महाभारत युद्ध जब अवश्यंभावी हो चुका था,तब माद्र नरेश शल्य पांडव और विशेष रुप से अपने भानजे नकुल और सहदेव का युद्ध में साथ देने के लिए युद्धभूमि कुरुक्षेत्र की ओर निकल पड़े।रास्ते में धोखे से दुर्योधन ने उन्हें रोककर विशाल दावत के साथ घंटों तक उनका मनोरंजन किया।जब दुर्योधन के छल का पता माद्र नरेश शल्य को चला,तो वे सन्न रह गए। दुर्योधन के आतिथ्य के कारण मजबूरीवश वे कौरवों की तरफ से लड़ने को तैयार हो गए।
दुर्योधन के छल का खुलासा होने के बाद महारथी शल्य पांडव से मिलने गए। अपने भानजे तथा पांडव को नाराज देखकर उन्होंने कहा -"कर्ण कौरव पक्ष का महान धनुर्धर है।तुमलोगों के सहायतार्थ मैं युद्ध में उसे जली-कटी सुनाकर हतोत्साहित करता रहूँगा।"
सचमुच युद्ध में शल्य नरेश कर्ण को जली-कटी सुनाते रहे। युद्ध में अर्जुन से कर्ण का सामना होने पर जली-कटी सुनाते हुए माद्र नरेश शल्य कहते हैं-"हे कर्ण!तुम कौरवों की भीख पर पलकर घमंडी हो गए हो। अर्जुन तुमसे बड़ा धनुर्धर है।तुम कभी भी अर्जुन से बराबरी नहीं कर सकते हो!"
कर्ण माद्र नरेश शल्य की जली-कटी बातों की अवहेलना कर तन्मयता से युद्ध लड़ता है,परन्तु सारथि शल्य युद्ध के मैदान में बार-बार कर्ण को जली-कटी सुनाकर उसका ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं।
युद्ध के मैदान में एक बार जब कर्ण अर्जुन वध के बिल्कुल करीब था,तब शल्य ने वाक्यचातुर्य दिखाते हुए कहा -" कर्ण!अर्जुन की छाती में वाण का निशाना लगाओ।"
कर्ण मद्र नरेश शल्य की जली-कटी बातों से परेशान हो चुका था,इस कारण उनकी बातों पर विश्वास न कर अर्जुन के सिर पर वाण का निशाना लगा दिया,परन्तु श्रीकृष्ण ने चतुराई से रथ को धरती में गाड़ दिया और अर्जुन की जान बच गई।
युद्ध के सत्रहवें दिन जब युद्ध नियमों की अवहेलना करते हुए पैदल और निहत्थे कर्ण को अर्जुन ने मार दिया,तब शल्य नरेश को कर्ण के प्रति कही गई जली-कटी बातों पर बहुत दुख और पश्चाताप हुआ।उन्हें खुद तथा अर्जुन के प्रति घृणा होने लगी।शल्य नरेश को पहले से पता था कि कर्ण महान धनुर्धर है,उसे कोई हरा नहीं सकता है।परन्तु वह भी अपने वचन के प्रति कटिबद्ध थे,इस कारण उन्होंने युद्ध में जली-कटी सुनकर कर्ण को हतोत्साहित किया।
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा (स्वरचित)
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