चार धाम

 “कमल, चार धाम यात्रा की सारी बुकिंग हो गई है। अगले हफ्ते की पंद्रह तारीख को निकलना है। तुम अपना बैग तैयार रखना। बरसों पुराना सपना था कि रिटायरमेंट के बाद हम दोनों यार साथ में तीर्थ पर निकलेंगे, और अब जाकर वो वक्त आया है।”

महेश बाबू ने फोन पर अपने बचपन के दोस्त कमल से बड़े उत्साह के साथ कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, जैसे कोई बच्चा अपनी छुट्टियों की योजना बना रहा हो।

दूसरी तरफ खामोशी थी। थोड़ी देर बाद कमल की झिझकती हुई आवाज़ आई, “महेश... मुझे माफ़ कर दे यार। मैं इस बार नहीं जा पाऊँगा। तुम लोग होकर आओ।”

महेश बाबू को लगा जैसे कानों पर किसी ने हथौड़ा मार दिया हो। “क्या कह रहा है कमल? हमने छह महीने पहले यह प्लान बनाया था। और अब ऐन वक्त पर तुम मना कर रहे हो? भाभी जी की तबीयत तो ठीक है न?”

“हाँ-हाँ, विमला बिल्कुल ठीक है,” कमल ने जल्दी से सफाई दी। “असल में बात यह है कि आरव... मेरा पोता, उसने अपना नया स्टार्टअप शुरू किया है। एक ऑर्गेनिक फूड का बिज़नेस है। अभी शुरुआती दौर है, तो उसे मेरी ज़रूरत है।”

महेश बाबू का पारा चढ़ गया। “स्टार्टअप? अरे, आरव तो अभी कल का लड़का है। उसने एमबीए किया है, वो जाने उसका काम जाने। तुम तो बैंक से रिटायर हुए हो, तुम्हें आराम करना चाहिए। ये उम्र भजन-कीर्तन और यात्रा की है, या फिर से बही-खाते में सिर खपाने की?”

कमल ने समझाने की कोशिश की, “नहीं महेश, बात आराम की नहीं है। आरव को अनुभव की कमी है। उसे वेंडर से बात करना, एकाउंट्स संभालना, यह सब अभी सीखना है। अगर मैं चला गया तो यहाँ सब बिखर जाएगा। मैं अभी उसे मझधार में नहीं छोड़ सकता। तुम समझो न।”

महेश ने तल्खी से कहा, “मैं सब समझ रहा हूँ। तुमने अपने आप को घर का मुनीम बना लिया है। पहले पूरी ज़िंदगी बैंक की नौकरी में खपे, और अब जब अपनी ज़िंदगी जीने का वक्त आया, तो पोते की नौकरी कर रहे हो। यह मोह-माया है कमल, और कुछ नहीं।”

“महेश, यह नौकरी नहीं है...” कमल कुछ और कहना चाहता था, लेकिन महेश ने बात काट दी।

“रहने दे। तुझे नहीं आना तो मत आ। मैं अकेले ही चला जाऊँगा। पर याद रखना, तू अपनी आज़ादी गिरवी रख रहा है।”

महेश ने गुस्से में फोन काट दिया। वह बरामदे में टहलने लगे। उनका मन बहुत खट्टा हो गया था।

शाम को जब उनकी पत्नी, सरिता, चाय लेकर आईं, तो महेश बाबू का चेहरा उतरा हुआ था।

“क्या हुआ? कमल भाई साहब से बात हुई?” सरिता ने चाय का प्याला मेज़ पर रखते हुए पूछा।

“बात क्या होनी है? उन्होंने मना कर दिया,” महेश बाबू ने तुनककर कहा। “कह रहे हैं कि पोते का बिज़नेस संभालना है। बताओ, भला यह भी कोई बात हुई? सत्तर साल की उम्र में आदमी तीरथ-व्रत करता है या अचार-पापड़ बेचने वाले स्टार्टअप का हिसाब-किताब रखता है? मुझे तो लगता है, कमल के घर वालों ने उस पर दबाव डाल रखा है। बेचारा ‘न’ नहीं कह पाता होगा। बुढ़ापे में आदमी की हैसियत घर के एक कोने में पड़े पुराने फर्नीचर जैसी हो जाती है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर लो।”

सरिता ने शांति से अपनी चाय की चुस्की ली और बोलीं, “आप इतना क्यों भड़क रहे हैं? हो सकता है कमल भाई साहब को इसमें खुशी मिलती हो। हर किसी का रिटायरमेंट का मतलब सिर्फ माला जपना नहीं होता।”

