कलेजे पर सांप लोटना

 आज मौलि बड़े सबेरे ही उठ गई थी, उसके बुटीक का उद्घाटन समारोह होने जा रहा था। मोहल्ले में सभी को उसने समारोह में बुलाया था। ये सब देख कर पड़ोस में रहने वाली उसकी मुंहबोली चाची  के कलेजे पर सांप लोट रहे थे। 

मौलि बचपन से ही पढ़ने और घर के अन्य कामों में होशियार थी। उसके बाबा एक सड़क दुर्घटना में अपाहिज हो अपनी नौकरी खो चुके थे। मां बीना दुसरो के घरों में बर्तन मांजती, खाना बनाती और देर रात तक कपड़े सिलती...तब भी किसी तरह उनकी गाड़ी चल रही थी क्योंकि बाबा के इलाज में उन्हें बहुत पैसे लग जाते थे।

बीना की पड़ोसन सविता एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में मशीन चलाने का काम करती थी वह ज्यादा तो नही बस दसवीं पढ़ी थी लेकिन अच्छा कमा लेती थी मौलि ने कई बार अपनी चाची से उसकी दुकान में इसी तरह का काम दिलवाने को कहा पर चाची कहती कि... एक तो  लड़की जात, दूसरा दुकान पर जाकर काम करेगी, वंहा दस तरह के लोगों का आना जाना होता है कोई ऊंच नीच हो गयी तो मैं क्या करूंगी,और फिर ये काम बहुत मेहनती है न बाबा न तुम अपनी मां की तरह ही सिलाई झाड़ू बर्तन या खाने का काम करो। ये सुनकर मौलि और बीना को बहुत दुख होता।

जैसे तैसे मौलि ने बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली। उसकी मां जिन घरों में काम करती उनमे से सह्रदय मालिनी मैडम थी उनके पति बैंक में  मैनेजर थे।मौलि की कुशलता व तीव्र बुद्धि देखकर उन्होंने ही मौलि को फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने को कहा। अपने घर पर रखकर सिलाई मशीन की अन्य बारीकियां सिखाई बदले में मौलि उनके बच्चों को होम ट्यूशन देती थी।

धीरे धीरे मौलि और बीना का संघर्ष और मेहनत रंग लाई, मौलि ने अपना कोर्स पूरा कर लिया। अब जरूरत थी थोड़े रुपयों की जिससे बुटीक का थोड़ा बहुत समान खरीद जा सके। मौलि ने मालिनी जी के पति की मदद से बैंक से लोन लिया कुछ मशीन कपड़े लेस जैसी बेसिक चीजें खरीदी और एक सहायिका रखकर अपना काम शुरू किया। काम चल निकला तब उसने दो अन्य सहायक और रख लिए। मौलि ने अपनी मां का घरों में काम करना बंद करवा दिया। अब उसकी मां उसके बुटीक में गरीब और जरूरतमंद लड़कियों को निःशुल्क सिलाई सिखाया करती थी। 

स्वरचित व अप्रकाशित 


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