जानकी देवी, पिछले कई दिनों से बीमार थीं, लेकिन आज उनकी सांसों में एक अजीब सी उखड़न थी.तभी भीतर से उनकी बहू, सलोनी, हाथ में काढ़े का गिलास लिए बाहर आई. उसने जानकी देवी का सिर हौले से सहलाया और दीनदयाल जी की ओर देख कर मुस्कुराई. उस मुस्कान में आश्वासन भी था और गहरा दर्द भी. सलोनी इस घर की बहू बनकर पांच साल पहले आई थी. उस वक्त मास्टर जी का इकलौता बेटा, समीर, फौज में था. शादी के मात्र दो साल बाद ही सरहद पर एक मुठभेड में समीर शहीद हो गया.
समीर की शहादत ने इस घर की दीवारें ही नहीं, जानकी देवी और दीनदयाल जी की जीने की इच्छा भी हिला दी थी. गांव के लोग कहने लगे थे, "बेचारी सलोनी, अभी तो मांग की सुर्खियां भी फीकी नहीं पड़ी थीं कि चूड़ियां टूट गईं. अब बूढ़े मां-बाप का क्या होगा? सलोनी को तो इसके मायके वाले ले ही जाएंगे."
पर सलोनी ने कहीं जाने से इनकार कर दिया. उसने अपनी सिसकियों को भीतर ही दफन कर लिया और ससुर को 'पिताजी' व सास को 'मां' कह कर उनकी लाठी बन गई.
आज जब जानकी देवी की हालत बिगड़ी, तो गांव के कुछ लोग जमा हो गए. गांव की एक बुजुर्ग महिला ने फुसफुसाते हुए कहा, "देखा, सलोनी का पांव ही ऐसा था. पहले जवान बेटा गया, अब ये बेचारी मौत से लड़ रही हैं. विधवा बहू घर में रहे तो बरकत कहां से आएगी?"
सलोनी ने ये शब्द सुन लिए. उसकी आंखों में आंसू तो आए, पर उसने खुद को संभाला. वह जानती थी कि उसके सास-ससुर के लिए वह सिर्फ एक बहू नहीं, बल्कि उनके बेटे की आखिरी निशानी है.
उस रात जानकी देवी शांत हो गईं. मास्टर दीनदयाल जी पत्थर के बुत बन गए. पत्नी के जाने का दुख और अकेले रह जाने का डर उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रहा था. अंतिम संस्कार के बाद जब घर में सन्नाटा पसरा, तो रिश्तेदारों ने अपनी राय देनी शुरू कर दी.
सलोनी की बुआ सास ने दीनदयाल जी से कहा, "भाई साहब, अब आप अकेले इस घर में इस जवान विधवा बहू के साथ कैसे रहेंगे? लोग बातें बनाएंगे. सलोनी को उसके घर भेज दीजिए और आप हमारे साथ शहर चलिए."
दीनदयाल जी कुछ नहीं बोले. उनकी खामोशी सलोनी को डरा रही थी. उसे लगा कि शायद पिताजी भी उसे अब 'बोझ' या 'अशुभ' मानने लगे हैं. वह अपने कमरे में जाकर रोने लगी. तभी उसे पदचाप सुनाई दी. दीनदयाल जी उसके कमरे के दरवाजे पर खड़े थे.
"बेटी, बाहर सब लोग बहुत कुछ कह रहे हैं," मास्टर जी की आवाज भारी थी.
सलोनी ने नीची नजरों से कहा, "मैं जानती हूं पिताजी. अगर आपको लगता है कि मेरा यहां रहना ठीक नहीं है, तो मैं चली जाऊं..."
"नहीं!" दीनदयाल जी ने उसे टोकते हुए कहा. "मैं इसलिए नहीं आया कि तुम्हें जाने को कहूं. मैं यह कहने आया हूं कि आज से तुम इस घर की बहू नहीं, मेरी बेटी हो. समीर चला गया, जानकी चली गई, लेकिन तुमने जो त्याग इन तीन सालों में किया है, वह कोई सगी बेटी भी नहीं कर पाती. लोग तुम्हें 'अभागी' कहते हैं, पर सच तो यह है कि तुम इस घर का 'भाग्य' हो."
मास्टर जी ने सलोनी के सिर पर हाथ रखा. "मैंने तय किया है कि मैं तुम्हारी दूसरी शादी कराऊंगा. तुम अभी युवा हो, तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी है."
