शहर की चकाचौंध और गगनचुंबी इमारतों के बीच, पुरानी दिल्ली की एक संकरी गली में, समय जैसे ठहरा हुआ सा लगता था। राघव प्रताप सिंह, जो एक मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ थे, अपनी मर्सिडीज को मुख्य सड़क पर खड़ी कर, पैदल ही उस गली में दाखिल हुए। उनके महंगे इटैलियन जूतों पर कीचड़ के छींटे पड़ रहे थे, लेकिन उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं थी। उनके नथुनों में वही पुरानी, जानी-पहचानी हींग और देसी घी की खुशबू तैरने लगी थी, जो उन्हें पिछले एक महीने से यहाँ खींच कर ला रही थी।
यह जगह कोई ढाबा नहीं थी, बल्कि एक पुराना हवेलीनुमा मकान था, जिसके बाहरी हिस्से को एक छोटे से भोजनालय का रूप दे दिया गया था। नाम था—'तृप्ति'। यहाँ कोई वेटर नहीं था, कोई मेनू कार्ड नहीं था। बस लकड़ी की कुछ मेजें और उस पर बिछीं साफ सुथरी चादरें।
राघव जैसे ही अंदर दाखिल हुए, काउंटर पर बैठे बुजुर्ग, जिन्हें सब 'काका' कहते थे, ने अपनी चश्मा ठीक करते हुए मुस्कुराकर देखा।
"आइए राघव बाबू, आज तो थोड़ी देर हो गई आपको?" काका की आवाज़ में एक अपनापन था, जो राघव को अपने आलीशान पेंटहाउस में कभी नहीं मिलता था।
"हाँ काका, आज एक मीटिंग लंबी खिंच गई। पर भूख ने यहाँ खींच ही लिया," राघव ने एक थकी हुई मुस्कान के साथ कहा और कोने वाली अपनी पसंदीदा मेज पर बैठ गए।
राघव का जीवन बाहर से जितना परिपूर्ण दिखता था, अंदर से उतना ही खोखला था। पांच साल पहले एक कार दुर्घटना में अपनी पत्नी, अनुराधा को खोने के बाद, उन्होंने खुद को काम में डुबो लिया था। अनुराधा सिर्फ उनकी पत्नी नहीं थी, वह उनके जीवन का स्वाद थी। उसके जाने के बाद, राघव के लिए भोजन सिर्फ पेट भरने का एक साधन रह गया था। फाइव स्टार होटलों का खाना उन्हें बेस्वाद लगता था।
लेकिन एक महीने पहले, जब उनकी कार यहाँ खराब हुई थी और उन्होंने मजबूरी में यहाँ खाना खाया था, तो उस पहले निवाले ने ही उनकी दुनिया हिला दी थी। वह 'अरहर की दाल' थी। साधारण सी पीली दाल, लेकिन उसमें जीरे और सूखी लाल मिर्च का जो तड़का था, और अंत में जो हरा धनिया डाला गया था, उसका स्वाद बिल्कुल वैसा ही था जैसा अनुराधा बनाया करती थी। राघव की आँखों में उस दिन भरे बाज़ार में आँसू आ गए थे।
आज भी राघव चुपचाप बैठ गए। उन्हें ऑर्डर देने की ज़रूरत नहीं थी। यहाँ का नियम था—जो आज बना है, वही परोसा जाएगा।
कुछ ही मिनटों में, एक स्टील की थाली उनके सामने रख दी गई। आज थाली में 'भरवां करेले' और 'अजवाइन वाली परांठे' थे। राघव का दिल ज़ोर से धड़का। भरवां करेले अनुराधा की खासियत थी। वह उसमें एक खास तरह का मसाला—कच्ची अमिया और सौंफ का मिश्रण—भरती थी, जिससे करेले की कड़वाहट एक मीठे स्वाद में बदल जाती थी।
राघव ने कांपते हाथों से परांठे का टुकड़ा तोड़ा, उसे करेले के साथ लगाया और मुँह में रखा। आँखें बंद करते ही वह पांच साल पीछे चले गए। वही स्वाद। वही अनुपात। वही जादू। यह महज संयोग नहीं हो सकता था। कोई इतना सटीक कैसे बना सकता है?
