रघुनंदन शर्मा की दुकान शहर में मशहूर थी, लेकिन वे अपनी सख्त ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। मिठाई की शुद्धता, नाप-तौल में ईमान, और ग्राहकों से मीठा व्यवहार—इन्हीं वजहों से उनका कारोबार अच्छा चल रहा था।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से वे परेशान थे। उनका बेटा सुमित, जो कॉलेज में पढ़ता था, अक्सर उनसे कहता—
"पापा, आप बहुत पुराने ख्यालात के हैं। आजकल दुकानों पर मिलावट करके ही लोग अमीर बन रहे हैं। आप भी थोड़ा समझदारी दिखाइए।"
रघुनंदन हर बार उसे डांटते—
"बेटा, धन वही अच्छा है जो ईमान से कमाया जाए। बेईमानी का पैसा कभी सुख नहीं देता।"
सुमित चुप हो जाता, लेकिन उसके मन में हमेशा यही रहता कि पापा बेवकूफ हैं।
एक दिन सुबह, जब दुकान खुली ही थी, तभी एक बुजुर्ग महिला वहाँ आई। उसका पहनावा बेहद साधारण था—फटी हुई धोती, सिर पर पुराना दुपट्टा। हाथ में एक थैला था और आँखों में झिझक।
वह धीरे-धीरे बोली—
"बेटा, आधा किलो रसगुल्ले देना।"
रघुनंदन ने तोलकर मिठाई पैक कर दी। लेकिन जैसे ही महिला ने अपने झोले से पैसे निकाले, उसके हाथ काँप रहे थे। उसने मुट्ठी भर सिक्के गिने—सिर्फ़ 60 रुपये थे। जबकि आधा किलो रसगुल्ले 120 रुपये के थे।
बुजुर्ग महिला हड़बड़ाकर बोली—
"बेटा, इतने ही पैसे हैं मेरे पास। अगर कम हों तो थोड़ा कम मिठाई दे दो।"
रघुनंदन के चेहरे पर करुणा आ गई। उन्होंने पैकेट उसके हाथ में देते हुए कहा—
"दादी, ये लो पूरा आधा किलो। पैसे जितने हैं उतने ही दे दो।"
महिला की आँखें नम हो गईं। वह बोली—
"बेटा, तूने तो मुझे अपने बेटे की याद दिला दी। मेरा बेटा तो इस दुनिया से चला गया। बहू और पोते मुँह मोड़ चुके हैं। तेरी मिठाई आज अकेले खाएगी नहीं, मेरे दिल को भी मीठा कर गई।"
यह कहकर उसने आशीर्वाद दिया और चली गई।
सुमित यह सब देख रहा था। उसने गुस्से से कहा—
"पापा, आप ऐसे ही गरीबों को मुफ्त मिठाई बाँटते रहेंगे तो दुकान बंद हो जाएगी। ये जमाना दया का नहीं, पैसा कमाने का है।"
रघुनंदन शांत स्वर में बोले—
"बेटा, कभी किसी के भूखे पेट या सूनी आँखों को मत तरसाओ। जो मिठाई आज मैंने दी है, उससे दुकान कम नहीं होगी, बल्कि आशीर्वाद से बढ़ेगी।"
सुमित ने मुँह बना लिया।
कुछ सालों बाद एक दिन
दोपहर को दुकान पर एक बड़ी कार आकर रुकी। उसमें से उतरे एक आदमी, जो शहर के नामी उद्योगपति थे—अजय मेहरा।
उन्होंने कहा—
"क्या आप रघुनंदन जी हैं?"
"जी, कहिए।"
अजय मेहरा ने मुस्कराते हुए कहा—
"बहुत साल पहले मेरी माँ यहाँ मिठाई लेने आई थीं। उन्होंने मुझे बताया था कि आपने आधे पैसे लेकर भी उन्हें पूरी मिठाई दी थी । माँ बहुत खुश थीं।"
रघुनंदन मुस्कराए—
"भाई साहब, वो तो मेरा फर्ज़ था।"
अजय मेहरा बोले—
"मैं चाहता हूँ कि आपकी मिठाई मेरी नई होटल चेन में सप्लाई हो। हम चाहते हैं कि आपकी शुद्धता और ईमानदारी हमारे ब्रांड से जुड़ें।"
यह सुनते ही सुमित की आँखें फटी रह गईं।
कुछ ही महीनों में शर्मा स्वीट्स की सप्लाई पूरे शहर में होने लगी। कारोबार दुगुना-तिगुना बढ़ गया।
रघुनंदन बेटे से बोले—
"देखा बेटा, ईमानदारी का फल देर से मिलता है, लेकिन मिलता जरूर है।"
सुमित की आँखों में पश्चाताप था। उसने कहा—
"पापा, मैंने हमेशा सोचा कि आप बेवकूफ हैं। लेकिन आज समझ आया कि असली दौलत लोगों का विश्वास और दुआएँ हैं।"
धीरे-धीरे शर्मा जी का नाम सिर्फ़ मिठाई की दुकान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोग उन्हें “ईमान वाले शर्मा जी” कहने लगे। हर गरीब, हर जरूरतमंद जानता था कि शर्मा जी की दुकान पर उसे भूखा नहीं लौटाया जाएगा।
0 टिप्पणियाँ