"अगले महीने मेरी पंद्रहवीं सालगिरह है और मैं इस बार कोई बहाना नहीं सुनूंगी. मुझे वो डायमंड पेंडेंट चाहिए जो हमने उस दिन शोरूम के बाहर देखा था. और हाँ, डिनर के लिए 'स्काई व्यू' होटल में बुकिंग भी चाहिए." शिखा ने अपनी बात ऐसे रखी जैसे वह कोई निवेदन नहीं, बल्कि फैसला सुना रही हो.
सामने सोफे पर बैठे विमल ने अखबार से नज़रें हटाईं और एक गहरी, थकी हुई सांस ली. "शिखा, तुम जानती हो कि अभी बिजनेस में मंदी चल रही है. फैक्ट्री में दो मशीनों का काम रुका पड़ा है. ऐसे वक्त में इतना बड़ा खर्चा..."
"खर्चा-खर्चा-खर्चा! जब देखो तब बस यही राग अलापते रहते हो," शिखा ने बीच में ही बात काट दी. "शादी के पंद्रह साल हो गए विमल, आज तक मैंने जो माँगा, उसमें तुमने हमेशा कटौती ही की है. मेरी सहेली वंदना को देखो, उसके पति हर साल उसे विदेश घुमाने ले जाते हैं. और एक मैं हूँ, जिसे शहर के बाहर जाने के लिए भी तुम्हारे दस चक्कर लगाने पड़ते हैं."
पास ही बैठी उनकी चौदह साल की बेटी, आर्या, अपने फोन में गेम खेलते हुए बोली, "मॉम सही कह रही हैं डैड. आप हमेशा बिजी रहते हो. मेरे फ्रेंड्स पूछ रहे थे कि समर वेकेशन में हम कहाँ जा रहे हैं. मुझे तो बताते हुए भी शर्म आती है कि हम घर पर ही बैठकर लूडो खेलेंगे."
विमल ने अपनी बेटी की ओर देखा. आँखों में एक अजीब सा दर्द तैर गया, जिसे उसने पलक झपकाकर छिपा लिया. वह कुछ कहना चाहता था, समझाना चाहता था कि वह जो कुछ भी जोड़ रहा है, वह इन्हीं दोनों के सुरक्षित भविष्य के लिए है. लेकिन घर के माहौल में तर्कों के लिए जगह कम और शिकायतों के लिए जगह ज़्यादा थी.
"ठीक है," विमल ने हार मानते हुए कहा. "मैं कोशिश करूँगा. डायमंड पेंडेंट का वादा नहीं करता, लेकिन डिनर हम ज़रूर बाहर करेंगे."
शिखा के चेहरे पर थोड़ी राहत आई, लेकिन पूर्ण संतुष्टि नहीं. वह पैर पटकती हुई रसोई की ओर बढ़ गई.
अभी विमल ने दोबारा अखबार उठाया ही था कि उसका फोन बज उठा. स्क्रीन पर 'कौशिक भैया' का नाम फ्लैश हो रहा था. विमल के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. कौशिक उसका बड़ा चचेरा भाई था, जो पिछले दस सालों से परिवार से अलग, दूसरे शहर में रह रहा था. एक पुराने ज़मीन विवाद ने दोनों भाइयों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी कि होली-दिवाली पर भी फोन नहीं आते थे.
विमल ने झिझकते हुए फोन उठाया. "हलो... भैया?"
उधर से आवाज़ आई, लेकिन वह कौशिक की नहीं थी. कोई और था. "जी, क्या आप विमल जी बोल रहे हैं? मैं सिटी हॉस्पिटल से इंस्पेक्टर कदम बोल रहा हूँ."
विमल का दिल ज़ोर से धड़कने लगा. "जी... जी मैं विमल हूँ. सब ठीक तो है?"
"दरअसल, एक एक्सीडेंट केस आया है. कौशिक जी और उनकी पत्नी सुमिता जी का. उनकी कार हाईवे पर एक ट्रक से टकरा गई थी. उनकी हालत नाज़ुक है. उनके फोन के 'इमरजेंसी कॉन्टैक्ट' में आपका ही नंबर था. उनके साथ एक दस साल का बच्चा भी है, उसे खरोंचें आई हैं, पर वह बहुत डरा हुआ है. आप जितनी जल्दी हो सके, आ जाइए."
फोन कटते ही विमल के हाथ से अखबार गिर गया. सारे पुराने गिले-शिकवे, ज़मीन का वो झगड़ा, कोर्ट-कचहरी की बातें—सब एक पल में धुएं की तरह उड़ गए.
