“आर्यन, कल की पार्टी में सब बड़े लोग आ रहे हैं। मेरे ऑफिस के एमडी, तुम्हारे क्लाइंट्स... सब हाई प्रोफाइल हैं। मुझे बस एक ही बात की चिंता है।”
“किस बात की?” आर्यन ने पानी का घूंट भरते हुए पूछा।
“वही... तुम्हारे बड़े भैया, महादेव जी,” निशा ने झिझकते हुए कहा। “देखो आर्यन, मुझे गलत मत समझना। मैं उनकी इज्जत करती हूँ। लेकिन... उनका रहन-सहन, उनके कपड़े, उनका बोलने का तरीका... वो बहुत ही देहाती है। पिछली बार जब वो आए थे, तो उन्होंने ड्राइंग रूम में पैर ऊपर करके बैठना शुरू कर दिया था। मेरे दोस्तों के सामने मुझे बहुत शर्मिंदगी हुई थी। कल सब एलीट क्राउड होगा। अगर उन्होंने फिर कुछ ऐसा किया तो?”
आर्यन का चेहरा सख्त हो गया। उसने पानी का गिलास टेबल पर रखा। “निशा, वो मेरे बड़े भाई हैं। पिता जी के गुजरने के बाद उन्होंने ही मुझे पाला है। आज अगर हम इस घर का गृह-प्रवेश कर रहे हैं, तो पहला हक उनका बनता है।”
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मुंबई के पॉश इलाके में स्थित ‘स्काईलाइन हाइट्स’ की 25वीं मंजिल पर बने आलीशान पेंटहाउस की बालकनी में खड़ी निशा शहर की टिमटिमाती रोशनी को देख रही थी। ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। कल गृह-प्रवेश की पूजा थी। यह घर निशा का सपना था। पिछले पाँच सालों से वह और उसका पति, आर्यन, दिन-रात मेहनत कर रहे थे ताकि वे इस मुकाम तक पहुँच सकें।
हर चीज़ परफेक्ट थी। इटालियन मार्बल का फर्श, इंपोर्टेड झाड़फ़ानूस, डिज़ाइनर पर्दे—सब कुछ निशा की पसंद का था। लेकिन फिर भी, उसके मन में एक अजीब-सी खलबली थी।
“निशा, क्या हुआ? तुम अभी तक जागी हो?” आर्यन ने पीछे से आकर उसके कंधे पर हाथ रखा।
निशा पलटी। उसकी आँखों में चिंता थी। “आर्यन, कल की पार्टी में सब बड़े लोग आ रहे हैं। मेरे ऑफिस के एमडी, तुम्हारे क्लाइंट्स... सब हाई प्रोफाइल हैं। मुझे बस एक ही बात की चिंता है।”
“किस बात की?” आर्यन ने पानी का घूंट भरते हुए पूछा।
“वही... तुम्हारे बड़े भैया, महादेव जी,” निशा ने झिझकते हुए कहा। “देखो आर्यन, मुझे गलत मत समझना। मैं उनकी इज्जत करती हूँ। लेकिन... उनका रहन-सहन, उनके कपड़े, उनका बोलने का तरीका... वो बहुत ही देहाती है। पिछली बार जब वो आए थे, तो उन्होंने ड्राइंग रूम में पैर ऊपर करके बैठना शुरू कर दिया था। मेरे दोस्तों के सामने मुझे बहुत शर्मिंदगी हुई थी। कल सब एलीट क्राउड होगा। अगर उन्होंने फिर कुछ ऐसा किया तो?”
