टूटी डोर का पुनर्मिलन

 घर के आँगन में बैठी संध्या चुपचाप राखियों का थाल सजा रही थी। आज राखी थी, पर उसके दिल में सन्नाटा पसरा हुआ था। थाल में सजाई हुई राखियाँ उसकी सूनी कलाई की तरह ही उदास लग रही थीं।

उसकी सास ने दूर से देखा और धीरे से कहा—
"बहू, इतना क्यों उदास बैठी हो? तुम्हारे भाई तो आएंगे ना राखी पर?"

संध्या की आँखें छलक आईं।
"नहीं माँ जी… पिछले पाँच साल से मेरे भाई से कोई रिश्ता नहीं है। वो इस घर की चौखट तक नहीं आया।"

सास चुप हो गईं। उन्हें मालूम था कि संध्या और उसके भाई अनुराग के बीच पैसे को लेकर बड़ी कड़वाहट आ गई थी।

पाँच साल पहले की बात थी। अनुराग का बिज़नेस अचानक घाटे में चला गया। उसने अपनी बहन से मदद माँगी।
"दीदी, जरा जीजाजी से कहो कि मुझे कुछ पैसे उधार दे दें। मैं वादा करता हूँ कि लौटाऊँगा।"

संध्या ने पति से बात की, लेकिन उस समय उनके भी हालात अच्छे नहीं थे।
"अनुराग को कह दो, अभी हमारे पास खुद का खर्च चलाना मुश्किल है।"

संध्या ने जब भाई को यह बात बताई तो अनुराग आग-बबूला हो गया।
"आपने तो बचपन से हमेशा कहा कि मैं तुम्हारा सहारा हूँ। और आज जब मुझे तुम्हारी ज़रूरत है तो तुमने मना कर दिया! ठीक है दीदी, अब इस नाते को यहीं खत्म समझो।"

उस दिन के बाद अनुराग ने बहन से बात करना बंद कर दिया। त्योहार, शादी-ब्याह, सब उसने तोड़ दिए। संध्या ने कई बार फोन मिलाया, लेकिन उसने कभी उठाया नहीं। धीरे-धीरे संध्या ने भी मान लिया कि भाई अब सिर्फ यादों में रह गया है।

संध्या ने आँसू पोंछे और राखियों का थाल सजा कर कमरे में रख दिया। उसका बेटा पास आकर बोला—
"माँ, आप उदास क्यों हो? राखी पर तो खुश होना चाहिए।"

संध्या ने मुस्कराने की कोशिश की।
"कुछ रिश्ते बेटे, वक्त की धूल से ढक जाते हैं।"

इसी बीच दरवाज़े पर दस्तक हुई। संध्या ने सोचा, शायद कोई पड़ोसी होगा। लेकिन जब दरवाज़ा खोला तो सामने वही चेहरा था, जिसे उसने बरसों से सिर्फ तस्वीरों में देखा था—अनुराग

अनुराग की आँखें झुकी हुई थीं। हाथ में मिठाई का डिब्बा और कलाई पर बंधने को आतुर खालीपन।

संध्या वहीं थम गई।
"तुम…?"

अनुराग की आवाज़ काँप रही थी।
"दीदी… बहुत गलती हो गई। छोटी-सी बात को बड़ा बना दिया। पाँच साल खुद को समझाता रहा, लेकिन आज राखी के दिन हिम्मत जुटा कर चला आया हूँ।"

संध्या की आँखों से आँसू बह निकले।
"पाँच साल… एक बहन के लिए कितने भारी होते हैं, ये तुम नहीं जानते अनुराग। कितनी बार चाहा कि तुम्हें फोन करूँ, लेकिन हर बार तुम्हारा गुस्सा याद आ जाता।"

अनुराग ने गहरी साँस ली।
"दीदी, सच मानो तो मुझे सबसे ज्यादा ग्लानि इस बात की रही कि तुमने मुझे कभी गलत नहीं समझा, फिर भी मैंने तुम्हें कठोर शब्द कह दिए। पैसे से बड़ा रिश्ता होता है, यह बात अब समझ आई है।"

दोनों भाई-बहन गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़े। पूरा घर इस दृश्य को देखकर भावुक हो गया।

संध्या ने थाल उठाया और हाथ काँपते हुए भाई की कलाई पर राखी बाँध दी।
"आज मुझे लगा जैसे मैं फिर से अपने बचपन में पहुँच गई हूँ। जब हर राखी पर तुम मुझे मिठाई खिलाते थे और कहते थे कि दीदी, मैं हमेशा तुम्हारी ढाल बनकर खड़ा रहूँगा।"

अनुराग ने सिर झुकाकर कहा—
"वादा है दीदी, अब चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, हम दोनों कभी अलग नहीं होंगे।"

संध्या के पति ने भी पास आकर अनुराग के कंधे पर हाथ रखा।
"भाई, उस समय सच में हालात अच्छे नहीं थे, वरना मैं कभी तुम्हें मना नहीं करता। लेकिन तुम्हारे गुस्से ने हम सबको बहुत तोड़ा।"

अनुराग ने आँखें पोंछीं।
"जीजाजी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मेरी नासमझी ने रिश्तों को बिखेर दिया।"

संध्या की सास बोलीं—
"रिश्ते अगर सच्चे हों तो टूटते नहीं, बस वक्त के साथ कमजोर हो जाते हैं। आज तुम दोनों ने उन्हें फिर से मजबूत कर दिया।"

मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश 


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