उसने शिखा को आवाज़ दी. शिखा रसोई से बाहर आई, उसके हाथ में चाय का कप था. विमल का पीला पड़ा चेहरा देखकर वह ठिठक गई.
"क्या हुआ? किसका फोन था?"
विमल ने कांपती आवाज़ में पूरी बात बताई. शिखा के चेहरे के भाव बदले. पहले झटका लगा, फिर एक पुरानी कड़वाहट उभर आई.
"कौशिक भैया? वही, जिन्होंने बाबूजी के जाने के बाद कोर्ट केस किया था? जिन्होंने भरे समाज में तुम्हें बेइज़्ज़त किया था? अब एक्सीडेंट हुआ तो हमारी याद आई?"
"शिखा, यह वक्त पुरानी बातों को कुरेदने का नहीं है," विमल ने जूते पहनते हुए कहा. "वे ज़िंदगी और मौत से लड़ रहे हैं. और वह बच्चा... छोटा सा कबीर, वह वहां अकेला है."
"तो क्या तुम उन्हें यहाँ लाने की सोच रहे हो?" शिखा ने तीखे स्वर में पूछा. "हमारा घर कोई धर्मशाला नहीं है विमल. और वैसे भी, अगले हफ्ते हमारी एनिवर्सरी है, मेरा मूड खराब मत करो. तुम जाकर देख आओ, पैसे-वैसे की मदद कर देना, पर उन्हें घर लाने की सोचना भी मत."
विमल ने एक पल के लिए अपनी पत्नी को देखा. उसे लगा कि शिखा का दिल पत्थर का हो गया है. लेकिन बहस करने का समय नहीं था. वह बिना कुछ बोले कार की चाबी उठाकर निकल गया.
हस्पताल पहुँचकर विमल को पता चला कि कौशिक और सुमिता आईसीयू में हैं. उनकी हालत बेहद गंभीर थी. बाहर वेटिंग एरिया की बेंच पर एक कोने में कबीर सिकुड़ा हुआ बैठा था. उसके घुटने पर पट्टी बंधी थी और चेहरे पर आंसुओं के सूखे निशान थे. विमल को देखते ही कबीर की आँखों में पहचान की एक हल्की सी चमक आई—शायद उसने कभी पुरानी तस्वीरों में अपने चाचा को देखा था.
विमल ने दौड़कर कबीर को गले लगा लिया. उस बच्चे का शरीर कांप रहा था.
"चाचू... मम्मी-पापा उठ नहीं रहे हैं," कबीर सिसक पड़ा.
"सब ठीक हो जाएगा बेटा, चाचू आ गए हैं," विमल ने अपने आंसू रोके.
दो दिन तक विमल हस्पताल में ही रहा. डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की, लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर था. तीसरे दिन सुबह, कौशिक और सुमिता ने दम तोड़ दिया. विमल पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उसे अपने भाई से न मिल पाने का, उससे माफ़ी न मांग पाने का गहरा अफ़सोस था. लेकिन उससे भी बड़ी चिंता कबीर की थी. दस साल का कबीर अब अनाथ हो चुका था.
अंतिम संस्कार के बाद, रिश्तेदार धीरे-धीरे छंटने लगे. सबकी ज़बान पर एक ही सवाल था—"अब इस बच्चे का क्या होगा?" कोई कह रहा था कि ननिहाल भेज दो, कोई कह रहा था कि हॉस्टल में डाल दो.
विमल ने कबीर का हाथ कसकर थाम रखा था. उसने फैसला कर लिया था. वह कबीर को अपने घर ले जाएगा.
जब विमल कबीर को लेकर घर पहुँचा, तो शाम हो चुकी थी. शिखा ने दरवाज़ा खोला. कबीर को विमल के साथ, हाथ में एक छोटा सा बैग लिए खड़ा देख, उसका चेहरा तमतमा गया.
"विमल, मैंने मना किया था न?" शिखा ने दरवाज़े पर ही रोकते हुए कहा.
"शिखा, यह अंदर आने का वक्त है, तमाशा करने का नहीं," विमल ने कबीर को अंदर करते हुए कहा. "बच्चा डरा हुआ है."
कबीर को गेस्ट रूम में सुलाने के बाद, ड्राइंग रूम में विमल और शिखा के बीच तीखी बहस छिड़ गई. आर्या भी अपने कमरे के दरवाज़े से कान लगाए सुन रही थी.
