सुबह के आठ बजे थे। भीड़भाड़ वाले शहर की मेट्रो स्टेशन पर लोग भागते-दौड़ते अपने ऑफिस की तरफ जा रहे थे। उसी भीड़ में आदित्य भी था। आज उसका जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन था—उसकी पहली जॉब का इंटरव्यू।
आदित्य मध्यमवर्गीय परिवार से था। उसके पिता रेलवे में क्लर्क और माँ गृहिणी थीं। बचपन से ही घर में अनुशासन का माहौल था।
पिता अक्सर डांटते—
"आदित्य, पढ़ाई खत्म करके किताबें जगह पर रखो।"
"नल बंद किया या वैसे ही चलने दे दिया?"
"पंखा चल रहा है, और तू बाहर चला गया? कितनी बार कहा है बिजली बचाना सीख।"
माँ भी पीछे नहीं रहतीं।
"बेटा, खाना खाकर थाली सिंक में रख दिया करो।"
"जूते यहाँ-वहाँ फेंकना बंद करो।"
कभी-कभी आदित्य को लगता कि उसका जीवन बस टोकाटाकी से भरा हुआ है। कई बार उसने मन ही मन सोचा था कि "काश! जल्दी से नौकरी मिल जाए और इस रोक-टोक से मुक्ति मिल जाए।"
आज वही दिन था। आदित्य ने अच्छे कपड़े पहने, फाइल हाथ में ली और समय से पहले ऑफिस पहुँच गया। बाहर इंतजार कर रहे अन्य उम्मीदवारों के साथ वह भी बैठ गया।
दस बज चुके थे, पर इंटरव्यू शुरू नहीं हुआ।
इसी बीच आदित्य की नजर ऑफिस के गलियारे पर पड़ी। वहाँ की लाइट जल रही थी जबकि धूप अच्छी खासी थी। उसे माँ की डांट याद आई—"बेटा, बिजली की बर्बादी मत करो।"
उसने बिना सोचे लाइट बंद कर दी।
थोड़ा आगे बढ़ा तो देखा कि वॉटर कूलर से पानी टपक रहा है। पिता की आवाज कानों में गूंजी—"नल बंद करना सीख, पानी की हर बूँद कीमती है।"
उसने झुककर नल कस दिया।
सीढ़ियों से ऊपर चढ़ा तो देखा, बीच में एक कुर्सी रास्ता रोके रखी थी। आदित्य ने उसे किनारे कर दिया ताकि किसी और को परेशानी न हो।
आदित्य से पहले गए सभी उम्मीदवार जल्दी-जल्दी बाहर निकल रहे थे। किसी से कोई सवाल-जवाब नहीं हुआ था। आदित्य हैरान था।
उसका नंबर आया। उसने मैनेजर को अपनी फाइल दी। मैनेजर ने एक नजर फाइल पर डाली और मुस्कराते हुए कहा—
"कब से जॉइन कर सकते हो?"
आदित्य हक्का-बक्का रह गया।
"सर, क्या... क्या आपने मेरा इंटरव्यू नहीं लेना?"
मैनेजर ने हँसते हुए कहा—
"इंटरव्यू हो चुका है।"
"लेकिन सर, अभी तो आपने मुझसे कुछ पूछा भी नहीं।"
मैनेजर ने स्क्रीन की तरफ इशारा किया—
"बेटा, इस ऑफिस में हर जगह CCTV कैमरे लगे हैं। हमने किसी से सवाल नहीं किया। बस देखा कि कौन कैसा व्यवहार करता है। बाकी सब लोग आए, बैठे और अपने-अपने नंबर का इंतजार करने लगे। लेकिन तुम... तुमने लाइट बंद की, नल बंद किया, रास्ते से कुर्सी हटाई। यही है असली मैनेजमेंट।"
आदित्य की आँखें नम हो गईं।
मैनेजर ने आगे कहा—
"तुम्हें बधाई। तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें जो संस्कार दिए हैं, वही तुम्हें नौकरी दिला गए। याद रखो, डिग्री से ज्यादा मायने रखता है स्व-अनुशासन।"
उस दिन जब आदित्य घर लौटा तो सीधा माँ-पिता के पैरों में झुक गया।
"मा... पापा... आज समझ आया कि आपकी डांट असल में मेरी सबसे बड़ी ताकत थी।"
माँ ने मुस्कराते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा।
पिता बोले—
"बेटा, जो चीजें हम घर में सिखाते हैं, वही बाहर की असली परीक्षा में काम आती हैं।"
आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले। उसे अब समझ आया कि छोटी-छोटी आदतों और घर की टोकाटाकी ही जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा होती है।
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