“खुशी?” महेश बाबू हंसे, एक व्यंग्यात्मक हँसी। “अरे सरिता, तुम जानती नहीं हो। आजकल के बच्चे बड़े चालाक हैं। वे जानते हैं कि दादा जी रिटायर्ड हैं, फ्री बैठे हैं, तो चलो इन्हीं से बेगार करवा लेते हैं। तनख्वाह भी नहीं देनी पड़ेगी और काम भी हो जाएगा। कमल हमेशा से सीधा रहा है। पहले बेटे-बहू ने उसे निचोड़ा, अब पोता उसे काम पर लगा रहा है। उसका अपना कोई जीवन है या नहीं?”

महेश बाबू की नाराज़गी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। उन्हें लग रहा था कि उनका दोस्त एक जाल में फँस गया है और उसे बचाना उनका फ़र्ज़ है।

दो दिन बाद, महेश बाबू से रहा नहीं गया। उन्होंने सोचा कि एक बार कमल के घर जाकर उसे समझाना चाहिए। उसे एहसास दिलाना चाहिए कि यह वक्त उसका है, किसी और का नहीं। वह अपनी कार निकालकर कमल के घर की ओर चल पड़े।

कमल का घर शहर के दूसरे छोर पर था। जब महेश बाबू वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि घर के निचले हिस्से में, जो पहले गैराज हुआ करता था, अब एक छोटे से ऑफिस में तब्दील हो चुका था। बाहर एक बोर्ड लगा था— ‘ग्रीन रूट्स ऑर्गेनिक्स’।

महेश बाबू ने मन ही मन सोचा, “लो, घर को भी दुकान बना दिया। चैन से सोने की जगह भी नहीं छोड़ी।”

वह अंदर दाखिल हुए। अंदर का नज़ारा देखकर उनके कदम ठिठक गए।

हॉल में चार-पाँच युवा लड़के-लड़कियाँ लैपटॉप पर काम कर रहे थे। बीच में एक बड़ी मेज़ पर कमल बैठा था। लेकिन यह वो कमल नहीं था जिसे महेश जानते थे—थका हुआ, रिटायर्ड पेंशनर। कमल ने एक स्लीवलेस जैकेट पहन रखी थी, आँखों पर चश्मा था और वह हाथ में एक टैबलेट पकड़े हुए था। वह फोन पर किसी से बात कर रहा था।

“देखो गुप्ता जी,” कमल की आवाज़ में एक अधिकार और मज़बूती थी। “माल की क्वालिटी में रत्ती भर भी समझौता नहीं होगा। अगर आपका ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन रिन्यू नहीं हुआ है, तो पेमेंट होल्ड पर रहेगा। यह ‘ग्रीन रूट्स’ का असूल है। शाम तक कागज़ भेजिये।”

महेश बाबू दरवाज़े पर खड़े होकर यह सब देख रहे थे। कमल ने फोन रखा और पास खड़े एक लड़के को निर्देश दिया, “रोहित, इन्वेंटरी शीट अपडेट करो और आरव को बुलाओ।”

तभी कमल की नज़र दरवाज़े पर पड़ी। “अरे महेश! तू? यहाँ अचानक?”

कमल अपनी कुर्सी से उठकर तेज़ी से महेश की ओर आया और उन्हें गले लगा लिया। “आ, बैठ-बैठ। क्या सरप्राइज़ दिया है तूने।”

महेश बाबू अब भी हक्के-बक्के थे। “मैं तो तुझे समझाने आया था कि तू इस झमेले से निकल, लेकिन यहाँ तो तू...”

“यहाँ मैं ‘सीनियर एडवाइजर’ हूँ भाई,” कमल ने हँसते हुए कहा और एक कुर्सी महेश की ओर बढ़ाई। “आरव! देख कौन आया है, महेश अंकल आए हैं।”

आरव, जो अंदर के केबिन में था, बाहर आया। उसने आते ही महेश बाबू के पैर छुए। “नमस्ते अंकल! दादू अक्सर आपकी बातें करते हैं।”

महेश ने फीकी मुस्कान के साथ जवाब दिया। उन्होंने कमल की ओर मुड़कर कहा, “कमल, मैं देख रहा हूँ कि तुम बहुत व्यस्त हो। लेकिन क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस उम्र में इतना तनाव लेना सेहत के लिए ठीक नहीं है? हम लोगों ने चालीस साल नौकरी की है यार, अब तो सुकून चाहिए।”