"तुम समझते क्यों नहीं विमल?" शिखा चिल्लाई. "महंगाई का ज़माना है. हमारी अपनी ज़रूरतों के लिए पैसे कम पड़ते हैं, आर्या की पढ़ाई, मेरी इच्छाएँ... और अब यह एक और जिम्मेदारी? और किसका बेटा? उस आदमी का जिसने हमें कोर्ट में घसीटा था? मुझे यह बच्चा इस घर में नहीं चाहिए."
"वह मेरा खून है शिखा!" विमल का सब्र टूट गया. "वह मेरे भाई की आखिरी निशानी है. उसके सिर पर कोई छत नहीं है. क्या करूँ? अनाथालय छोड़ आऊँ उसे? तुम इतनी बेरहम कैसे हो सकती हो?"
"हाँ, हूँ मैं बेरहम!" शिखा रो पड़ी. "क्योंकि मुझे अपना घर देखना है. मुझे पता है, कल को यह बड़ा होकर अपने बाप की तरह ही प्रॉपर्टी में हिस्सा मांगेगा. तब क्या करोगे? मैं अपनी बेटी का हक़ नहीं मारने दूँगी."
अगले कुछ दिन घर का माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा. कबीर अपने कमरे से बाहर नहीं निकलता था. वह सहमा रहता था. खाने की टेबल पर शिखा उसे ऐसे घूरती जैसे वह कोई अपराधी हो. आर्या भी उससे बात नहीं करती थी, उसे लगता था कि इस लड़के की वजह से डैड और मॉम में झगड़ा हो रहा है और शायद उसका डायमंड पेंडेंट वाला प्लान भी कैंसिल हो जाएगा.
एक दिन दोपहर को विमल ऑफिस में था. घर पर शिखा और बच्चे थे. शिखा अपने कमरे में सो रही थी. आर्या टीवी देख रही थी. अचानक रसोई से ज़ोरदार आवाज़ आई.
शिखा हड़बड़ाकर उठी और रसोई की तरफ भागी. वहां का नज़ारा देखकर उसकी चीख निकल गई. गैस खुली रह गई थी और शायद शॉर्ट सर्किट की वजह से पर्दे में आग लग गई थी. आग तेज़ी से फैल रही थी.
आर्या, जो पानी लेने आई थी, वह आग की लपटों के बीच फंस गई थी. वह डर के मारे कोने में दुबक गई थी और खांस रही थी. धुआं इतना ज़्यादा था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.
"आर्या!" शिखा चिल्लाई, लेकिन आग की लपटों ने रास्ता रोक रखा था. वह पानी की बाल्टी ढूँढ़ने के लिए बाथरूम की तरफ भागी.
तभी, गेस्ट रूम का दरवाज़ा खुला और कबीर बाहर निकला. उसने धुआं देखा और स्थिति को पल भर में समझ गया. बिना एक पल गंवाए, उसने सोफे पर रखा एक मोटा कंबल उठाया, उसे पास के एक्वेरियम के पानी में जल्दी से भिगोया और खुद को उसमें लपेटकर आग के बीच कूद पड़ा.
"कबीर, नहीं!" शिखा पीछे से चिल्लाई, लेकिन कबीर तब तक अंदर घुस चुका था.
कबीर ने आर्या को पकड़ा और उसे अपने गीले कंबल के नीचे ढक लिया. आग की लपटें कबीर के नन्हे हाथों को झुलसा रही थीं, लेकिन उसने आर्या को नहीं छोड़ा. वह उसे धकेलता हुआ, घिसटता हुआ रसोई से बाहर ले आया.
जैसे ही वे बाहर गिरे, शिखा ने दौड़कर दोनों को खींच लिया. उसने जल्दी से अग्निशामक यंत्र (Fire Extinguisher) का इस्तेमाल किया, जो सीढ़ियों पर लगा था, और आग बुझाई.
आर्या सुरक्षित थी, बस बुरी तरह खांस रही थी. लेकिन कबीर... कबीर का बायां हाथ और माथे का एक हिस्सा बुरी तरह जल गया था. वह दर्द से कराह रहा था, लेकिन उसकी नज़रें आर्या पर थीं.
"दीदी ठीक है?" उसने कराहते हुए पूछा.
शिखा सन्न रह गई. जिस बच्चे को वह बोझ समझ रही थी, जिस बच्चे को वह अपने पति के 'दुश्मन' का बेटा मान रही थी, उसने अपनी जान की परवाह किए बिना उसकी बेटी को बचाया था.
शिखा ने कबीर को गोद में उठा लिया. उसके आंसू कबीर के जले हुए हाथ पर गिर रहे थे.
