शाम का समय था। रसोई से बर्तनों की खटपट की आवाज़ आ रही थी। अनामिका अपनी सास के लिए चाय बना रही थी। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकी और उसमें से सामान के साथ हँसते-खिलखिलाते हुए पायल उतरी। पायल, अनामिका की शादीशुदा ननद थी, जो मायके आई थी।
घर में उसका स्वागत हुआ। कुछ देर बाद सब खाना खाने टेबल पर बैठे तभी ननंद पायल बोली।
"भाभी! ये कैसी सब्जी बना दी आपने? नमक ज्यादा है और मसाले का तो कोई संतुलन ही नहीं। आपको खाना बनाना ही नहीं आता। सच कहूँ तो समझ नहीं आता भैया आपकी तारीफ़ कैसे करते रहते हैं!"
अनामिका ने थोड़ा संकोच और नरमी से कहा—
"दीदी, सुबह से बहुत काम था। मम्मी जी भी मंदिर गई थीं और मेरी तबीयत भी कुछ ठीक नहीं थी। हो सकता है थोड़ी भूल हो गई हो।"
पायल ने मुँह बनाते हुए कहा—
"अरे छोड़िए, बहाने तो सब जानते हैं। ननद आते ही भाभियों की तबीयत खराब हो जाती है।"
इतना सुनते ही अनामिका चुप हो गई। लेकिन तभी वहाँ सावित्री देवी (माँ) आ गईं। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा—
"बिल्कुल सही कहा तूने बेटा। ननद के आने पर भाभियों की तबीयत खराब हो ही जाती है। लेकिन कुछ भाभियाँ तब भी अपने ननद का सत्कार कर देती हैं, जबकि कुछ ननदें तो अपनी जिम्मेदारियों से भागकर मायके आकर बैठ जाती हैं, ताकि उन्हें सत्कार न करना पड़े।"
पायल चौंकी।
"मम्मी, आप मुझे ताना दे रही हो?"
सावित्री देवी ने शांत स्वर में कहा—
"नहीं बेटा, ताना नहीं, सच्चाई बता रही हूँ। तेरी भाभी की तबीयत सच में खराब थी, फिर भी उसने तुम्हारे लिए खाना बनाया। लेकिन तू? जब-जब तेरी ननद (तेरे पति की बहन) ससुराल आती है, तू यहाँ मायके भाग आती है। यह क्यों?"
पायल का चेहरा लाल हो गया। उसने गुस्से में कहा—
"ओह! तो ये मेरी सास ने आपकी कान भर दी होगी। वैसे भी वो लोग मुझे कभी पसंद नहीं आए। एक मेरी ननद है, जिसे बस बैठे-बैठे सब चाहिए। मम्मी, आपने मेरी शादी वहाँ क्यों करवाई? देखिए, भाभी के मज़े हैं। उनकी तो सास खुद उनकी तरफ है।"
सावित्री देवी ने गहरी सांस ली और कड़े स्वर में बोलीं—
"तेरी सास ने कुछ नहीं कहा। यह मैं खुद देखती हूँ। तू अपनी ससुराल की जिम्मेदारी से भागकर यहाँ आती है और भाभी पर ताने कसती है। बेटा, मत भूल कि मायका माँ के बाद भाभी से होता है और ससुराल ससुरालवालों से। अगर दोनों ही तुझे पसंद नहीं, तो रिश्ते का सहारा कौन देगा?"
पायल हैरान रह गई।
"मम्मी, आप आज इतनी सख्ती से मुझसे क्यों बात कर रही हो?"
सावित्री देवी ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
"क्योंकि यह मुझे पहले ही करना चाहिए था। रिश्तों को निभाना सीखना पड़ता है। अगर तू अपनी ननद का सत्कार नहीं कर सकती, तो तेरी भाभी तेरा क्यों करेगी? जब जब तू भागकर यहाँ आएगी, तब-तब तेरी भाभी मायके से लौट जाएगी।"
माँ की बात सुनकर घर में सन्नाटा छा गया।
पायल अब तक गुस्से में थी, लेकिन माँ के शब्द उसके दिल में चुभ गए। वह धीरे-धीरे चुप हो गई और अपने कमरे में चली गई। अनामिका भी रसोई में लौट गई, लेकिन उसकी आँखों में आँसू थे।
रात को जब सब सो गए, पायल नींद नहीं ले सकी। माँ की बातें बार-बार उसके कानों में गूंज रही थीं। उसे याद आया कि सचमुच जब उसकी ननद ससुराल आती है, तो वह काम करने से बचने के लिए मायके भाग आती है। वहाँ भी वह भाभी को ही नीचा दिखाने की कोशिश करती है।
"क्या सच में मैं ही गलत हूँ?" उसने खुद से पूछा।
अगली सुबह पायल जल्दी उठी। उसने सोचा कि आज माँ और भाभी की मदद करेगी। वह रसोई में गई और बोली—
"भाभी, आज नाश्ता मैं बनाऊँगी। आप बस आराम कीजिए।"
अनामिका चौंक गई, पर मुस्कराकर बोली—
"ठीक है दीदी।"
सावित्री देवी ने यह देखा तो संतोष की सांस ली। उन्हें लगा कि शायद उनकी बात का असर हुआ है।
दो दिन बाद पायल ससुराल लौटने लगी। जाते-जाते उसने माँ से कहा—
"मम्मी, आपने सही कहा था। रिश्तों को निभाना पड़ता है। मैं कोशिश करूँगी कि अब अपनी ससुराल और ननद से दूरी न बनाऊँ।"
सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—
"याद रख, बेटा, मायका और ससुराल दोनों रिश्तों के आधार हैं। अगर इन्हें ही तोड़ देगी तो जीवन में खालीपन रह जाएगा।"
पायल ने सिर झुका लिया।
समय बीतता गया। पायल धीरे-धीरे अपने स्वभाव में बदलाव लाने लगी। उसने ससुराल में ननद का सत्कार करना शुरू किया और मायके आने पर भाभी की मदद।
लोग कहते—
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