सुबह का समय था। अंजलि अपने आँगन में रखी तुलसी को जल चढ़ा रही थी। तभी मोहल्ले के बाहर से जोर-जोर से गाने-बजाने की आवाज़ें आईं। उसने देखा कि सामने वाली गली में फूलों से सजी एक बड़ी सी बस आकर रुकी है।
बस से परिवार के लोग उतरे, हाथों में माला, माथे पर चंदन का तिलक, और गले में "जय श्रीराम" लिखी गमछे। पूरे मोहल्ले के लोग जुट गए। ये थे उसकी पड़ोसन रुचि और उनका परिवार, जो रामेश्वरम और तिरुपति बालाजी की लंबी तीर्थयात्रा करके लौटे थे।
रुचि उत्साह से भरी हुई सीधे अंजलि के पास आई—
"अरे भाभी! क्या बताऊँ, इतना आनंद आया इस यात्रा में कि क्या कहूँ। तिरुपति के लड्डू खाए, रामेश्वरम के समुद्र स्नान में पाप धोए… लगता है जैसे अब तो मोक्ष पक्का हो गया।"
अंजलि मुस्कुराई, "बहुत अच्छा किया। भक्ति और यात्रा से मन भी प्रसन्न होता है।"
रुचि गर्व से बोली—
"हाँ भाभी, मैंने हर मंदिर में बड़े-बड़े दान दिए। लाखों रुपये चढ़ाए। ये भगवान का ही आशीर्वाद है कि इतने बड़े-बड़े दर्शन नसीब हुए।"
अंजलि बस चुपचाप सुनती रही। तभी गली से दौड़ता हुआ रुचि का छोटा बेटा आया और हांफते हुए बोला—
"मम्मी, मम्मी जल्दी चलो! दादाजी की तबीयत बहुत खराब है। पापा फोन पर बात कर रहे थे, डॉक्टर भी बुला लिया है।"
यह सुनकर अंजलि चौक गई। पर रुचि ने बच्चे को झिड़क दिया—
"चुप रहो। रोज-रोज के ड्रामे हैं। थोड़ा खाँस-खाँसकर बुढ़े लोग हम बच्चों को परेशान ही तो करते हैं।"
बच्चा फिर बोला—
"पर मम्मी, इस बार सच में बहुत बुरा हाल है।"
रुचि ने हाथ झटकते हुए कहा—
"अरे, रहने दे। तुझे क्या पता! अब तू घर जा, मैं आंटी से बातें करके आती हूँ।"
बच्चा मायूस होकर चला गया।
अंजलि यह सब सुन रही थी। उसने धीरे से कहा—
"रुचि, दादाजी की हालत खराब है। तुम्हें तुरंत जाना चाहिए।"
पर रुचि बेफिक्र अंदाज में बोली—
"अरे भाभी, आप तो जानती ही हैं, ये लोग नाटकबाज हैं। हर दूसरे दिन बीमारी का बहाना। सच कहूँ तो तंग आ गई हूँ इनसे। जब देखो तब सेवा का बोझ हम पर डालते हैं। चलिए, अब तो भगवान के दर्शन हो गए हैं। भगवान इनका भी भला करेंगे।"
इतना कहकर उसने अपने माथे पर हाथ रखा और बोली—
"उफ़, सफर बहुत थकाऊ रहा। जरा चार-पाँच घंटे आराम कर लूँ, फिर देखूँगी।"
वह हाथ हिलाकर विदा हो गई।
रुचि को जाते हुए अंजलि गहरी सोच में डूब गई। उसकी आँखों के सामने अपना बचपन घूम गया। उसे याद आया कि कैसे उसके दादाजी पूरे परिवार के लिए तपती धूप में खेतों में काम करते थे। फिर भी कभी थके नहीं।
"बुजुर्ग घर का आशीर्वाद होते हैं," अंजलि ने मन ही मन कहा।
"अगर यही बुजुर्ग न हों, तो आज हमारी जड़ ही कहाँ होती?"
वह सोचती रही—कैसा अजीब है, लोग हजारों-लाखों रुपये मंदिरों में चढ़ाते हैं, दूर-दूर तक यात्राएँ करते हैं, लेकिन घर के मंदिर समान माँ-बाप की सेवा उन्हें बोझ लगती है। क्या भगवान ऐसे भक्तों पर प्रसन्न होंगे?
उसी रात मोहल्ले में हलचल मच गई। खबर आई कि रुचि के ससुरजी का देहांत हो गया है।
पूरा मोहल्ला शोक में डूब गया।
रुचि के घर चीख-पुकार मच गई। बेटा फूट-फूटकर रो रहा था—
"मम्मी, अगर आप समय पर आतीं तो शायद दादाजी बच जाते। डॉक्टर कह रहे थे कि उन्हें परिवार की देखभाल और दवा की ज़रूरत थी।"
रुचि पत्थर सी खड़ी रह गई। उसकी आँखों के सामने मंदिरों में किए दान, चढ़ाए रुपये और हर जगह की भव्य यात्राएँ घूम रही थीं। पर सच यह था कि जिनके आशीर्वाद से यह सब संभव हुआ, उन्हीं के अंतिम समय में उसने लापरवाही कर दी।
अंजलि अपने आँगन में तुलसी के पास दीपक जलाकर प्रार्थना करने लगी। उसके मन से केवल यही आवाज निकल रही थी—
"हे देवी माँ, हे प्रभु, अपने घर के बड़ों की सेवा और उनका सम्मान ही सबसे बड़ा तीर्थ है। असली भक्ति वही है जिसमें हम माता-पिता को देवता मानें। मंदिरों में दान, पूजा और तीर्थ तभी सार्थक हैं जब घर के देवताओं यानी माँ-बाप और बुजुर्गों की देखभाल की जाए।"
आज भी जब मोहल्ले के लोग इस घटना का ज़िक्र करते हैं, तो कहते हैं—
"भक्ति केवल मंदिरों के चक्कर लगाने से नहीं होती। सच्चा तीर्थ तो घर की चौखट पर ही है, जहाँ माँ-बाप अपने बच्चों से प्रेम और सेवा की अपेक्षा करते हैं।"
रुचि ने भले ही हजारों रुपये भगवान के चरणों में चढ़ाए हों, पर उस दिन वह समझ गई थी कि भगवान का सबसे प्रिय दान बुजुर्गों की सेवा है।
दोस्तों धार्मिक आस्था और यात्राएँ तभी सार्थक होती हैं, जब हम अपने घर के बुजुर्गों का सम्मान करें। मंदिरों में लाखों रुपये चढ़ाने से बड़ा पुण्य है एक गिलास पानी अपने माँ-बाप को समय पर देना।
स्वरचित
(काल्पनिक)
ऋचा उनियाल बोंठीयाल
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