीन के ड्रम तक, सब कुछ देख लिया गया. कचरे के डिब्बे को भी पलटकर देखा गया, लेकिन वह भारी-भरकम सोने का कंगन जैसे हवा में विलीन हो गया था.

शाम को जब रवि घर लौटा, तो घर का माहौल मातम जैसा था. रवि का चेहरा पहले से ही थका हुआ और उदास था. फैक्ट्री में लेबर की स्ट्राइक और पेमेंट अटकने की वजह से वह पिछले कई हफ्तों से तनाव में था.

जब उसे कंगन खोने की बात पता चली, तो उसने न गुस्सा किया, न चिल्लाया. वह बस सोफे पर धम्म से बैठ गया और अपने दोनों हाथों में सिर थाम लिया. उसकी यह खामोशी सुधा के दिल को किसी नश्तर की तरह चुभ रही थी.

"शायद... शायद मेरा वक़्त ही खराब चल रहा है," रवि ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा. "पहले व्यापार ठप हुआ, अब घर की लक्ष्मी भी रूठ रही है. वह कंगन सिर्फ गहना नहीं था सुधा, वह मेरे अच्छे वक़्त की निशानी था. मैंने सोचा था अगर हालात और बिगड़े तो..." वह चुप हो गया.

सुधा जानती थी वह क्या कहना चाहता था. वह कंगन उनकी आखिरी उम्मीद थी, जिसे बेचकर वे बुरे वक़्त में कुछ दिन काट सकते थे.

रात हो गई थी, लेकिन घर में चूल्हा नहीं जला था. कौशल्या देवी अपने कमरे में माला जप रही थीं, शायद भगवान से चमत्कार की उम्मीद में. रवि छत पर टहल रहा था.

सुधा अपने कमरे में थी, लेकिन वह कंगन नहीं ढूंढ रही थी. वह अलमारी के सबसे पीछे छिपी एक छोटी सी डायरी के पन्नों को पलट रही थी. उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन ये आंसू कंगन खोने के नहीं थे. यह आंसू उस भारी बोझ के थे जो वह अपने सीने पर उठाए घूम रही थी.

सच तो यह था कि कंगन खोया नहीं था.

दो दिन पहले, जब रवि फैक्ट्री गया था और कौशल्या देवी मंदिर गई थीं, तब एक आदमी घर आया था. वह बैंक का रिकवरी एजेंट नहीं था, बल्कि एक प्राइवेट साहूकार का आदमी था जिससे रवि ने फैक्ट्री बचाने के लिए ब्याज पर पैसा उठाया था. रवि ने यह बात घर में किसी को नहीं बताई थी, लेकिन सुधा ने एक दिन रवि को फोन पर गिड़गिड़ाते हुए सुन लिया था. साहूकार ने धमकी दी थी कि अगर दो दिन में ब्याज का पैसा नहीं आया, तो वह रवि की बेइज्जती करेगा.

सुधा से अपने पति का अपमान सहा नहीं गया था. वह चुपचाप पिछले दरवाजे से निकली थी, शहर के दूसरे छोर पर स्थित एक ज्वैलर के पास गई और अपना कंगन बेच दिया था. जो पैसे मिले, उससे उसने साहूकार के ऑफिस जाकर गुमनाम रूप से पैसा जमा करवा दिया था और रसीद को फाड़कर नाली में फेंक दिया था.

वह चाहती तो रवि को बता सकती थी. लेकिन वह रवि के स्वाभिमान को जानती थी. रवि मर जाता, पर अपनी पत्नी का गहना बेचकर कर्ज नहीं चुकाता. उसे यह महसूस होता कि वह एक असफल पति है. सुधा रवि की नज़रों में उसे गिरते हुए नहीं देख सकती थी. इसलिए उसने 'कंगन खोने' का नाटक रचा. उसे लगा था कि थोड़ी डांट पड़ेगी, थोड़ा रोना-धोना होगा और बात खत्म हो जाएगी.

लेकिन रवि की वह हताशा, वह टूटा हुआ वाक्य—"वह मेरे अच्छे वक़्त की निशानी था"—सुधा को अंदर से काट रहा था.

