कर्मों का चक्र

 रमेश्वरी देवी की शादी को आज पैंतीस साल से अधिक हो चुके थे। उस समय वह गाँव की सबसे सुन्दर और तेज-तर्रार कन्या मानी जाती थीं। मायके में अकेली बेटी होने के कारण उन्हें बहुत लाड़-प्यार मिला था। माँ-बाप की इकलौती राजकुमारी पर कभी किसी बात का बंधन नहीं रहा। घर का कोई भी काम करना उन्हें पसन्द नहीं था, और सच कहें तो करने भी नहीं दिया गया था।

शादी हुई तो ससुराल एक बड़े संयुक्त परिवार में थी। रमेश्वरी के पति सुरेश कुमार रेलवे में क्लर्क थे, और उनके साथ परिवार में माँ-बाप, दो छोटे भाई और एक बहन भी रहते थे। गाँव-घर में सब लोग मिलजुल कर रहते थे, और यही संयुक्त परिवार उनकी सबसे बड़ी पूँजी थी।

लेकिन रमेश्वरी का स्वभाव शुरू से ही अलग था। वह मायके की आदतें लेकर आयी थीं—न ही वह रसोई में हाथ बँटाना चाहती थीं, न ही परिवार की औरतों के साथ बैठकर बातें करना। उनका मानना था कि "पति और पत्नी" ही घर का असली परिवार होते हैं, बाकी सब बोझ हैं।

शुरुआत के कुछ महीने तक सबने सोचा कि नई बहू है, धीरे-धीरे सीख जाएगी। लेकिन रमेश्वरी के स्वभाव में बदलाव नहीं आया। छोटी-छोटी बातों पर झगड़ना, ननद-देवर से दूरी बनाना और हर काम में आनाकानी करना, यही उनका स्वभाव बन गया।

आखिरकार, माँ ने बेटे सुरेश को समझाया—
"बेटा, घर की शांति सबसे बड़ी होती है। अगर रमेश्वरी को परिवार में रहना कठिन लगता है तो तुम दोनों अलग हो जाओ।"

सुरेश सीधे-साधे इंसान थे। माँ की बात मानकर उन्होंने अलग मकान किराए पर ले लिया।

अलग होकर रमेश्वरी को जैसे अपना "स्वर्ग" मिल गया। पति की अच्छी नौकरी, हर महीने नियमित तनख्वाह और बस दो लोग—न कोई सास-ससुर, न देवर-ननद। धीरे-धीरे बच्चों का जन्म हुआ—पहले बेटा, फिर बेटी और फिर दूसरा बेटा।

रमेश्वरी को अब किसी की परवाह नहीं थी। उन्होंने ससुराल के रिश्तेदारों से लगभग नाता तोड़ दिया। शादी-ब्याह या परिवार की बीमारी में भी वह बस औपचारिकता निभातीं। उन्हें लगता था कि बड़ा परिवार सिर्फ परेशानी है।

बच्चे बड़े होने लगे। सुरेश तनख्वाह से घर चलाते, बच्चों की पढ़ाई और खर्चा उठाते। रमेश्वरी को अपने मायके और पड़ोस में यह दिखाना अच्छा लगता था कि "हम अलग रहते हैं, हमें किसी की ज़रूरत नहीं।"

धीरे-धीरे बेटे-बेटी शादी लायक हो गए।

बड़ी बेटी की शादी अच्छे घर में हो गई। फिर बड़े बेटे की बारी आई। रमेश्वरी ने बहुत धूमधाम से बेटे की शादी की। लेकिन शादी के छह महीने बाद ही नई बहू घर में क्लेश करने लगी।

बहू नर्स थी और अस्पताल में नौकरी करती थी। वह कहती—
"मुझे सुबह-शाम नौकरी करनी है, मैं घर के कामों में नहीं झुक सकती। और फिर मैं क्यों आपके साथ रहूँ? हमें अपना अलग घर चाहिए।"

रमेश्वरी को यह सब सुनकर बड़ा अजीब लगा। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि जिस तरह उन्होंने खुद सास-ससुर को अपनाने से इनकार किया था, अब वही हाल उनकी बहू भी कर रही है।

उन्होंने बेटे से कहा—
"बेटा, अभी तो कुछ दिन हुए हैं, बहू को समझाओ।"

लेकिन धीरे-धीरे झगड़े बढ़ते गए। बहू ने बेटे पर दबाव डाला और आखिरकार बेटा अलग घर चला गया।

रमेश्वरी ने सोचा कि चलो, अभी दूसरा बेटा बाकी है। शायद उसकी पत्नी अच्छी निकले।

कुछ साल बाद छोटे बेटे की शादी की। लेकिन किस्मत ने यहाँ भी साथ नहीं दिया। छोटी बहू पहली बहू से भी अधिक तेज निकली। उसने आते ही घर में अपनी शर्तें रख दीं।

अब हालात और बिगड़ गए। दोनों बहुएँ आपस में भी झगड़तीं और रमेश्वरी से भी।

आखिरकार, सुरेश ने थक-हारकर दोनों बेटे-बेटों को अपने-अपने हिस्से का मकान दे दिया और खुद किराए के मकान में जाकर रहने लगे।

एक साल ही बीता था कि रमेश्वरी को अचानक लकवा मार गया। उनका एक हाथ और एक पैर बेकार हो गया, और बोलने की क्षमता भी आधी रह गई।

इलाज के दौरान अस्पताल में तो बहुएँ और बेटे औपचारिकता निभाते रहे, लेकिन घर लाकर सेवा करने की बात आते ही सब पीछे हट गए। कोई भी बहू उन्हें अपने घर रखने को तैयार नहीं थी।

सुरेश अकेले ही पत्नी की देखभाल करने लगे। सुबह से लेकर रात तक खाना बनाना, दवा देना, डॉक्टर के पास ले जाना—सब उनकी ही जिम्मेदारी बन गई।

आज इस घटना को दस साल हो गए हैं। रमेश्वरी अब थोड़ी बहुत चल-फिर सकती हैं, पर किसी काम के लायक नहीं रहीं।

कभी-कभी उनके मन में आता है कि उन्होंने अगर अपने सास-ससुर और रिश्तेदारों को सम्मान दिया होता, तो शायद आज उनके बुढ़ापे में बहुएँ भी साथ देतीं।

अब जब वह देखती हैं कि सुरेश अपनी सारी जिंदगी उनकी देखभाल में झोंक रहे हैं, तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं।

रमेश्वरी अक्सर सोचती हैं—
"क्या यही कर्म का फल है? मैंने जो बोया, वही आज काट रही हूँ।"

इस घटना से पूरा मोहल्ला और रिश्तेदार भी यही सीख लेते हैं कि "कर्म का चक्र यहीं पूरा होता है।" जिस तरह आप दूसरों को मान देंगे, वही सम्मान आगे चलकर आपको मिलेगा।

रमेश्वरी की कहानी आज भी गाँव-शहर में उदाहरण की तरह सुनाई जाती है। लोग कहते हैं—
"सास-ससुर से रिश्ता सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इंसानियत का पैमाना भी है।"


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