कमल मुस्कुराया। उसने आरव को इशारा किया कि वह कॉफी भिजवाए। जब आरव चला गया, तो कमल ने महेश का हाथ अपने हाथ में लिया।

“महेश, सुकून किसे कहते हैं? सुबह उठकर अखबार पढ़ना, फिर टीवी देखना, दोपहर को सो जाना और शाम को पार्क में अपनी बीमारियों की चर्चा करना? मैंने रिटायरमेंट के पहले छह महीने यही किया। और सच मान, मैं डिप्रेशन में जाने लगा था। मुझे लगने लगा था कि मैं बेकार हो गया हूँ। दुनिया आगे बढ़ रही है और मैं एक जगह रुका हुआ हूँ।”

कमल ने अपनी बात जारी रखी, “फिर एक दिन आरव मेरे पास आया। वह परेशान था। उसके पास आईडिया था, जोश था, लेकिन अनुभव नहीं था। उसे नहीं पता था कि बैंक से लोन कैसे पास करवाते हैं या लोगों से काम कैसे निकलवाते हैं। मैंने बस उसकी मदद करनी शुरू की। और धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि जिस अनुभव को मैं 'पुराना' समझकर रद्दी की टोकरी में डाल चुका था, वह आज इन बच्चों के लिए सोने जैसा कीमती है।”

महेश ने तर्क दिया, “लेकिन कमल, यह तो उनका काम है। तुम क्यों पिस रहे हो?”

तभी आरव कॉफी लेकर आ गया। उसने ट्रे मेज़ पर रखी और बोला, “अंकल, दादू पिस नहीं रहे हैं, वो हमें पीसकर हीरा बना रहे हैं। सच कहूँ तो, यह कंपनी मेरी नहीं, हमारी है। जब मैं इन्वेस्टर्स के सामने घबराता हूँ, तो दादू ही संभालते हैं। इनकी वजह से हमारी कंपनी को क्रेडिबिलिटी मिलती है। और सबसे बड़ी बात...” आरव ने कमल के कंधे पर हाथ रखा, “दादू अब पहले से ज़्यादा फिट हैं। इनकी शुगर कंट्रोल में है, बीपी नॉर्मल है। क्योंकि अब इनके पास सुबह उठने की एक वजह है।”

महेश बाबू ने कमल के चेहरे को गौर से देखा। आरव सही कह रहा था। कमल के चेहरे पर वह झुर्रियों वाली थकान नहीं थी जो अक्सर उनके हमउम्र लोगों में दिखती थी। उनकी आँखों में चमक थी, जीवन था।

कमल ने कहा, “महेश, देख भाई, तूने कहा था कि मैं अपनी आज़ादी गिरवी रख रहा हूँ। लेकिन असलियत यह है कि मुझे यहाँ आज़ादी मिली है—अपने आप को फिर से साबित करने की आज़ादी। जब ये बच्चे मेरी सलाह को ध्यान से सुनते हैं और उसे लागू करते हैं, तो मुझे लगता है कि मैं ज़िंदा हूँ। चार धाम यात्रा तो मैं अगले साल भी कर लूँगा, भगवान तो वहीं रहेंगे। लेकिन यह जो 'कर्म-योग' का मौका मुझे मिला है, यह शायद दोबारा न मिले।”

महेश बाबू ने ठंडी हो चुकी कॉफी का घूँट भरा। उनके दिमाग में चल रही उथल-पुथल शांत हो रही थी। वे जिसे 'गुलामी' समझ रहे थे, वह दरअसल 'भागीदारी' थी। वे जिसे 'बोझ' मान रहे थे, वह 'उद्देश्य' था।

घर लौटते वक्त महेश बाबू गाड़ी खुद चला रहे थे, लेकिन उनका ध्यान कहीं और था। उन्हें अपनी दिनचर्या याद आने लगी। सुबह नाश्ते के बाद उनका सबसे बड़ा काम होता था—पार्क में जाकर दूसरे रिटायर्ड दोस्तों के साथ राजनीति और महँगाई पर बहस करना, और फिर घर आकर यह शिकायत करना कि दिन नहीं कट रहा।

घर पहुँचते ही उन्होंने देखा कि उनका बेटा, सुमित, लैपटॉप पर माथापच्ची कर रहा है। वह एक आर्किटेक्ट था और अक्सर नक्शों में उलझा रहता था।