अगले दो दिन घर में अजीब सी बेचैनी रही. रवि ने खाना-पीना कम कर दिया था. वह पागलों की तरह हर जगह कंगन ढूंढता. कभी सोफे के कुशन हटाता, कभी आंगन की मिट्टी कुरेदता. उसकी यह हालत देखकर सुधा का कलेजा मुंह को आ जाता.

तीसरे दिन सुबह, रवि तैयार होकर कहीं जाने लगा.

"कहाँ जा रहे हो?" सुधा ने पूछा.

"थाने जा रहा हूं," रवि ने सपाट स्वर में कहा.

सुधा के हाथ से चाय की प्याली हिल गई. "थाने? क्यों?"

"रिपोर्ट लिखाने. हो सकता है घर में कोई आया हो, या कामवाली ने... पुलिस जांच करेगी तो शायद मिल जाए," रवि ने जूते पहनते हुए कहा.

सुधा का खून जम गया. अगर पुलिस आई, ज्वैलर तक बात पहुंची, तो उसका झूठ पकड़ा जाएगा. और अगर झूठ पकड़ा गया, तो रवि को यह बर्दाश्त नहीं होगा कि उसकी पत्नी ने उसके कर्ज के लिए कुर्बानी दी. उसे लगेगा कि वह इतना नाकारा है कि अपनी पत्नी के जेवर तक नहीं बचा सका.

"नहीं रवि! पुलिस की क्या ज़रूरत है?" सुधा ने घबराकर रवि का हाथ पकड़ लिया. "छोड़ो न, शायद मेरी ही किस्मत में नहीं था. पुलिस के लफड़े में बदनामी होगी."

"बदनामी तो तब होगी जब मैं कर्ज़ नहीं चुका पाऊंगा और लोग घर पर आएंगे," रवि ने झुंझलाकर हाथ छुड़ाया. "तुम्हें नहीं पता सुधा, उस कंगन की कीमत तुम औरतों के लिए सिर्फ सजने-संवरने की हो सकती है, मेरे लिए वह मेरी साख थी."

रवि दरवाजे तक पहुंच गया था. सुधा के पास अब कोई रास्ता नहीं बचा था. वह जानती थी कि अब सच बोलना ही होगा, चाहे परिणाम कुछ भी हो.

"कंगन चोरी नहीं हुआ है रवि!" सुधा की आवाज़ तेज़ और कांपती हुई थी.

रवि दरवाजे पर ठिठक गया. कौशल्या देवी भी अपने कमरे से बाहर आ गईं.

"क्या मतलब?" रवि मुड़ा, उसकी भौंहें तनी हुई थीं.

सुधा ने एक गहरी सांस ली, अपनी मुट्ठियां भींचीं और नज़रें झुका लीं. "कंगन खोया नहीं है... मैंने उसे बेच दिया."

कमरे में इतना सन्नाटा छा गया कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लगने लगी.

"बेच दिया?" कौशल्या देवी अविश्वास से चिल्लाईं. "तू पागल हो गई है क्या बहू? क्यों?"

रवि सुधा के करीब आया. उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा कन्फ्यूजन था. "सुधा, सच-सच बताओ. क्या ज़रूरत पड़ गई थी? क्या तुम्हें लगता है मैं तुम्हारी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहा?" उसकी आवाज़ में दर्द था.

सुधा अब और नहीं संभाल पाई. वह फफक कर रो पड़ी. "तुम्हारी ज़रूरतों के लिए रवि... तुम्हारी. उस खन्ना साहूकार का आदमी आया था. वह तुम्हें धमका रहा था. मुझे पता था तुमने फैक्ट्री के लिए उससे पैसे लिए थे. वह घर आकर तमाशा करने वाला था. मैं तुम्हारी इज़्ज़त नीलाम होते नहीं देख सकती थी."

रवि पत्थर की मूरत बन गया. उसे याद आया कि कैसे अचानक साहूकार का तकादा बंद हो गया था. वह सोच रहा था कि शायद साहूकार ने उसे मोहलत दे दी है.