सलोनी चौंक गई. "नहीं पिताजी, मैं आपको इस मोड़ पर अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगी."
"तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी, बल्कि मुझे एक बेटा दोगी," दीनदयाल जी की आंखों में दृढ़ता थी. "मैं तुम्हारा विवाह किसी ऐसे व्यक्ति से करूंगा जो घर जमाई बनकर रहे या कम से कम हमें अपने परिवार का हिस्सा माने. और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भी तुम यहीं रहोगी. यह समाज जो तुम्हें विधवा कह कर दुत्कारता है, उसे मैं दिखाऊंगा कि एक ससुर अपनी बहू का पिता बनकर उसकी खुशियां वापस लौटा सकता है."
महीनों बीत गए. मास्टर जी ने सलोनी के लिए योग्य वर की तलाश शुरू की. गांव में यह चर्चा का विषय बन गया. लोग ताने मारते, "बुढ़ापे में मास्टर जी का दिमाग चल गया है. विधवा बहू की शादी कराएंगे? धर्म-करम सब भ्रष्ट कर देंगे."
लेकिन दीनदयाल जी टस से मस नहीं हुए. उन्होंने अपनी वसीयत सलोनी के नाम कर दी. उन्होंने साफ कह दिया कि जो सलोनी का सम्मान करेगा, वही इस घर का हिस्सा बनेगा.
अंततः उन्हें 'आकाश' मिला. आकाश एक अनाथ युवक था जो पास के शहर में बैंक में काम करता था. वह सलोनी की कहानी और मास्टर जी के विचारों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने शादी के लिए तुरंत हां कर दी. उसने शर्त रखी कि शादी के बाद वे दोनों मास्टर जी के साथ इसी घर में रहेंगे.
शादी का दिन आया. कोई तामझाम नहीं था, पर गरिमा पूरी थी. जब सलोनी लाल जोड़े में तैयार होकर निकली, तो मास्टर जी ने खुद उसका कन्यादान किया. गांव के लोग जो कल तक विरोध कर रहे थे, मास्टर जी के इस साहस को देखकर निशब्द थे.
शादी के बाद घर में फिर से रौनक लौट आई. आकाश ने मास्टर जी को वह सम्मान दिया जो एक बेटा देता है. सलोनी अब खुलकर हंसने लगी थी. एक दिन बरामदे में बैठकर चाय पीते हुए आकाश ने कहा, "बाबूजी, सलोनी अक्सर कहती है कि अगर उस दिन आपने समाज की परवाह की होती, तो आज हम इतने खुश नहीं होते."
दीनदयाल जी मुस्कुराए. "बेटा, समाज तो भेड़ियों का झुंड है जो कमजोर को और कमजोर बनाता है. असली धर्म तो वह है जो किसी के मुरझाए चेहरे पर मुस्कान ले आए. सलोनी ने मेरी और जानकी की सेवा उस वक्त की जब हम टूट चुके थे. यह तो बस मेरा छोटा सा फर्ज था."
सलोनी अंदर से थाली लेकर आई. उसकी आंखों में अब वह डर और 'मनहूसियत' का साया नहीं था, बल्कि एक नई जिंदगी की चमक थी. उसने मास्टर जी के पैर छुए. मास्टर जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा, "जुग-जुग जियो मेरी बेटी. तूने इस घर को घर बनाया है."
उस शाम ढलते सूरज की रोशनी पहाड़ों पर एक सुनहरी चादर बिछा रही थी. वह पुश्तैनी मकान अब केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर नए विचारों की नींव पर खड़ा एक खुशहाल आशियाना था.
दीनदयाल जी ने महसूस किया कि समीर कहीं न कहीं ऊपर से देखकर मुस्कुरा रहा होगा. उन्होंने अपनी बहू में अपनी बेटी को पाया था और बदले में उन्हें एक पूरा परिवार मिला था. समाज की सड़ी-गली परंपराओं पर मानवीय संवेदनाओं की यह जीत सबसे बड़ी जीत थी.
सलोनी और आकाश की आने वाली पीढ़ी के लिए यह घर एक मिसाल बनने वाला था कि इज्जत और परंपराएं किसी को कैद करने के लिए नहीं, बल्कि पंख देने के लिए होनी चाहिए. सलोनी अब 'बेचारी' नहीं थी, वह उस घर की स्वामिनी और उस बूढ़े पिता के स्वाभिमान की रक्षक थी.
लेखिका : प्रतिमा मिश्रा
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