नई शुरुआत

 “मिस्टर वर्मा आपकी पीठ थपथपाकर क्या कह रहे थे? बड़ी देर से आप दोनों के बीच खुसुर-पुसुर चल रही थी। ज़रा हम भी तो जानें कि रिटायरमेंट के बाद अब आपको कौन सी नई उपलब्धि मिल गई?”

पार्टी से लौटते ही कार की पिछली सीट पर बैठी सुमित्रा ने अपने पति दिवाकर से पूछा। उसकी आवाज़ में कौतूहल था।

दिवाकर ने रियर व्यू मिरर में पत्नी को देखा और एक उपेक्षापूर्ण हँसी हँसे। “अरे कुछ नहीं। वर्मा जी कह रहे थे कि तुम्हारा बेटा सावन बहुत अच्छा लिखता है। उसके किसी लेख की तारीफ कर रहे थे जो आज के अखबार में छपा है। कह रहे थे, ‘दिवाकर, तुम तो बैंकर थे, लेकिन बेटे ने कलम की धार पाई है, इसका श्रेय ज़रूर उसकी माँ को जाता होगा, क्योंकि तुम तो फाइलों से सिर नहीं उठाते थे’।”

दिवाकर ने स्टेयरिंग व्हील पर उंगलियाँ नचाते हुए तंज कसा, “अब तुम ही बताओ सुमित्रा, इसमें खुश होने वाली क्या बात है? लेखक बनना कोई करियर है? चार पैसे की कमाई नहीं और दुनिया भर की वाहवाही। वर्मा जी को क्या पता कि घर का राशन वाहवाही से नहीं, बैंक बैलेंस से आता है।”

सुमित्रा चुप रही। वह दिवाकर के स्वभाव से भली-भांति परिचित थी। दिवाकर के लिए सफलता का मतलब सिर्फ और सिर्फ ‘सुरक्षित सरकारी नौकरी’ और ‘पेंशन’ थी। कला, साहित्य, संगीत—ये सब उनके लिए अमीरों के चोंचले या बेकारों का समय काटने का ज़रिया भर थे।

लेकिन सुमित्रा जानती थी कि सावन की यह प्रतिभा कोई संयोग नहीं थी। यह वह बीज था जिसे सुमित्रा ने बरसों से अपने आँचल की छांव में सींचा था।

दिवाकर हमेशा चाहते थे कि सावन चार्टर्ड अकाउंटेंट बने या बैंक पीओ की तैयारी करे। बचपन से ही उस पर गणित और विज्ञान थोपा गया। जब सावन दस साल का था और उसने अपनी कविता दिवाकर को सुनाई थी, तो दिवाकर ने कॉपी फेंकते हुए कहा था, “ये तुकबंदी परीक्षा में नंबर नहीं दिलाएगी। पढ़ाई पर ध्यान दो।”

उस दिन नन्हा सावन बहुत रोया था। तब सुमित्रा ने उसे अपनी गोद में बिठाकर कहा था, “बेटा, तुम्हारे पापा पेड़ की जड़ें देखते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि आंधी में पेड़ गिर न जाए। लेकिन तुम पेड़ की शाखाएँ हो, तुम्हें आकाश छूना है। तुम लिखना मत छोड़ना। मैं हूँ न।”

और सुमित्रा ढाल बन गई। दिवाकर की डांट और सावन के सपनों के बीच की ढाल। उसने घर के खर्च में से पैसे बचाकर सावन को किताबें ला दीं। जब दिवाकर सो जाते, तो वह रात को सावन की लिखी कहानियाँ सुनती। वह सावन की पहली पाठक थी और सबसे बड़ी आलोचक भी।

दिवाकर को लगता था कि सुमित्रा एक साधारण गृहिणी है जिसे दुनियादारी की समझ नहीं है। लेकिन वे यह नहीं देख पाए कि सुमित्रा ने घर की चारदीवारी के भीतर ही सावन को उड़ने के लिए एक पूरा आसमान दे दिया था।

