मुझे माँ मिल गई

 महारानी बैठी मत रहना, अपने पापा को अच्छा भोजन बनाकर खिलाना और सारे काम बर्तन,कपड़े,झाड़ू पौछा अच्छे से करना, मैं नौकरानी हूँ, जो रोज तुम्हारे लिए भोजन बनाती हूँ, आराम से  खाकर मोटिया रही हो। माँ तो भगवान को प्यारी हो गई, और इस बला को छोड़ गई मेरी छाती पर मूंग दलने के लिए,पता नहीं कब पीछा छूटेगा।एक तो रंग पक्का और शक्ल सूरत भी ऐसी नहीं कि कोई पसंद कर ले,न लक्षण ही अच्छे हैं। पैदा होते ही माँ को खा गई। और... है ईश्वर इस कलमुँही, अपशकुनी से कब मुक्ति मिलेगी। विमला जी के तरकश से तीर  चलते जा रहै थे, वह हमेशा रिया को जली -कटी सुनाती थी। तभी तरूण ने आकर कहा, माँ रिक्षा आ गया है।वह रिया को घूरती हुई, तरूण और श्वेता को लेकर अपने मायके चली गई।रिया की ऑंखों से ऑंसू की बरसात हो रही थी और वह खिड़की से अपनी सौतेली माँ और भाई -बहिन को जाते हुए देख रही थी। उसका ध्यान टूटा जब उसके पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा बेटा मैं तेरे दर्द को जानता हूँ।मैं यह भी जानता हूँ कि विमला तुझे हर पल जली कटी सुनाती है, बेटा उसे समझा-समझा कर थक गया हूँ। मैं जितना समझाता हूँ,वह दुगने वेग से तुझपर गुस्सा उतारती है।  कई बार सोचा तुझे होस्टल में भर्ती करवा दूं, मगर तुझे अपने से दूर करने के विचार से कांप जाता हूँ।बेटा जाने अन्जाने में, मैं तेरा दोषी बन गया हूँ। बेटा तू उसकी बात को दिल पर मत ले, तरूण और श्वेता तो तुझे बहुत प्यार करते हैं। तू उसकी बातें सुनकर रोती है तो उसे बहुत मजा आता है। बेटा तू उसकी बात पर ध्यान ही मत दे, मैं हमेशा तेरे साथ हूँ। जब वह देखेगी की उसकी बात का तुझपर कोई कसर नहीं हो रहा तो वह खुद बोलकर पछताएगी। बेटा सब बातों को छोड़कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, तेरी माँ तुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी, तू अपने लक्ष्य पर ध्यान दे।मैं उसके सामने, तुझसे ज्यादा इसलिए नहीं बोलता, क्योंकि मैं जानता हूँ, मैं तो बोलकर ऑफिस चला जाऊँगा और वह सारा बदला तुझपर निकालेगी। पापा की बातों से रिया को सहारा मिला उसने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया, चार दिन बाद विमला जी आ गई और उनका जलीकटी सुनाने का क्रम चालू हो गया मगर अब रिया न रोई न कुछ कहा, बस अपनी पढ़ाई करती रही। उसकी ओर से कोई प्रतिक्रिया न देखकर धीरे-धीरे विमला जी का बड़बड़ाना कम हो गया था। रिया की मेहनत रंग लाई और वह डॉक्टर बन गई थी। उसके लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते आ रहै थे, अब विमला जी उनकी कही वे जली कटी बातें याद कर वे स्वयं शर्मिंदा थी। और एक दिन वह भी आया जब उन्होंने रिया से माफी मांगी। रिया के पापा दूर खड़े मुस्करा रहै थे। रिया ने विमला जी से कहा आप मॉफी न मांगो माँ, बस मेरे सिर पर प्यार से हाथ रख दो, माँ को तो देखा भी नहीं, बहुत तरसी हूँ माँ के प्यार के लिए। लग रहा है मुझे आज माँ मिल गई।विमला जी का  हाथ रिया के सिर पर था और ऑंखों से ऑंसुओं की धार बह रही थी। 


प्रेषक-

पुष्पा जोशी


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