राजू और श्रवण दोनो बचपन से साथ खेले कूदे साथ बड़े हुए । दोनो को क्रिकेट खेलना बहुत पसंद था । कॉलेज क्या अपने शहर में वो जय वीरू के नाम से प्रसिद्ध थे । दोनो का हमेशा से अच्छे खिलाड़ियों में शुमार होता था । उनके कोच उन्हें हमेशा कहते थे कि आने वाले वक्त में तुम हमारे शहर का नाम रोशन करोगे । यही सोच दोनो ने भारत की टीम में खेलने के लिए बहुत पापड़ बेले । ना जाने कितनी टीम ,कितने लोगों को हरा कर यहाँ तक पहुँचें ।
भारतीय क्रिकेट टीम के कोच राजू के खेल से बहुत प्रभावित हुए । इस लिए क्रिकेट बोर्ड की तरफ़ से राजू को चुना गया और उसे खेलने के लिए आमंत्रित करने के लिए एक पत्र उसके घर भेजा गया । जब डाकिया पत्र लेकर उसके घर पहुँचा , तो श्रवण राजू के घर के बाहर ही खड़ा था । डाकिये ने पूछा क्या राजू का घर यही हैं ???? तो श्रवण ने कहा हाँ यही हैं बोलो !
तुम कौन हो डाकिये ने पूछा ??
मैं राजू का दोस्त श्रवण हूँ …..राजू के घर पे कोई नही हैं वो सब बाहर गए हैं ।
डाकिये ने वो पत्र श्रवण को दे दिया और बोला आप ये राजू को दे देना ।डाकिये के जाने के बाद उसने इधर-उधर देखा और पत्र खोल के पढ़ लिया । जिसमें लिखा था कि राजू का भारतीय क्रिकेट टीम में चयन हो गया है और आने वाले दो दिन में उसे जवाब देना होगा । श्रवण ये मौक़ा हाथ से नही जाने देना चाहता था । इसलिए उसने वो पत्र फाड़ के फेंक दिया । जब राजू की तरफ़ से कोई जवाब नही आया । तो श्रवण को खेलने का मौक़ा मिला । लेकिन जब राजू को पता चला कि श्रवण को खेलने के लिए बुलाया गया है । तो वो बहुत खुश था और उसकी हौंसला अफजाई के लिए वो मैदान में पहुँचा । जहां कोच राजू से आकर मिलते है और पूछते है “ राजू जब तुम्हें खेलना ही नही था , तो टेस्ट क्यों दिए “। सर आप क्या कह रहे हैं ?? क्रिकेट तो मेरी नस नस में बसा हैं !!!!
कोच - तो फिर तुम क्यों नही आए ?? तुम्हें पत्र भी भेजा गया था ।जब तुम नही आए तो हमने तुम्हारे मित्र को पत्र भेजा । क्योंकि हमें तो खिलाड़ी चुन कर कमेटी को देने होते हैं ।
राजू पूरे रास्ते यही सोचते हुए आ रहा था कि “ऐसे कैसे हो सकता है ,कि पत्र आए और मुझे ना मिलें “। तभी डाकिया आया और बोला माफ़ करना राजू भैया !! मेरी तबियत ठीक नही थी तो मैंने अपने दूसरे साथी को आपके घर पत्र ले कर भेजा था । लेकिन वो आपकी जगह आपके दोस्त श्रवण को पत्र दे चला आया । ये सुन राजू स्तब्ध हो गया !! इसका मतलब वो आस्तीन का साँप मेरा खुद का दोस्त श्रवण हैं जो आज मेरी जगह खेल नाम बना गया ।
स्वरचित रचना
स्नेह ज्योति
0 टिप्पणियाँ