अगले दिन सुबह नाश्ते की मेज पर माहौल तनावपूर्ण था।

“सावन,” दिवाकर ने कड़क चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “मैंने गुप्ता जी से बात की है। उनकी कंपनी में अकाउंट्स डिपार्टमेंट में जगह खाली है। कल जाकर मिल लो। यह फ्रीलांसिंग और ब्लॉगिंग का तमाशा अब बंद करो। पच्चीस साल के हो गए हो, कब तक पिता के पैसों पर पलोगे?”

सावन ने अपनी माँ की ओर देखा। सुमित्रा ने आँखों से ही उसे शांत रहने का इशारा किया।

“पापा, मुझे उस नौकरी में कोई दिलचस्पी नहीं है। मुझे एक बड़े पब्लिशिंग हाउस से ऑफर आया है। वे मेरी किताब छापना चाहते हैं,” सावन ने हिम्मत करके कहा।

“किताब?” दिवाकर का पारा चढ़ गया। “किताब छापकर क्या करोगे? उसे रद्दी वाले को बेचोगे? बेटा, हकीकत में जीना सीखो। यह शौक तब अच्छे लगते हैं जब जेब में पैसा हो। मैंने पूरी ज़िंदगी घिस-घिसकर यह घर बनाया है ताकि तुम ऐश कर सको, इसका मतलब यह नहीं कि तुम अपना भविष्य बर्बाद कर लो।”

सावन कुछ बोलने ही वाला था कि सुमित्रा ने बीच में टोक दिया।

“सुनिए, चाय ठंडी हो रही है। और सावन, तुम अपने कमरे में जाओ। मुझे तुम्हारे पापा से कुछ बात करनी है।”

सावन के जाने के बाद सुमित्रा ने दिवाकर की ओर देखा। उसकी नज़र में आज वह संकोच नहीं था जो आमतौर पर होता था।

“आप सावन को गुप्ता जी के पास नहीं भेजेंगे,” सुमित्रा ने दृढ़ता से कहा।

दिवाकर चौंक गए। “क्या मतलब? तुम मुझे सिखाओगी कि बेटे का भला किसमें है? यह सब तुम्हारा ही चढ़ाया हुआ है। तुम औरतों को बस भावनाओं में बहना आता है, रोटी कमाने का दर्द तुम क्या जानो?”

सुमित्रा ने गहरी साँस ली। “मैं रोटी कमाना नहीं जानती, पर रोटी का स्वाद जानती हूँ दिवाकर। आपने सावन को पाल-पोसकर बड़ा किया, उसे छत दी, इसके लिए मैं आपकी आभारी हूँ। लेकिन आप उसे मशीन बनाना चाहते हैं। मैंने उसे इंसान बनाने की कोशिश की है। अगर वह आज अपने सपनों को मारकर अकाउंटेंट बन भी गया, तो वह अमीर ज़रूर हो जाएगा, लेकिन खुश कभी नहीं रहेगा। क्या आप अपने बेटे को जिंदगी भर कुढ़ते हुए देखना चाहते हैं?”

“खुशी से पेट नहीं भरता सुमित्रा!” दिवाकर चिल्लाए।

“और भरे हुए पेट के साथ खाली आत्मा लेकर जीने का क्या मतलब?” सुमित्रा ने पहली बार आवाज़ ऊंची की। “मैंने अपनी ज़िंदगी आपकी शर्तों पर जी ली दिवाकर। अपनी पेंटिंग का शौक छोड़ दिया क्योंकि आपको घर में पेंट की महक पसंद नहीं थी। मैंने खुद को बदल लिया क्योंकि मुझे गृहस्थी बचानी थी। लेकिन मैं सावन को ‘दूसरा दिवाकर’ या ‘दूसरी सुमित्रा’ नहीं बनने दूँगी। उसे सावन ही रहने दीजिये। उसे एक मौका दीजिये। अगर वह एक साल में सफल नहीं हुआ, तो वह वही करेगा जो आप कहेंगे।”