वह खाना खाते रहे, लेकिन हर निवाले के साथ उनकी बेचैनी बढ़ती गई। जब उन्होंने खाना खत्म किया, तो काका बिल लेकर आए।
"काका," राघव ने इस बार दृढ़ता से कहा, "आज मैं बिना मिले नहीं जाऊंगा। पिछले एक महीने से मैं आपसे पूछ रहा हूँ कि अंदर खाना कौन बनाता है, और आप हर बार टाल देते हैं। आज मुझे जानना है। यह स्वाद... यह साधारण नहीं है। यह मेरी रूह को छूता है।"
काका का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। उन्होंने आस-पास देखा, भोजनालय अब खाली हो चुका था।
"बाबूजी, मैंने आपसे कहा था न, वह किसी से नहीं मिलतीं। वह बहुत शर्मीली हैं और अपनी दुनिया में ही रहती हैं।"
"मुझे सिर्फ एक बार देखना है, काका। प्लीज। आप नहीं समझेंगे, मेरे लिए यह सिर्फ खाना नहीं है। यह मेरे अतीत का एक ऐसा दरवाजा है जिसे मैं बंद मान चुका था," राघव की आवाज़ में एक अजीब सी ललक और दर्द था।
काका ने राघव की आँखों में देखा। शायद उन्हें उस बड़े साहब के अंदर छुपा हुआ वह तड़पता हुआ इंसान दिख गया। उन्होंने एक गहरी सांस ली और सिर हिलाया।
"ठीक है। पर आप उनसे बात नहीं कर पाएंगे। वह बोल नहीं सकतीं।"
राघव चौंक गए। "बोल नहीं सकतीं?"
"जी, वह मूक-बधिर हैं। बचपन से। आइए मेरे साथ।"
राघव काका के पीछे-पीछे रसोई की ओर बढ़े। रसोई छोटी थी लेकिन चमक रही थी। पीतल के बर्तन करीने से रखे थे। वहां, चूल्हे के पास पीठ किए एक युवती खड़ी थी। वह बर्तनों को पोंछकर रख रही थी। उसने एक साधारण सूती साड़ी पहनी थी।
"मीरा," काका ने मेज पर हाथ थपथपाकर उसका ध्यान आकर्षित किया।
लड़की पलटी। राघव उसे देखकर ठिठक गए। वह अनुराधा नहीं थी। वह बिल्कुल अलग थी—सांवला रंग, बड़ी-बड़ी गहरी आँखें और चेहरे पर एक अजीब सी शांति। उसकी उम्र मुश्किल से पच्चीस-छब्बीस साल होगी।
राघव को देखते ही वह थोड़ी सहम गई और अपना पल्लू ठीक करने लगी।
"ये राघव बाबू हैं, मीर," काका ने इशारों में समझाया। "तुम्हारे हाथ के खाने के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। तुमसे मिलना चाहते थे।"
मीरा ने हाथ जोड़कर नमस्ते किया, लेकिन उसकी नज़रें झुकी रहीं।
राघव आगे बढ़े। "मीरा जी," उनका गला रुंध रहा था। "आपका खाना... उसमें एक जादू है। लेकिन मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। आपने यह सब बनाना कहाँ से सीखा? खास तौर पर वह भरवां करेले का मसाला? वह कोई आम रेसिपी नहीं है।"
मीरा ने काका की ओर देखा। काका ने उसे इशारे से कुछ लाने को कहा। मीरा एक पुराने बक्से की तरफ गई और उसमें से एक नीले रंग की, थोड़ी फटी हुई डायरी निकालकर लाई।
उस डायरी को देखते ही राघव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनका चेहरा सफेद पड़ गया। वह डायरी... वह अनुराधा की 'रेसिपी डायरी' थी। नीले मखमली कवर वाली डायरी, जिस पर अनुराधा ने सुनहरे धागे से 'अन्नपूर्णा' काढ़ा था।
राघव ने कांपते हाथों से वह डायरी थामी। पन्ने पलटते ही अनुराधा की मोतियों जैसी लिखावट सामने आ गई। हर पन्ने पर तारीख, मौसम और उस डिश से जुड़ी कोई छोटी सी याद लिखी थी। 'करेले—राघव को पसंद हैं, अमिया ज़्यादा डालनी है...'
राघव वहीँ फर्श पर घुटनों के बल बैठ गए और डायरी सीने से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगे। पांच साल का जमा हुआ दर्द आंसुओं के रूप में बह निकला।
काका ने उन्हें संभाला और पानी पिलाया। जब राघव थोड़े शांत हुए, तो उन्होंने पूछा, "यह... यह आपके पास कैसे आई?"