आर्यन का चेहरा सख्त हो गया। उसने पानी का गिलास टेबल पर रखा। “निशा, वो मेरे बड़े भाई हैं। पिता जी के गुजरने के बाद उन्होंने ही मुझे पाला है। आज अगर हम इस घर का गृह-प्रवेश कर रहे हैं, तो पहला हक उनका बनता है।”
“मैं हक की बात नहीं कर रही आर्यन,” निशा ने सफाई दी। “मैं बस प्रेजेंटेशन की बात कर रही हूँ। हम उन्हें बाद में अलग से बुला सकते थे। कल के फंक्शन में वो ‘मिसफिट’ लगेंगे।”
“वो आ रहे हैं, निशा। और वो इसी घर में रहेंगे,” आर्यन ने फैसला सुना दिया और बेडरूम की तरफ बढ़ गया। निशा वहीं खड़ी रह गई, मन ही मन प्रार्थना करती हुई कि कल सब ठीक रहे।
अगली सुबह, घर में चहल-पहल थी। कैटरिंग वाले, फूल वाले और पुजारी जी—सब अपनी तैयारियों में लगे थे। दोपहर के करीब दो बजे दरवाजे की घंटी बजी।
निशा ने दरवाजा खोला। सामने महादेव भैया खड़े थे। सिर पर एक मैला-सा साफा, पैरों में धूल भरी चप्पलें, और हाथ में एक बड़ा-सा प्लास्टिक का थैला और एक टीन का कनस्तर। उनके कुर्ते का एक बटन टूटा हुआ था और पसीने की गंध आ रही थी।
“अरे बहुरिया! जुग-जुग जियो!” महादेव ने अपनी गूंजती हुई आवाज़ में कहा और अंदर आने लगे।
निशा ने जबरदस्ती की मुस्कान चेहरे पर चिपकाई। “नमस्ते भैया। आइए।”
महादेव अंदर आए और सीधे इंपोर्टेड सोफे की तरफ बढ़े। निशा का दिल धक से रह गया। वह चीखना चाहती थी कि ‘जूते उतार कर बैठिए’, लेकिन तभी आर्यन दौड़ता हुआ आया।
“भैया!” आर्यन ने झुककर उनके पैर छुए।
महादेव ने उसे गले लगा लिया। “मेरा शेर भाई! क्या महल बनाया है रे तूने! गाँव में सबकी छाती चौड़ी हो गई है तेरी तरक्की सुनकर।”
“आप बैठिए न भैया,” आर्यन ने उन्हें सोफे पर बिठाया।
निशा ने देखा कि महादेव ने अपना टीन का कनस्तर सीधे कांच की सेंटर टेबल पर रख दिया। कांच पर एक खरोंच लगने की आवाज़ आई। निशा के मुंह का स्वाद कड़वा हो गया।
“ये क्या है भैया?” आर्यन ने पूछा।
“अरे, गाँव का शुद्ध घी है। और इसमें गुड़ के लड्डू हैं। बहुरिया को पसंद हैं न,” महादेव ने प्लास्टिक की थैली खोली। उसमें से पुराने अखबारों में लिपटी हुई कुछ चीज़ें निकलीं।
निशा ने नाक सिकोड़ी। “भैया, आप फ्रेश होकर कपड़े बदल लीजिए। शाम को मेहमान आने लगेंगे।”
“हाँ-हाँ, अभी नहा लेता हूँ,” महादेव उठे और अपने झोले से एक धोती निकालकर बाथरूम की तरफ चल दिए।
शाम को पार्टी शुरू हुई। घर रोशनी से जगमगा रहा था। मेहमानों के हाथों में वाइन के गिलास थे और हल्की आवाज़ में अंग्रेजी संगीत बज रहा था। निशा एक डिज़ाइनर साड़ी में बेहद खूबसूरत लग रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार कोने में बैठे महादेव भैया पर जा रही थीं।
महादेव ने धोती-कुर्ता तो पहन लिया था, लेकिन वह काफी पुराना था। वे एक कोने में कुर्सी पर ऐसे बैठे थे जैसे कोई सजा-पाया मुजरिम हो। वे हर आने-जाने वाले को हाथ जोड़कर ‘राम-राम’ कर रहे थे, चाहे कोई उनकी तरफ देख रहा हो या नहीं।
निशा की बॉस, मिसेज कपूर, निशा के पास आईं। “वाओ निशा, तुम्हारा घर बहुत स्टनिंग है। और वो कॉर्नर पीस कहाँ से लिया?”
तभी महादेव ज़ोर से बोले, “अरे छोटू! ए वेटर इधर आ! जरा पानी पिला दे भाई।”
मिसेज कपूर चौंक गईं। उन्होंने महादेव की तरफ देखा, जो वेटर को ऐसे बुला रहे थे जैसे अपने खेत के मज़दूर को।
“ये कौन हैं निशा?” मिसेज कपूर ने दबी आवाज़ में पूछा। “तुम्हारे घर के पुराने स्टाफ हैं क्या?”