"हाँ बेटा, दीदी ठीक है... तुम... तुम्हें बहुत दर्द हो रहा है न?" शिखा का गला रुंध गया. उसने तुरंत विमल को फोन किया और एंबुलेंस बुलाई.
हस्पताल में कबीर की मरहम-पट्टी हुई. डॉक्टर ने कहा कि जलने के निशान गहरे हैं, लेकिन समय के साथ ठीक हो जाएंगे.
रात को कबीर को नींद का इंजेक्शन दिया गया था. विमल और शिखा उसके बेड के पास बैठे थे. आर्या भी दूसरे कोने में बैठी थी, उसकी आँखों में पछतावा और कृतज्ञता दोनों थी.
विमल ने कबीर के सिर पर हाथ फेरा. "शिखा, अगर तुम्हें अब भी लगता है कि कबीर बोझ है, तो मैं इसे बोर्डिंग स्कूल भेजने का इंतज़ाम कर दूँगा. मैं नहीं चाहता कि तुम रोज़-रोज़ की चिकचिक में जिओ."
शिखा ने विमल का हाथ पकड़ लिया. उसकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी.
"मुझे माफ़ कर दो विमल. मैं अपनी स्वार्थ और पुरानी नफरत में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे एक मासूम बच्चे में सिर्फ 'दुश्मन' नज़र आ रहा था. आज अगर कबीर न होता, तो हमारी आर्या..." वह बोल नहीं पाई.
उसने झुककर कबीर के माथे को चूमा. "यह बोर्डिंग स्कूल नहीं जाएगा. यह यहीं रहेगा, हमारे साथ. यह हमारा बेटा है विमल. आर्या का भाई."
अगले हफ्ते विमल और शिखा की पंद्रहवीं सालगिरह थी. लेकिन कोई डिनर पार्टी नहीं हुई. कोई डायमंड पेंडेंट नहीं आया.
शाम को घर के लॉन में एक छोटी सी पार्टी थी. सिर्फ घर के लोग थे. शिखा एक व्हीलचेयर लेकर आई, जिस पर कबीर बैठा था. आर्या ने एक केक काटा जिस पर लिखा था - "हैप्पी एनिवर्सरी मॉम-डैड & वेलकम होम कबीर."
शिखा ने अपनी अलमारी से एक पुरानी मखमली डिब्बी निकाली. उसने उसे कबीर के हाथ में दिया.
"यह क्या है चाची?" कबीर ने मासूमियत से पूछा.
"यह तुम्हारे पिता की अमानत है," शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा. "यह पुश्तैनी सोने की चेन है, जो तुम्हारे दादाजी ने कौशिक भैया को दी थी. झगड़े के वक्त यह मेरे पास रह गई थी. मैं इसे लौटाना चाहती थी, पर कभी हिम्मत नहीं हुई. आज यह तुम्हें सौंपकर मैं अपना बोझ हल्का कर रही हूँ."
विमल ने अपनी पत्नी को देखा. आज उसके गले में डायमंड पेंडेंट नहीं था, लेकिन उसका चेहरा जिस संतोष और ममता से दमक रहा था, वह किसी भी हीरे से ज़्यादा कीमती था.
आर्या ने कबीर के हाथ से चिप्स का पैकेट लिया और बोली, "ए हीरो, अकेले-अकेले खाओगे? आधा मेरा है."
कबीर मुस्कुराया—एक निश्चिंत, सुरक्षित मुस्कान. उसे अपना घर मिल गया था.
विमल ने आसमान की तरफ देखा. उसे लगा जैसे तारों के बीच से कौशिक मुस्कुरा रहा है. पुरानी कड़वाहट आग में जलकर राख हो चुकी थी, और उस राख से एक नए रिश्ते का जन्म हुआ था—जो खून से नहीं, बल्कि प्यार और त्याग से बना था.
"तो, अगली बार समर वेकेशन में कहाँ चल रहे हैं?" कबीर ने अचानक पूछा.
सब एक साथ हंसे.
"जहाँ तुम कहो, छोटे नवाब," विमल ने कहा.
रात गहरी हो रही थी, लेकिन उस घर में एक नया सवेरा हो चुका था. यह कहानी अब घूमने-फिरने या रेस्टोरेंट के बिल की नहीं थी, यह कहानी थी दिलों के जुड़ने की, माफ़ी की, और इस अहसास की कि परिवार का मतलब सिर्फ 'हम' और 'हमारे बच्चे' नहीं होता, बल्कि वह हर शख्स होता है जो मुसीबत में आपके लिए खड़ा हो जाए.
मूल लेखिका
रश्मि प्रकाश
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