महेश बाबू ने कोट उतारा और सीधे सुमित के पास गए।

“क्या हुआ बेटा? बहुत परेशान लग रहे हो,” महेश बाबू ने पूछा।

सुमित ने सिर उठाया, उसकी आँखें लाल थीं। “कुछ नहीं पापा, एक म्युनिसिपल प्रोजेक्ट का टेंडर भरना है। इसमें लीगल क्लॉज इतने पेचीदा हैं कि समझ नहीं आ रहा। वकील भी अभी फोन नहीं उठा रहा।”

महेश बाबू ने एक पल सोचा। वे सिविल डिपार्टमेंट से रिटायर हुए थे। सरकारी फाइलों और लीगल क्लॉज को उनसे बेहतर कौन समझ सकता था? लेकिन रिटायरमेंट के बाद उन्होंने कभी सुमित के काम में झाँका तक नहीं था, यह सोचकर कि “यह मेरा काम नहीं है।”

महेश बाबू ने कुर्सी खींची और सुमित के बगल में बैठ गए।

“ज़रा दिखा तो, कौन सा क्लॉज अटका हुआ है?”

सुमित हैरान रह गया। “पापा, आपको आराम करना होगा, आप क्यों...”

“अरे दिखा भी,” महेश बाबू ने लैपटॉप अपनी तरफ घुमाया। उन्होंने चश्मा ठीक किया और स्क्रीन पर नज़र गड़ाई। पाँच मिनट पढ़ने के बाद उनके चेहरे पर एक आत्मविश्वास भरी मुस्कान आ गई।

“अरे पगले, यह तो बहुत साधारण है। यह क्लॉज 4बी है। इसका मतलब है कि तुम्हें एनओसी पहले नहीं, बल्कि टेंडर पास होने के बाद जमा करनी है। ला, मैं ड्राफ्ट कर देता हूँ।”

सुमित का चेहरा खिल उठा। “सच पापा? मुझे लगा था कि इसमें हफ़्तों लग जाएंगे।”

अगले दो घंटे तक बाप-बेटे साथ बैठकर काम करते रहे। महेश बाबू ने देखा कि सुमित उन्हें कितनी प्रशंसा और राहत भरी नज़रों से देख रहा था। वह सम्मान, जो कहीं खो गया था, आज वापस उनकी मेज़ पर था।

रात को खाने की मेज़ पर महेश बाबू ने सरिता से कहा, “सरिता, वो चार धाम की यात्रा की टिकट कैंसिल करानी होगी।”

सरिता ने डरते हुए पूछा, “क्यों? क्या कमल भाई साहब की बातों से आप इतना नाराज़ हैं कि अकेले भी नहीं जाना चाहते?”

महेश बाबू मुस्कुराए—एक सुकून भरी मुस्कान। “नहीं, नाराज़ नहीं हूँ। बल्कि मैं कमल का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ। उसने मुझे समझाया कि असली तीर्थ कहीं बाहर नहीं, बल्कि वहां है जहाँ आप किसी के काम आ सकें। मैंने सुमित के प्रोजेक्ट में उसकी मदद करने का फैसला किया है। उसे मेरी ज़रूरत है, और सच कहूँ तो... मुझे भी उसकी ज़रूरत है।”

सरिता ने पति के चेहरे को देखा। वहाँ वर्षों बाद एक नया उत्साह था।

फोन की घंटी बजी। कमल का फोन था।

“हाँ महेश, घर पहुँच गया? अभी भी नाराज़ है क्या?”

महेश हँसा। “नाराज़ नहीं हूँ यार, जलन हो रही थी तुझसे। पर अब नहीं। मैंने भी अपना 'स्टार्टअप' ढूँढ लिया है। सुमित के साथ। अब हम दोनों 'वर्किंग ओल्ड मैन' हैं।”

कमल की ज़ोरदार हँसी गूँज उठी। “स्वागत है क्लब में, मेरे दोस्त! यात्रा का क्या?”

“यात्रा?” महेश ने खिड़की से बाहर चमकते चाँद को देखा। “यात्रा तो अब शुरू हुई है कमल। ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव को सिर्फ काटने के बजाय, उसे जीने की यात्रा।”

दोनों दोस्तों के बीच का वह फासला, जो सुबह एक गहरी खाई जैसा लग रहा था, अब एक मज़बूत पुल बन चुका था। वृंदा की कहानी में जहाँ अपेक्षाओं का बोझ था, यहाँ महेश और कमल की कहानी में उद्देश्य की उड़ान थी। रिश्तों की डोर सिर्फ कर्तव्यों से नहीं, बल्कि साझा सपनों और एक-दूसरे को समझने से बंधती है।

मूल लेखिका : हेमलता गुप्ता


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