निशा शर्म से पानी-पानी हो गई। इससे पहले कि वह कुछ बोलती, आर्यन वहां आ गया।
“ये मेरे बड़े भाई हैं, मिसेज कपूर। महादेव सिंह,” आर्यन ने गर्व से कहा और भैया के पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रख दिया।
मिसेज कपूर ने एक औपचारिक मुस्कान दी और आगे बढ़ गईं। निशा गुस्से में आर्यन के पास गई और फुसफुसाई, “मैंने कहा था न आर्यन? देख लिया तमाशा? मिसेज कपूर पूछ रही थीं कि ये स्टाफ हैं क्या? मेरी इमेज की धज्जियां उड़ रही हैं।”
आर्यन ने निशा को एक तरफ खींचा। “तुम्हें अपनी इमेज की पड़ी है निशा? ज़रा उनकी आँखों में देखो। वो डरे हुए हैं। वो इस चकाचौंध में असहज महसूस कर रहे हैं, लेकिन सिर्फ मेरे लिए यहाँ बैठे हैं।”
“तो उन्हें यहाँ आने की ज़रूरत क्या थी?” निशा झल्ला उठी। “वो गाँव में ही खुश रहते।”
तभी महादेव अपनी कुर्सी से उठे। उनके हाथ में एक छोटा-सा कपड़े का लिफाफा था। वे आर्यन और निशा के पास आए।
“लल्ला, बहुरिया...” महादेव की आवाज़ थोड़ी कांप रही थी। “मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हारे इन बड़े-बड़े लोगों के बीच जंच नहीं रहा हूँ। मुझे तो बस एक बार अपनी आँखों से देखना था कि मेरा भाई किस महल में रहता है। अब देख लिया, तो मन भर गया।”
उन्होंने वह कपड़े का लिफाफा आर्यन के हाथ में थमाया।
“ये क्या है भैया?” आर्यन ने पूछा।
“गृह-प्रवेश का शगुन है। खाली हाथ थोड़े ही आते हैं नए घर में,” महादेव मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में पान की पीक के निशान थे, जिसे देखकर निशा ने नज़रें फेर लीं।
आर्यन ने लिफाफा खोला। अंदर पचास हज़ार रुपए नकद और एक सोने की अंगूठी थी। अंगूठी पुरानी लग रही थी।
निशा ने देखा और मन ही मन सोचा, ‘पचास हज़ार? इतने का तो हमने सिर्फ स्टार्टर्स मंगवाया है। और ये पुरानी अंगूठी?’
लेकिन आर्यन उस अंगूठी को देखकर सन्न रह गया। उसकी आँखों में आंसू भर आए।
“भैया... ये अंगूठी...” आर्यन का गला रुंध गया। “ये तो भाभी की आखिरी निशानी थी न? जब वो गुज़री थीं, तो उन्होंने आपको दी थी कि बुढ़ापे में काम आएगी। आपने ये...”
“अरे पगले,” महादेव ने आर्यन के आंसू पोंछे। “भाभी होती तो क्या वो अपने देवर के नए घर के लिए ये नहीं देती? और रही बात बुढ़ापे की, तो मेरा बुढ़ापा तो तू है। जब मेरा शेर भाई महलों में रह रहा है, तो मुझे सोने के टुकड़ों की क्या ज़रूरत?”
निशा स्तब्ध थी। उसे पता था कि भैया की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। गाँव में खेती भी अब भरोसेमंद नहीं रही थी। ऐसे में भाभी की आखिरी निशानी और पचास हज़ार रुपए... यह उनके लिए बहुत बड़ी रकम थी।
“लेकिन भैया, ये पैसे...” आर्यन बोल नहीं पा रहा था।
“रख ले,” महादेव ने डांटा। “तेरे सोफे और परदों के आगे ये कुछ भी नहीं हैं, पता है मुझे। पर ये मेरी मेहनत की कमाई है। खेत का एक हिस्सा बेचा है मैंने।”
“खेत बेचा?” आर्यन चीखा। “क्यों भैया? आपको पैसे की ज़रूरत थी तो मुझसे मांगते।”
महादेव हंसे। एक खोखली हंसी। “तुझसे कैसे मांगता रे? मुझे पता चला था कि तूने इस घर के लिए बहुत बड़ा लोन लिया है। बैंक वाले तुझे परेशान न करें, इसलिए मैंने सोचा कि थोड़ी मदद कर दूँ। ये पचास हज़ार नहीं हैं लल्ला, ये तेरे भाई का आशीर्वाद है कि तेरा घर कभी कर्ज़ के बोझ से न दबे।”
निशा के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह जिस इंसान को अपनी शान में धब्बा समझ रही थी, वह अपनी ज़मीन बेचकर, अपनी पत्नी की आखिरी निशानी देकर, उनके कर्ज़ का बोझ हल्का करने आया था।
आर्यन अब रो रहा था। उसने सबके सामने, सारे मेहमानों की परवाह किए बिना, महादेव को कसकर गले लगा लिया। संगीत बंद हो गया। सब लोग उनकी तरफ देखने लगे।
“निशा,” आर्यन ने मुड़कर अपनी पत्नी को देखा। “तुम्हें पता है मैं आज यहाँ कैसे खड़ा हूँ?”
