आशा की किरण

 गाँव की गली में हलचल मची हुई थी। आज हर किसी के चेहरे पर उदासी थी।

कविता की सूनी आँखों में आँसुओं की नमी साफ झलक रही थी। वह घर के आँगन में बैठी थी, दोनों बच्चों को कसकर सीने से लगाए। बड़ा बेटा आरव दस साल का था और छोटी बेटी आर्या अभी छह बरस की ही थी।

आज उसके जीवन का सबसे कठिन दिन था। उसके पति मयंक सड़क हादसे में चल बसे थे।

कविता के दिल से बार-बार यही चीख निकल रही थी—
"हे भगवान! क्यों हमें छोड़ गए? अब इन मासूमों का क्या होगा? मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि इतना बड़ा बोझ अकेले उठाना पड़ेगा।"

लोग चारों तरफ जमा थे। कोई कह रहा था—
"बेचारी, जवानी में ही विधवा हो गई। अब कैसे पालेगी दो-दो बच्चों को?"

दूसरा बोला—
"भाई, आजकल जमाना बहुत खराब है। औरत अकेली हो तो समाज सौ तरह की बातें बनाता है।"

तीसरा कह उठा—
"कविता पढ़ी-लिखी तो है, लेकिन नौकरी पाना इतना आसान भी कहाँ? और छोटे बच्चों को छोड़कर कहाँ जाएगी?"

लेकिन तभी किसी ने कहा—
"अरे, परिवार बड़ा है। पति की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता, लेकिन फिर भी अकेली तो नहीं है। अगर परिवार ने साथ दिया तो सब आसान हो जाएगा।"

बातें हो रही थीं, पर कविता की आँखें बस शून्य में टिकी थीं। उसका मन केवल यही सोच रहा था कि कल से रोटी कैसे बनेगी, बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी, और जीने का सहारा कहाँ से मिलेगा।

तेहरवीं की रस्म पूरी हुई। घर में बैठे रिश्तेदार और परिवारजन धीरे-धीरे अपने विचार रखने लगे। कविता का भाई बोला—
"आप  लोग  चाहें तो कविता और उसके बच्चों को अपने साथ ले जा सकते हैं। मायके में रहेगी तो चैन से रहेगी।"

यह सुनते ही कविता की सास, शांति देवी, ने दृढ़ स्वर में कहा—
"नहीं बेटा, कविता का घर यही है। यह परिवार ही इसका सहारा बनेगा। हम सब मिलकर इसे संभालेंगे।"

ससुरजी, रामनारायण जी, ने भी सिर हिलाकर कहा—
"हाँ, हमने निश्चय किया है कि कविता अपनी पढ़ाई पूरी करेगी। आगे चलकर नौकरी करेगी, ताकि कभी किसी पर निर्भर न रहना पड़े।"

यह सुनकर रिश्तेदार चौंक गए। गाँव के कई लोगों ने तंज कसा—
"क्या एक बहू को पढ़ाई कराकर नौकरी करवाओगे? अरे, विधवा औरत का काम है घर-गृहस्थी संभालना, बच्चों को पालना।"

लेकिन रामनारायण जी ने उनकी परवाह नहीं की। उन्होंने स्पष्ट कहा—
"दुनिया कुछ भी कहे, हमें अपनी बहू और उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना है।"

कविता को कॉलेज में दाखिला दिलाया गया। शुरू में उसे झिझक होती थी। समाज की बातें, लोगों की नजरें, सब उसे तोड़ देती थीं। लेकिन उसके ससुराल वालों ने हिम्मत नहीं टूटने दी।

उसकी जेठानियाँ उसके बच्चों का ख्याल रखतीं। कभी उन्हें स्कूल छोड़ आतीं, कभी खाना बनाकर खिलातीं। जेठ अपने भतीजे-भतीजियों की फीस भरते, कभी किताबें लाकर देते।

कविता धीरे-धीरे पढ़ाई में मन लगाने लगी। कई बार हार मानने का मन हुआ, लेकिन बच्चों की मासूम आँखें उसे संभाल लेतीं।

आरव कहता—
"माँ, पापा तो चले गए, लेकिन अब आप ही हमारी ताकत हो। आप हार मत मानना।"

आर्या उसके आँसू पोंछते हुए कहती—
"मम्मी, आप सबसे अच्छी हो। पापा भी यही चाहते होंगे कि आप हिम्मत मत हारो।"

इन मासूम लफ्ज़ों में कविता को जीने की ताकत मिलती।

कविता सुबह बच्चों को तैयार करके कॉलेज जाती। लौटकर उनके साथ पढ़ाई कराती, फिर देर रात तक खुद पढ़ती।

गाँव की औरतें ताने मारतीं—
"बहू होकर कॉलेज जाती है। पढ़-लिखकर क्या करेगी? न नौकरी मिलेगी, न सम्मान।"

कभी-कभी उसकी सास भी रो पड़तीं—
"लोग क्या-क्या बोलते हैं तेरा पीछा करके।"

लेकिन ससुरजी हमेशा कहते—
"लोग बोलते हैं तो बोलने दो। जब यही कविता एक दिन अपने पैरों पर खड़ी होगी, तब सबकी जुबान बंद हो जाएगी।"

सालों की मेहनत रंग लाई। कविता ने पढ़ाई पूरी कर ली और शिक्षक की नौकरी पा गई। उस दिन उसके परिवार ने ऐसा जश्न मनाया मानो किसी ने बड़ी जीत हासिल कर ली हो।

ससुरजी की आँखों में गर्व के आँसू थे। उन्होंने सबके सामने कहा—
"आज मेरी बहू ने साबित कर दिया कि अगर परिवार साथ हो तो कोई भी औरत अकेली नहीं है।"

गाँव के लोग जो पहले ताने कसते थे, अब तारीफ़ करने लगे।
"वाह, बहू ने तो चमत्कार कर दिया। हम सोचते थे कि यह टूट जाएगी, लेकिन इसने तो बच्चों का भविष्य संवार दिया।"


कुछ सालों बाद आरव डॉक्टर बनने की पढ़ाई करने लगा और आर्या भी स्कूल में अव्वल आने लगी। कविता अपने बच्चों को देखती तो उसके चेहरे पर संतोष झलकता।

वह अक्सर कहती—
"पति की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। लेकिन जब परिवार साथ हो, तो दुनिया का सबसे बड़ा दुख भी छोटा लगने लगता है।"

उसके जीवन ने यह सिखाया कि रिश्तों का असली मूल्य दुख के समय ही पता चलता है। जो लोग कहते थे कि "मुसीबत में अपने ही मुंह मोड़ लेते हैं," उनके लिए कविता का परिवार एक जीती-जागती मिसाल बन गया।

आपकी दोस्त

संगीता अग्रवाल


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