"तुमने... तुमने मेरे लिए अपना कंगन बेच दिया?" रवि की आवाज़ भर्रा गई. "सुधा, मैं... मैं इतना गिर गया कि..."

"खबरदार जो ऐसा सोचा भी," सुधा ने रवि के मुंह पर हथेली रख दी. "तुम मेरे पति हो रवि. हम दोनों एक गाड़ी के दो पहिए हैं. जब एक गड्ढे में फंसता है, तो दूसरे को ज़ोर लगाना ही पड़ता है. क्या हुआ अगर एक कंगन चला गया? तुम्हारी साख से बढ़कर तो नहीं था न? और रही बात मेरे गहने की, तो मेरा सबसे बड़ा गहना तुम हो, तुम्हारा सुरक्षित रहना है."

रवि की आंखों से आंसू बह निकले. उसने सुधा को गले लगा लिया. वह पुरुष जो आर्थिक मंदी और कर्ज के बोझ तले पत्थर हो चुका था, आज अपनी पत्नी के प्रेम के आगे मोम की तरह पिघल गया था. उसे महसूस हुआ कि वह गरीब नहीं है. जिसके पास सुधा जैसी जीवनसंगिनी हो, वह दुनिया का सबसे अमीर आदमी है.

कौशल्या देवी, जो अब तक खामोश खड़ी थीं, धीरे-धीरे उनके पास आईं. सुधा डर गई. उसे लगा कि सास अब डांटेंगी कि घर की बात बाहर क्यों की, या अपशकुन क्यों किया.

लेकिन कौशल्या देवी ने अपने हाथ से अपने गले की सोने की चेन उतारी.

"मां जी, यह क्या कर रही हैं आप?" रवि और सुधा दोनों चौंक गए.

कौशल्या देवी ने वह चेन सुधा के गले में पहना दी.

"बहू," कौशल्या देवी की आवाज़ भारी थी, "मैंने सुना था कि घर की लक्ष्मी घर को बनाती है, पर आज देख लिया कि घर की लक्ष्मी घर को बचाती भी है. मेरा कंगन खोने का वहम तो दूर हो गया, क्योंकि मुझे आज पता चला कि मेरे घर में जो असली सोना है, वह तिजोरी में नहीं, बल्कि जीती-जागती मेरे सामने खड़ा है."

उन्होंने रवि की ओर देखा. "रवि, कर्ज तो उतर जाएगा बेटा, हाथ-पैर सलामत हैं तो पैसा फिर कमा लेंगे. लेकिन आज जो कर्ज़ सुधा ने तुझ पर चढ़ाया है, उसे तू सात जन्मों में भी नहीं उतार पाएगा. इसका मान कभी कम मत होने देना."

रवि ने मां के पैर छुए और सुधा का हाथ थाम लिया.

"सुधा," रवि ने दृढ़ता से कहा, "मैं वादा करता हूं. यह कंगन वापस आएगा. मेरी मेहनत से, मेरे पसीने से. लेकिन तब तक, यह खाली कलाई मुझे हर रोज़ याद दिलाएगी कि मैं अकेला नहीं हूं."

सुधा मुस्कुराई. उसकी कलाई अभी भी सूनी थी, लेकिन उसका मन भरा हुआ था. उसने उस दिन जाना कि कभी-कभी कुछ पाने के लिए खोना ज़रूरी होता है. उसने सोना खोया था, लेकिन अपने पति का आत्मविश्वास और सास का बेशकीमती प्यार पा लिया था.

रसोई में दाल जलने की गंध आ रही थी. कौशल्या देवी हंसते हुए बोलीं, "लो, बातों-बातों में दाल जल गई. आज लगता है खिचड़ी ही खानी पड़ेगी."

और उस दिन उस घर में जली हुई दाल वाली खिचड़ी का स्वाद किसी राजभोग से कम नहीं था, क्योंकि उसमें एक-दूसरे के लिए समर्पण और विश्वास का तड़का लगा था.

लेखिका : अंजू  चौबे


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