निशा चुप थी।
“जब मैं इंजीनियरिंग करना चाहता था, तो पिता जी के पास पैसे नहीं थे। तब भैया की नई-नई शादी हुई थी। इन्होंने अपनी शादी के लिए जमा किए गए पैसे मेरी फीस में भर दिए थे। इनकी खुद की छत टपकती थी, लेकिन इन्होंने मुझे शहर में हॉस्टल में रखा ताकि मैं पढ़ सकूँ।”
आर्यन ने महादेव के खुरदरे हाथों को अपने हाथों में लिया और ऊंचा उठाया।
“आप सब देख रहे हैं ये हाथ?” आर्यन ने मेहमानों से कहा। “ये हाथ सख्त हैं, काले हैं, बदसूरत लग सकते हैं। लेकिन इन हाथों में जो छाले हैं, वो मेरे लिए पड़े हैं। इन्होंने हल चलाया ताकि मैं कलम चला सकूँ। इन्होंने धूप सही ताकि मैं आज इस एसी में खड़ा हो सकूँ। यह घर, यह झूमर, यह मार्बल... यह सब इन फटे हुए कपड़ों वाले इंसान की देन है। यह घर मेरा नहीं है, यह इनका है। मैं तो बस इसका केयरटेकर हूँ।”
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। मिसेज कपूर, जो कुछ देर पहले नाक-भौं सिकोड़ रही थीं, अब अपनी आँखों के कोने पोंछ रही थीं।
निशा को लगा जैसे किसी ने उसे आईना दिखा दिया हो। वह अपनी झूठी शान और दिखावे में इतनी अंधी हो गई थी कि उसे प्यार और त्याग दिखाई ही नहीं दिया। उसे अपने महंगे सैंडल, अपनी डिज़ाइनर साड़ी और अपना परफेक्ट मेकअप सब बहुत छोटा और ओछा लगने लगा।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी। उसकी आँखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। वह महादेव के सामने गई और घुटनों के बल बैठकर उनके चरणों में अपना सिर रख दिया। उसने अपने माथे से उनकी धूल भरी चप्पलों को स्पर्श किया।
“अरे-अरे, ये क्या कर रही है बहुरिया?” महादेव हड़बड़ा गए और पीछे हट गए। “तू तो घर की लक्ष्मी है, उठ।”
निशा उठी, लेकिन उसने नज़रें नहीं झुकाईं। उसने महादेव का हाथ अपने हाथों में लिया।
“मुझे माफ़ कर दीजिए भैया,” निशा सिसक पड़ी। “मैं इस घर की दीवारों को सजाने में इतनी व्यस्त हो गई कि इस घर की नींव को ही भूल गई। मैं भूल गई थी कि नींव हमेशा ज़मीन के नीचे दबी रहती है, दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरी इमारत का बोझ उसी पर होता है। आप हमारे घर की नींव हैं। और नींव के बिना महल भी खंडहर होता है।”
उसने वह पुरानी अंगूठी आर्यन के हाथ से ली और उसे अपनी उंगली में पहन लिया, अपनी हीरे की अंगूठी निकालकर।
“आज से यह मेरी सबसे कीमती ज्वैलरी है,” निशा ने कहा। “और भैया, यह घर आपका है। आप गेस्ट रूम में नहीं, मास्टर बेडरूम में रहेंगे। और जब तक आप यहाँ हैं, इस घर का हर फैसला आप लेंगे।”
महादेव की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते हाथों से निशा के सिर पर हाथ रखा। “जीती रहो बेटी। आज तूने मुझे वो सम्मान दिया है जो शायद सगी बेटी भी न दे पाती। मेरा भाई बहुत किस्मत वाला है।”
निशा ने पीछे मुड़कर डीजे वाले को इशारा किया। अंग्रेजी संगीत बंद हो गया।
“भैया, आपको वो पुराने लोकगीत पसंद हैं न?” निशा ने पूछा। “आज हम वही सुनेंगे। और आज डिनर में इटालियन पास्ता नहीं, आपके लाए हुए घी और गुड़ के लड्डू सबसे पहले परोसे जाएंगे।”
उस रात, स्काईलाइन हाइट्स के उस आलीशान फ्लैट में एक अजीब नज़ारा था। शहर के सबसे अमीर और पॉश लोग, हाथों में गुड़ के लड्डू लिए, एक धोती-कुर्ता पहने किसान की बातें मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे।
निशा एक कोने में खड़ी होकर यह दृश्य देख रही थी। उसे महसूस हुआ कि घर ईंट-पत्थरों से नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट से बनता है। आज उसका गृह-प्रवेश सही मायनों में पूरा हुआ था, क्योंकि आज घर में सिर्फ फर्नीचर नहीं, बल्कि ‘संस्कार’ और ‘आशीर्वाद’ भी प्रवेश कर चुके थे।
उसने आर्यन का हाथ थामा और धीरे से कहा, “थैंक यू आर्यन, मुझे यह समझाने के लिए कि असली क्लास कपड़ों में नहीं, किरदार में होती है।”
आर्यन मुस्कुराया। बाहर शहर की रोशनी अब फीकी लग रही थी, क्योंकि घर के अंदर रिश्तों का उजाला उससे कहीं ज़्यादा चमकदार था।
लेखक : विनोद शुक्ल
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