रीना जब अपने नए घर आई थी, तब वह बहुत उम्मीदें लेकर आई थी। माँ-बाप ने भले ही दहेज में बहुत सामान नहीं दिया था, लेकिन बेटी के अच्छे संस्कार और शिक्षा पर पूरा ध्यान दिया था। रीना एम.ए. पास थी, स्वभाव से बहुत सौम्य और धैर्यवान।
लेकिन घर की चौखट पर कदम रखते ही उसे सासु माँ की खीझ भरी आवाज़ सुननी पड़ी—
“बस, यही लेकर आई हो अपनी बहू को? न ढंग का फर्नीचर, न सोने के गहने। हमारी तो नाक ही कटवा दी।”
ससुरजी ने माहौल सँभालने की कोशिश की—
“भाग्यवान, रहने भी दो। लड़की में अच्छे संस्कार हैं, वही सबसे बड़ी पूँजी है।”
रीना ने चुपचाप घर में प्रवेश किया। उस दिन से उसके हिस्से में ताने, कटाक्ष और उपेक्षा आ गए। पति रवि भी अक्सर माँ का पक्ष लेता—
“तुम्हारे मायके वालों ने हमें खाली हाथ ठग लिया। कम से कम थोड़ा-बहुत तो सोचते।”
रीना मन ही मन रो लेती, लेकिन कभी शिकायत नहीं करती।
धीरे-धीरे रीना के दो बच्चे हुए। बच्चों की पढ़ाई और घर के काम में रीना दिन-रात लगी रहती। लेकिन सास के ताने नहीं रुके।
“देखो, छोटी बहू को। मायके से कितना सामान आया था। उसकी तो शान ही अलग है। और एक तुम हो, कुछ लाई ही नहीं।”
रीना सहन करती रही।
फिर घर में छोटे बेटे की शादी हुई। बहू सोनम आई। उसके मायके से बहुत सारा दहेज आया—बड़ा सोफा, डबल बेड, अलमारी, महँगे गहने और यहाँ तक कि एक कार भी।
घर में सबकी आँखें चमक उठीं। सासु माँ ने खुलेआम कहा—
“देखा रीना, बहू कैसी होती है। यही होती है असली शान।”
रीना चुप रही।
शुरू-शुरू में सोनम बहुत मीठा बोलती थी। लेकिन कुछ ही दिनों में उसका असली चेहरा सामने आ गया।
वह अक्सर कहती—
“ये घर-परिवार सब मेरे पापा की बदौलत चल रहा है। वरना आप लोगों की औकात ही क्या थी इतनी बड़ी कार रखने की?”
वह कामकाज से कतराती और छोटी-सी बात पर पति से झगड़ पड़ती। कभी बर्तन फेंक देती, तो कभी नौकरानी पर चिल्ला देती।
एक दिन बच्चों के सामने ही उसने सास से कहा—
“आप लोग तो मेरे पापा का लाया सामान इस्तेमाल करते हैं। थोड़ा एहसान मानिए।”
सास अवाक रह गईं।
धीरे-धीरे घरवालों को एहसास हुआ कि दहेज का सामान तो कुछ सालों में टूट-फूट जाता है, लेकिन बहू के अच्छे संस्कार और धैर्य ही घर को संभालते हैं।
सोनम का घमंड बढ़ता ही गया। आखिरकार, एक दिन उसने पति से कहा—
“मुझे अब अलग घर चाहिए। मैं यहाँ इन सबके साथ नहीं रह सकती।”
छोटा बेटा अपनी पत्नी के साथ अलग चला गया। और साथ में दहेज का सारा सामान भी ले गया।
घर में सन्नाटा छा गया। अब वही सास, जो रीना को सालों से ताने देती थीं, उसकी ओर देखने लगीं।
“बहू, तुमने इतने साल सहन किया। कभी शिकायत नहीं की। आज समझ में आया कि बहू का असली गहना उसका धैर्य और संस्कार हैं, न कि मायके का लाया सामान।”
पति रवि भी पछताने लगा। उसने रीना का हाथ पकड़कर कहा—
“मुझे माफ कर दो रीना। मैंने तुम्हें बहुत दुख दिए। पर अब कभी ताने नहीं दूँगा।”
रीना की आँखों से आँसू बह निकले। इतने सालों बाद उसका सम्मान लौट आया था।
मेरी एक सहेली थी सुजाता। हम दोनों अक्सर एक-दूसरे के घर आना-जाना करते थे। सुजाता का परिवार बड़ा प्रतिष्ठित था—पिता सरकारी अधिकारी, भाई आईएएस की तैयारी कर रहे थे और बहन डॉक्टर थी। घर के हर सदस्य के नाम के आगे कोई न कोई बड़ी डिग्री जुड़ी हुई थी।
लेकिन जब भी मैं उसके घर जाती, वहाँ एक चेहरा हमेशा चुपचाप कोनों में दिखाई देता—उसकी भाभी, रेखा भाभी। सांवला रंग, साधारण पहनावा और बेहद शांत स्वभाव। वह हमेशा घर के काम में लगी रहतीं, और अगर फुर्सत मिलती तो अपने कमरे में अकेली बैठ जातीं।
