सुजाता के घर में कभी सात लोग रहते थे—माँ-पापा और पाँच भाई-बहन। पूरा घर हँसी-खुशी और चहल-पहल से भरा रहता था। पर वक्त कब खुशियाँ छीन ले, कौन जानता है। पहले पिता बीमारी से चल बसे, और फिर बहनों की शादियाँ हो गईं।
अब घर में सिर्फ़ माँ, सुजाता और छोटा भाई राकेश ही रह गए।
सुजाता ने पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी शुरू कर दी थी। घर का बोझ वही संभालती थी। माँ उम्रदराज़ थीं और बीमारी ने उन्हें और भी कमजोर बना दिया था।
राकेश पढ़ाई में कमजोर था, पर हठी बहुत था। जब उसकी शादी की बात आई तो उसने साफ़ कहा—
“अगर मेरी शादी सीमा से नहीं करवाई तो मैं जान दे दूँगा।”
सीमा एक तलाकशुदा औरत थी, जिसके साथ दस साल का बेटा भी था। माँ और सुजाता ने लाख समझाया कि ज़िम्मेदारी संभालना आसान नहीं होगा, पर राकेश अड़ा रहा। आखिरकार उसकी ज़िद पूरी करनी पड़ी।
शादी के शुरुआती दिनों में सब ठीक रहा, पर धीरे-धीरे घर के हालात बदलने लगे। सीमा का रवैया औरों के प्रति ठीक नहीं था। सास और ननद को ताने मारना, छोटी-छोटी बातों पर झगड़ना उसका रोज़ का काम हो गया।
राकेश हर बार अपनी पत्नी का पक्ष लेता।
“दीदी, तुम्हें क्यों हर बात में टोकना है? घर अब मेरा है, और मेरी बीवी जैसे चाहेगी वैसे चलेगा।”
सुजाता और माँ रात-रात भर रोते रहते, पर कोई सुनने वाला नहीं था।
पिता ने मरने से पहले 30 गज का छोटा-सा मकान माँ के नाम कर दिया था। माँ और सुजाता ने अपनी मेहनत से धीरे-धीरे कुछ और प्रॉपर्टी खरीदी, लेकिन सब कुछ माँ और भाई के नाम ही रहा।
अब राकेश यही चाहता था कि सब बेचकर पैसे उसके हाथ में आएं।
“माँ, सब बेचो और हमें बाँट दो। मुझे अभी पैसों की ज़रूरत है। मैं क्यों इंतज़ार करूँ?”
माँ ने इंकार किया।
“यह घर तुम्हारे पापा की निशानी है। इसे मैं नहीं बेचूँगी।”
तभी राकेश ने ज़हर उगलते हुए कहा—
“ठीक है माँ, अगर आप घर इस सुजाता को देने का सोच रही हैं तो संभाल भी यही करे। मुझे मत बुलाना।”
यह सुनकर माँ का दिल टूट गया।
सुजाता ने सोचा था कि कम से कम बहनें उसका साथ देंगी, पर वहाँ से भी निराशा मिली।
एक दिन उसने अपनी बड़ी बहन को फोन किया—
“दीदी, माँ की तबीयत बहुत खराब है। उनका शुगर बढ़ गया है, बी.पी. भी नियंत्रित नहीं हो रहा। ज़रा देखने आ जाओ।”
पर जवाब आया—
“तू ही तो उनके साथ रहती है, तुझे ही ज़िम्मेदारी मिली है। फिर तू तो नौकरी भी करती है, सब खर्चा संभाल सकती है। हम क्यों बीच में पड़ें?”
सुजाता का दिल छलनी हो गया।
“क्या माँ ने सिर्फ़ मुझे ही जन्म दिया था? क्या तुम सबकी पढ़ाई-लिखाई और शादी में उनका कोई योगदान नहीं था?”
लेकिन यह सवाल उसने अपने दिल में ही दबा लिया।
माँ को रोज़ इंसुलिन लगाना पड़ता था। उनकी हालत देख सुजाता का दिल पिघल जाता। वह नौकरी से लौटकर माँ के पास बैठती, उनका हाथ पकड़कर कहती—
“माँ, चिंता मत करो। जब तक मैं हूँ, आपको किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।”
माँ अक्सर कहतीं—
“बेटी, तू शादी कर ले। मेरे बाद तेरा सहारा कौन बनेगा?”
पर सुजाता हर बार टाल देती।
“माँ, मुझे आपकी चिंता है। मैं आपको अकेला छोड़कर कैसे जा सकती हूँ? मेरे लिए सबसे बड़ा सहारा आप ही हो।”
पड़ोस वाले अक्सर ताना मारते—
“सुजाता, तेरी उम्र निकल रही है। शादी कर ले वरना लोग बातें बनाएंगे।”
सुजाता सिर्फ़ मुस्कुराकर रह जाती।
“लोग तो हर हाल में बातें करेंगे। पर मेरी माँ को कौन संभालेगा? क्या शादी करके उन्हें अकेला छोड़ दूँ?”
उसके दिल में यही था कि जिसने पूरी ज़िंदगी अपनी संतान के लिए कुर्बान कर दी, क्या बुढ़ापे में उसे अकेला छोड़ना इंसाफ़ होगा?
एक दिन माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई। सुजाता उन्हें हॉस्पिटल लेकर दौड़ी। डॉक्टर ने कहा—
“इनका शुगर बहुत बढ़ा है। इंसुलिन समय पर नहीं मिली तो जान को ख़तरा है।”
सुजाता की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह बुदबुदाई—
“माँ, आप कुछ भी हो जाएँ, मैं आपको अकेला नहीं छोड़ूँगी।”
उस रात हॉस्पिटल में माँ का हाथ पकड़कर उसने सोचा—
“अगर यह घर मेरे हिस्से में आया है तो यह बोझ नहीं, आशीर्वाद है। माँ मेरे पास हैं, यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।”
समय धीरे-धीरे बीतता गया। भाई-बहनों से रिश्ता लगभग खत्म हो गया। राकेश ने कभी हालचाल नहीं पूछा। लेकिन सुजाता को कोई शिकायत नहीं थी।
वह कहती—
“जिस माँ ने अपनी पूरी ज़िंदगी हमारी परवरिश में लगा दी, उसके लिए सात जन्म भी कुर्बान हैं। अगर माँ मेरे हिस्से में आई हैं, तो यह मेरा सौभाग्य है। लोग समझें या न समझें, पर माँ मेरी ताक़त हैं।”
मूल लेखिका : निधि मितल
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