काका ने बताया, "बाबूजी, तीन साल पहले आप ही के इलाके में कबाड़ की एक दुकान पर यह डायरी रद्दी के ढेर में पड़ी थी। मीरा तब वहां से गुज़र रही थी। उसे पढ़ने का शौक है, भले ही बोल नहीं पाती। उसे यह डायरी दिखी। उसे लगा कि इसमें कुछ खास है। वह इसे उठा लाई।"
राघव को याद आया। अनुराधा की मौत के बाद, गहरे डिप्रेशन में, उन्होंने घर की सफाई करवाई थी और पुरानी चीजों को, जिनसे अनुराधा की याद आती थी, उन्हें हटवा दिया था। शायद उसी उथल-पुथल में यह डायरी भी रद्दी वाले के पास चली गई थी।
काका ने आगे कहा, "मीरा अनाथ है बाबूजी। मैंने इसे पनाह दी थी। इसे खाना बनाने का शौक था, पर हुनर नहीं था। इस डायरी ने इसे हुनर दिया। यह रोज़ रात को इस डायरी को पढ़ती, और जैसा-जैसा इसमें लिखा है, बिल्कुल वैसा ही बनाती। यह कहती है कि इस डायरी को लिखने वाली औरत ने इसमें अपनी आत्मा डाल रखी है। मीरा बस उस आत्मा का माध्यम है।"
राघव ने आंसुओं से धुंधली आँखों से मीरा की ओर देखा। मीरा अब डर नहीं रही थी, बल्कि उसकी आँखों में करुणा थी। उसने इशारों में काका से कुछ कहा।
काका ने अनुवाद किया, "मीरा कह रही है कि उसे नहीं पता था कि यह डायरी आपकी पत्नी की है। वह माफ़ी मांग रही है अगर उसने आपकी कोई अमानत अपने पास रख ली हो। वह यह डायरी आपको लौटा रही है।"
मीरा ने हाथ जोड़कर डायरी राघव की ओर बढ़ा दी।
राघव ने डायरी को छुआ, अपनी पत्नी के स्पर्श को महसूस किया, और फिर धीरे से डायरी वापस मीरा के हाथों में रख दी।
"नहीं मीरा," राघव ने मुस्कुराहट के साथ कहा, जिसमें अब दर्द नहीं, सुकून था। "यह डायरी अब तुम्हारी है। अनुराधा... मेरी पत्नी... वह हमेशा चाहती थी कि कोई उसके हाथ के स्वाद को ज़िंदा रखे। मैं तो शायद इस डायरी को कभी खोलता भी नहीं, या इसे अलमारी में बंद कर देता। लेकिन तुमने... तुमने अनुराधा को ज़िंदा रखा है। तुमने इन पन्नों को वो सम्मान दिया जो मैं नहीं दे पाया।"
राघव ने अपनी जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और काका को दिया।
"काका, 'तृप्ति' अब सिर्फ एक छोटा भोजनालय नहीं रहेगा। अगर मीरा चाहे, तो मैं शहर में एक बड़ा रेस्टोरेंट खोलने में मदद कर सकता हूँ। लोग जानना चाहते हैं कि असली प्यार का स्वाद कैसा होता है।"
मीरा ने सिर हिलाकर मना कर दिया। उसने इशारों में समझाया—"खाना पेट भरने के लिए होता है, व्यापार के लिए नहीं। यहाँ जो सुकून है, वह बड़ी इमारत में नहीं मिलेगा।"
राघव उसकी बात समझ गए। वह समझ गए कि अनुराधा ने अपना उत्तराधिकारी सही व्यक्ति को चुना था।
उस शाम जब राघव वहां से निकले, तो बारिश रुक चुकी थी। हवा में एक नई ताजगी थी। वह खालीपन जो सालों से उनके सीने में घर किए हुए था, वह अब भरा-भरा सा लग रहा था। उन्होंने जान लिया था कि जो चले जाते हैं, वे कभी पूरी तरह नहीं जाते। वे लौट आते हैं—कभी किसी याद के रूप में, कभी किसी डायरी के पन्नों में, और कभी किसी अजनबी के हाथ से बने 'भरवां करेले' के स्वाद में।
आज राघव का पेट ही नहीं, आत्मा भी तृप्त थी। उन्होंने गाड़ी स्टार्ट की, लेकिन घर जाने की जल्दी नहीं थी। उन्होंने तय किया कि वे कल फिर आएंगे। अब वे यहाँ सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि उस मौन रिश्ते को निभाने आएंगे जो एक डायरी ने दो अजनबियों के बीच जोड़ दिया था।
जीवन सचमुच अजीब है। कभी-कभी हम जिसे खो देते हैं, उसे पाने के लिए हमें किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाना पड़ता है, जो हमारे लिए बिल्कुल अनजान हो, फिर भी सबसे करीब हो।
उस रात राघव को नींद बहुत अच्छी आई। सपने में अनुराधा आई थी, और वह रसोई में खड़ी मुस्कुरा रही थी, उसके बगल में मीरा खड़ी थी, और दोनों मिलकर राघव की पसंदीदा खीर बना रही थीं।
लेखक : प्रताप शुक्ला
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