दिवाकर सन्न रह गए। उन्होंने सुमित्रा का यह रूप कभी नहीं देखा था। वह शांत पत्नी, जो उनकी हर बात पर सिर झुका देती थी, आज बेटे के सपनों के लिए चट्टान बनकर खड़ी थी।

दिवाकर बड़बड़ाते हुए उठ गए। “ठीक है, ठीक है। जो करना है करो। लेकिन जब यह लड़का ठोकर खाकर गिरेगा, तो मेरे पास रोते हुए मत आना।”

एक साल बीत गया।

सावन ने दिन-रात एक कर दिया। सुमित्रा उसे रात-रात भर कॉफी बनाकर देती रही। दिवाकर ने बेटे से बात करना लगभग बंद कर दिया था। उन्हें लगता था कि उनका बेटा हाथ से निकल गया है। वे अपने दोस्तों से सावन का ज़िक्र करने में कतराते थे।

फिर वह शाम आई।

शहर के प्रतिष्ठित ‘लिटरेचर फेस्टिवल’ में सावन की पहली किताब का विमोचन था। हॉल खचाखच भरा था। सावन ने जिद करके अपने पिता को भी बुलाया था। दिवाकर बेमन से गए थे, सबसे पीछे वाली सीट पर बैठकर घड़ी देख रहे थे कि कब यह तमाशा खत्म हो और वे घर जाएं।

मंच पर सावन का नाम पुकारा गया। तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज उठा। सावन ने माइक संभाला।

“आज यह पुरस्कार, यह सम्मान, यह सब अधूरा है अगर मैं उन दो लोगों का शुक्रिया अदा न करूँ जिनकी वजह से मैं यहाँ हूँ,” सावन ने भावुक होकर कहा। “मेरे पिता, जिन्होंने मुझे अनुशासन सिखाया, जिन्होंने मुझे सिखाया कि जीवन में संघर्ष के बिना कुछ नहीं मिलता...”

दिवाकर थोड़ा सीधा होकर बैठे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सावन उनका नाम लेगा।

“...और मेरी माँ,” सावन की आवाज़ भर्रा गई। “जिन्होंने मुझे तब उस सपने पर विश्वास करना सिखाया जब मुझे खुद पर भी भरोसा नहीं था। पापा ने मुझे पैरों पर खड़ा होना सिखाया, लेकिन माँ ने मुझे उन पैरों से उड़ना सिखाया।”

सावन ने अपनी किताब उठाई। उसका शीर्षक था— ‘अनकही: एक माँ का मौन’

“यह किताब मेरी माँ के उन अधूरे सपनों को समर्पित है जिन्हें उन्होंने अपनी गृहस्थी की वेदी पर होम कर दिया। माँ, यह आपकी जीत है।”

पूरा हॉल खड़ा होकर तालियां बजा रहा था। दिवाकर ने देखा कि उनकी बगल में बैठे लोग, जो शहर के बड़े बुद्धिजीवी और अफसर थे, उनकी पत्नी सुमित्रा की ओर प्रशंसा भरी नज़रों से देख रहे थे।

दिवाकर ने सुमित्रा की ओर देखा। सुमित्रा की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन चेहरे पर एक ऐसा तेज था जो दिवाकर ने पिछले तीस सालों में कभी नहीं देखा था। वह गर्व का तेज था। वह एक सृजनकर्ता का तेज था।

कार्यक्रम के बाद, लोगों की भीड़ सावन को घेरे खड़ी थी। एक बड़े पत्रकार दिवाकर के पास आए।

“अरे दिवाकर जी! कमाल कर दिया आपके बेटे ने। मैंने उसकी किताब पढ़ी है। उसमें एक किरदार है—एक पिता, जो ऊपर से सख्त है पर अंदर से नारियल जैसा। सावन ने लिखा है कि उस पिता की सख्ती ने ही उसे बागी और बेहतर लेखक बनाया। आप बहुत किस्मत वाले हैं।”

दिवाकर अवाक रह गए। सावन ने उनकी सख्ती को भी सकारात्मक रूप में लिया था?