घर के लोग उनके साथ उतना अपनापन नहीं दिखाते थे। कभी-कभी सुजाता की माँ कह देतीं—
"पता नहीं, हमारे बेटे ने क्या सोचकर ये शादी की। न गोरी है, न डॉक्टर-इंजीनियर। बस होमसाइंस में ग्रेजुएट।"
रेखा भाभी बस मुस्करा देतीं। उनकी उस मुस्कान में एक गहरी सहनशीलता होती थी।
घर के सदस्य अक्सर उनकी पढ़ाई का मजाक उड़ाते।
"होमसाइंस! इसमें कौन-सा बड़ा ज्ञान होता है? रसोई-बासन से ज़्यादा कुछ नहीं।"
रेखा भाभी चुपचाप सब सुन लेतीं। वे किसी से बहस नहीं करतीं, न ही अपनी काबिलियत जताने की कोशिश। बस अपने काम में लगी रहतीं।
मैं कई बार सोचती थी कि यह महिला कितनी धैर्यवान है। हर कोई इन्हें अनदेखा करता है, पर ये किसी से शिकायत नहीं करतीं।
एक दिन का किस्सा है। सुजाता के घर बड़ी दावत थी। उनके पिता के रिटायरमेंट का समारोह था और बहुत से मेहमान बुलाए गए थे। घर में हलचल थी, सब लोग इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहे थे।
हॉल में बड़ी-बड़ी डाइनिंग टेबल सजी हुई थीं। अचानक, एक मेहमान की प्लेट हाथ से छूट गई और उसमें रखा गरम-गरम दूध पूरे फर्श पर फैल गया।
दूध इतना गरम था कि पास खेल रहे बच्चे चिल्ला उठे और सब लोग घबरा गए।
"अरे! अब इसे कैसे साफ करेंगे?"
"गरम दूध है, बच्चों के पैर जल जाएंगे।"
घर के लोग हड़बड़ा गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। कोई झाड़ू लाने भागा, कोई कपड़ा ढूंढने।
तभी रसोई से रेखा भाभी निकलीं। उनके हाथ में एक बड़ा बर्तन और कुछ अख़बार थे।
उन्होंने तुरंत अख़बारों को फर्श पर बिछा दिया। अख़बार ने दूध सोख लिया और फिर उन्होंने ऊपर से आटा छिड़क दिया। आटे ने बचा हुआ गाढ़ा दूध भी खींच लिया।
फिर उन्होंने बड़े आराम से सब कुछ बर्तन में समेटा और फर्श को गीले कपड़े से पोंछ दिया। कुछ ही मिनटों में हॉल बिल्कुल साफ और सुरक्षित हो गया।
सब लोग अचंभित रह गए।
एक मेहमान ने कहा—
"वाह! बहुत बढ़िया तरीका अपनाया आपने। वरना तो हम सब घबरा गए थे।"
दूसरा बोला—
"यह तो वाकई बहुत स्मार्ट आइडिया था। किसी इंजीनियर या डॉक्टर ने भी इतनी तेजी से उपाय नहीं बताया जितना इन्होंने किया।"
सुजाता के पापा की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने गर्व से कहा—
"यही तो है असली शिक्षा! जो संकट की घड़ी में काम आए।"
अब तक चुप बैठे घरवाले भी सोच में पड़ गए। जो बहू अब तक उपेक्षित थी, उसने चुटकियों में वह समस्या हल कर दी, जिसे देखकर सब परेशान हो गए थे।
सुजाता की माँ, जो अक्सर ताना देती थीं, पहली बार बोलीं—
"रेखा, तुमने तो आज सबकी इज्जत बचा ली। सच है, डिग्री चाहे कोई भी हो, हुनर और समझदारी ही असली पहचान है।"
रेखा भाभी ने बस मुस्कराकर कहा—
"माँ जी, मैंने तो वही किया जो मुझे सीखाया गया। होमसाइंस हमें सिर्फ खाना बनाना नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में घर सँभालना सिखाता है।"
उस घटना के बाद रेखा भाभी की स्थिति घर में बदल गई। लोग अब उन्हें सिर्फ "सांवली और साधारण" बहू नहीं मानते थे।
धीरे-धीरे घरवालों को समझ आया कि डिग्रियाँ भले ही बड़ी हों, लेकिन असली जिंदगी जीने के लिए व्यवहारिक ज्ञान ही सबसे काम आता है।
अब जब भी घर में कोई समस्या आती, सबकी नजरें अनायास ही रेखा भाभी की ओर चली जातीं।
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