अपूर्ण इच्छा

 सितंबर का महीना था। आसमान में बादल छाए हुए थे और हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। घर के आँगन में तुलसी चौरा के पास दीपक जल रहा था। पूजा का सामान सजा था और घर में गमगीन वातावरण के बीच सब लोग चुपचाप बैठे थे। आज सत्यनारायण की कथा नहीं, बल्कि पितृपक्ष का श्राद्ध था।

घर की बहू सावित्री सुबह से ही जुटी हुई थी—पूजा, साफ-सफाई, पकवान और मेहमानों का सत्कार। पंडित जी और रिश्तेदार भोजन कर तृप्त होकर विदा हो चुके थे। सबने उसकी मेहनत और स्वादिष्ट पकवानों की खूब प्रशंसा की।

सावित्री थकी-थकी रसोई से बाहर आई और चौकी पर बैठ गई। माथे से पसीना पोंछते हुए उसने गहरी सांस ली। थकान तो थी, लेकिन संतोष भी था कि आज का श्राद्ध अच्छे से सम्पन्न हुआ।

उसे याद आया, पंडित जी ने कहा था—
"बहू, आपने पितरों का मनपसंद भोजन बना दिया है। अब निश्चित ही उनकी आत्माएँ तृप्त होंगी।"

इन शब्दों से उसे थोड़ी शांति मिली।

रसोई से आती मीठी सुगंध अभी भी पूरे घर में फैली थी। विशेषकर पूरी और दाल के साथ बने लड्डुओं की। लड्डू सावित्री ने खासतौर पर अपने ससुर जी की पसंद याद रखकर बनाए थे।

उसके ससुर, गोविंद बाबू, को लड्डू बेहद प्रिय थे। वे कहते थे—
"जीवन में चाहे कितने भी व्यंजन खा लो, लेकिन लड्डू की मिठास मन को अलग ही तृप्ति देती है।"

गोविंद बाबू अकसर शाम को अपने बेटे से या बहू से कहते—
"बहू, कभी-कभार चार लड्डू बना दिया करो।"

लेकिन सावित्री अक्सर टाल जाती।
"अरे बापूजी, रोज-रोज मीठा खाना सेहत के लिए अच्छा नहीं। और वैसे भी बच्चे और पति मीठा ज्यादा खाते नहीं।"

कभी-कभी तो वह झुंझलाकर कह देती—
"इतनी उम्र हो गई है, अब भी यह मिठाई खाने की ज़िद? थोड़ा संयम रखिए।"

यह सुनकर गोविंद बाबू चुप हो जाते। उनके चेहरे पर एक हल्की उदासी उतर आती, पर वे कभी दोबारा ज़िद नहीं करते।

धीरे-धीरे लड्डुओं की जगह उनकी आँखों में बस इच्छा ही रह गई।

फिर एक दिन अचानक गोविंद बाबू की तबीयत बिगड़ गई। हार्ट अटैक से वे चल बसे। उनके जाने के बाद घर में शून्य सा छा गया। पर सावित्री को कहीं न कहीं यह सुकून था कि उसने उनके अंतिम दिनों में उनका खूब ध्यान रखा।

लेकिन जब भी रसोई में बेसन की खुशबू फैलती, उसे लगता जैसे बाबूजी की आँखें उसे देख रही हों और कह रही हों—
"बहू, बस चार लड्डू बना दे।"

उसकी आत्मा कांप जाती।

आज श्राद्ध के अवसर पर उसने विशेष रूप से बेसन के लड्डू बनाए थे। पंडित जी ने जब उन लड्डुओं को ग्रहण किया, तो सबने तारीफ की—
"बहुत अच्छे लड्डू बने हैं।"

सावित्री के होंठों पर मुस्कान आई और मन में विचार आया—
"आज तो बाबूजी की आत्मा अवश्य तृप्त हुई होगी।"

थोड़ी देर बाद वह खुद भी एक लड्डू लेकर आँगन में बैठ गई। धीरे-धीरे लड्डू का स्वाद जीभ पर घुलने लगा। आँखों के सामने बाबूजी की स्मृतियाँ तैरने लगीं।

तभी उसे लगा, जैसे हवा में कोई धीमी-सी फुसफुसाहट गूँज रही हो—
"बहू, बस चार लड्डू बना दे…"

सावित्री का दिल धक्-धक् करने लगा। उसने चारों ओर देखा—कोई नहीं था।

लेकिन वह आवाज़ दोबारा आई। इस बार और भी साफ़।
"बहू, आज बहुत जी कर रहा है लड्डू खाने का…"

सावित्री के हाथ से लड्डू की कटोरी छूट गई और ज़मीन पर लुढ़क गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। यादों का सैलाब उमड़ पड़ा।

उसे बाबूजी का वह उदास चेहरा याद आया जब उसने उनकी ज़िद टाल दी थी। वह खामोश चेहरा, जिसमें छुपी थी एक अपूर्ण इच्छा।

वह खुद से बुदबुदाई—
"बाबूजी… माफ़ कर दीजिए। जब आप जीवित थे, तब मैंने आपकी छोटी-सी चाह को नज़रअंदाज कर दिया। आज मैंने कितने लड्डू बनाए हैं, पर उनका क्या मूल्य जब आप खुद नहीं हैं इन्हें खाने के लिए!"

उसका हृदय ग्लानि और पश्चाताप से भर गया।

रात को जब सब सो गए, सावित्री देर तक आँगन में बैठी रही। उसकी आँखें आसमान के तारों पर टिकी थीं। उसे लग रहा था जैसे बाबूजी वहीं से उसे देख रहे हों।

वह सोचने लगी—
"हम अक्सर सोचते हैं कि पूजा-पाठ, दान-पुण्य, श्राद्ध करके पितरों को तृप्त कर देंगे। पर सच तो यह है कि जीवित रहते किसी की छोटी-सी इच्छा पूरी करना ही सबसे बड़ा धर्म है। जिस संतोष को हम जीते-जी किसी को दे सकते हैं, उसकी बराबरी मृत्यु के बाद कोई भी कर्मकांड नहीं कर सकता।"

उसके आँसू फिर बह निकले।

उस दिन के बाद सावित्री ने अपने बच्चों और परिवार के लिए संकल्प लिया—
"अब मैं किसी की भी छोटी-सी इच्छा अनदेखी नहीं करूँगी। चाहे वह कितनी भी सामान्य क्यों न हो। क्योंकि जीते-जी दी गई खुशी ही सच्चा पुण्य है।"

समय बीतता गया। पितृपक्ष हर साल आते रहे। सावित्री हर बार पकवान बनाती, लड्डू भी बनाती। लेकिन अब उन लड्डुओं का अर्थ केवल भोजन नहीं था, बल्कि पश्चाताप, प्रेम और सीख का प्रतीक था।

लोग जब कहते—
"बहू, तुम्हारे हाथ के लड्डू तो दिव्य लगते हैं।"

तो सावित्री मन ही मन कहती—
"ये मेरे बाबूजी की अपूर्ण इच्छा का प्रसाद हैं। आज वे जहाँ भी होंगे, मेरी सीख को देखकर तृप्त होंगे।"


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