भीड़ छंटने के बाद सावन अपने माता-पिता के पास आया। उसके हाथ में ट्रॉफी थी। उसने वह ट्रॉफी पिता के हाथों में रख दी।

“पापा, यह आपके लिए। अगर आपने मुझे ‘ना’ नहीं कहा होता, तो शायद मुझमें खुद को साबित करने की इतनी जिद नहीं आती।”

दिवाकर के हाथ कांप रहे थे। जिस ट्रॉफी को वे ‘बेकार का खिलौना’ समझते थे, आज उसका वजन उन्हें बहुत भारी लग रहा था—यह वजन था बेटे की मेहनत और पत्नी के त्याग का।

दिवाकर ने सावन को गले नहीं लगाया, क्योंकि वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में कच्चे थे। लेकिन उन्होंने अपना हाथ सावन के कंधे पर रखा और हल्का सा दबाया। यह स्पर्श सावन के लिए हजारों शब्दों से बढ़कर था।

फिर दिवाकर सुमित्रा की ओर मुड़े।

“सुमित्रा,” दिवाकर ने धीमी आवाज़ में कहा। “चलो, घर चलते हैं। और सुनो... घर के स्टोर रूम में तुम्हारा वो पुराना पेंटिंग का सामान पड़ा है न? उसे निकाल लो। कल रविवार है, मुझे भी देखना है कि तुम कैनवस पर क्या जादू करती हो।”

सुमित्रा ने चौंककर पति को देखा। दिवाकर की नज़रें झुकी हुई थीं। वे अपनी गलती मान रहे थे, बिना शब्द बोले। वे समझ चुके थे कि घर सिर्फ ईंट-पत्थर और बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सपनों का सम्मान करने से बनता है।

गाड़ी में वापस लौटते समय, दिवाकर ने सावन से पूछा, “बेटा, तुम्हारी अगली किताब किस बारे में है?”

“पापा, अगली किताब एक रिटायर्ड बैंकर के बारे में है जो अपनी दूसरी पारी में पेंटर बनना चाहता है,” सावन ने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा।

कार में पहली बार तीनों एक साथ हँसे। वह हँसी, जो किसी उपलब्धि पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने पर खिली थी।

दिवाकर ने महसूस किया कि आज वह हारकर भी जीत गए थे। उनका अहंकार हार गया था, लेकिन एक पिता और एक पति जीत गया था। उन्होंने अपनी पत्नी को सिर्फ 'गृहणी' समझा था, लेकिन आज उन्हें एहसास हुआ कि वह एक मूक शिल्पकार थीं, जिन्होंने बिना छेनी-हथोड़े के, सिर्फ अपने प्रेम और विश्वास से एक साधारण से पत्थर को भगवान की मूरत बना दिया था।

रात के सन्नाटे में, जब दिवाकर लेटे थे, तो उन्हें लगा कि जीवन का बैलेंस शीट अब जाकर टैली हुआ है। क्रेडिट पक्ष में पैसा कम था, लेकिन सुकून और गर्व का खाता लबालब भरा था। और इस खाते की असली मैनेजर सुमित्रा थी, जिसने कभी अपनी मेहनत का लाभांश (dividend) नहीं माँगा था।

उस रात, दिवाकर ने पहली बार अपनी पत्नी को 'धन्यवाद' नहीं कहा, बल्कि उसके लिए सुबह की चाय बनाने का अलार्म लगा दिया। बदलाव छोटा था, लेकिन कहानी पूरी बदल चुकी थी।

लेखिका : रश्मि तनेजा


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