डोली और अर्थी

 !!!! साली !!!!मुझसे चाभी माँगती है !!इस घर की मालकिन बनना चाहती है !!ऐसा थप्पड़ मारूँगा कि हरामजादी तारे नज़र आ जाएँगे तुझे!!।भिखारी की बेटी की इतनी औकात मुझसे चाभी माँगे।!!!पूरी तरह नशे में टुन्न विष्णु दस बजे रात में चाभी माँगने आई अपनी भाभी पे चिल्ला रहा था। हल्ला सुन सास ससुर ननद भी वहाँ आ गए।

साधना को अपने देवर विष्णु से ऐसे व्यवहार की जरा भी उम्मीद नहीं थी।आज उसके पति ऋषि एक नजदीकी दोस्त की शादी में गए थे।हल्ला सुन साधना की गोद मे दस महीने का बेटा जोर जोर से रोने लगा और पास खड़ी चार साल की बेटी सहमकर कुछ अनहोनी की आशंका से माँ के पैरों में लिपट गई।सास ससुर भी बेटे का साथ देने लगे।

ननद तो पहले से ही भाभी से कुढी हुई थी भाई का पक्ष लेते हुए बोलने लगी कि "ये जब से घर आई है पूरे घर की महारानी बनना चाहती है।"एक तरफ अकेली साधना थी और दूसरी तरफ परिवार के सारे लोग।दिमाग सुन्न सा् हो गया था साधना का । ठंढ के दिनों में भी दोनों आँखों से गर्म आँसू निकलकर गालों से होते हुए अविरल बहने लगे।


पाँच बहने होते हुए और बेहद साधारण कमाई करने वाले एक शिक्षक की बेटी ने पूरी ज़िंदगी कभी इतना अपमान नहीं सहा था और न ही कभी ऐसी बातें सुनी थी।पापा ने बहुत पैसे न होते हुए भी परवरिश में कोई कमी नहीं रखी थी।खूब पढ़ाया लिखाया अच्छे संस्कार दिये।बड़ो की इज़्ज़त करना सिखाया।परिवार को एक रखने के सफलता सूत्र दिए।

छह साल पहले जब साधना शादी कर इस घर मे आई थी तब से उसने अपना सर्वस्व इस घर पर लुटा दिया।अपनी हर शौक अपनी हर खुशी की तिलांजलि देकर इस परिवार को खुश रखने का प्रयास किया।अपना मायके और वहाँ के लोगों को भूल ही गई कभी कभी मेहमान बनकर अपने घर जाती।सारा समय अपने ससुरालवालों के नाम कर दिया ।झाड़ू पोछा से लेकर खाना पीना सब की जिम्मेदारी लेकर खूब मेहनत करती।यहाँ तक कि बीमार होने पर भी सारा काम निपटाती ।सास ससुर ननद देवर और पति सबका खूब ख्याल रखती लेकिन जैसा कहा गया है सीधे पेड़ सबसे पहले काटे जाते हैं यहाँ भी वही हुआ सभी ने उसके समर्पण का गलत फायदा उठाया और उसे घर की नौकरानी का दर्जा दे दिया।

पति ऋषि सारी बातों को देखता हुआ भी चुपचाप रहता।कभी बोलता की इतना करने की क्या जरूरत।तो साधना बोलती ये मेरा परिवार है और अपने परिवार के लिए ही तो कर रही हूँ।आज उसके पति ऋषि शादी समारोह ख़त्म कर रात के दो तीन बजे घर लौटने वाले थे इसलिए साधना ने समझा कि ठंड के दिनों में किसी को नींद में खलल न पड़े इसलिए चाबी ले लेती हूँ जब पति आएँगे तो में गेट खोल दूँगी पर उस घर के लोगों ने दूसरा अर्थ ही ले लिया था, उसने सिर्फ देवर से जिसमे मेन गेट से लेकर अन्य दरवाज़ों की चाभी थी वो माँगने गयीं थी।

रोते रोते साधना ने बड़े दृढ़ स्वर मेँ बस इतना ही बोली "देवर जी अपनी हद में रहिये और जबान संभाल कर बात कीजिये मैं आपकी भाभी हूँ इस घर की दासी नहीं"

" चटाक "की तेज आवाज के साथ सास का तमाचा मुँह पर पड़ा ।दोनों बच्चे और माँ तीनों जोर जोर से रोने लगे।ससुर और ननद की चुप्पी ने देवर और सास के हौसलों को बढ़ा दिया।जिस घर को मंदिर मानकर जिसने छह साल पूरे मन से सेवा की थी आज उसी मंदिर में उसे पीटा ही नहीं गया बल्कि जमकर अपमान भी किया गया ।उसके मम्मी पापा और अन्य परिवारवालों को जीभर कर गलियाँ भी दी गईं।

साधना ने पति को मोबाइल लगाया ।फ़ोन उठने पे कुछ बोल न पाई जोर जोर से बस रोती रही।छोटी बेटी ने रोते हुए बस इतना कहा "जल्दी आओ पापा मम्मी को दादी ने मारा और चाचू ने गालियां दी।"इतना सुनते ही पति काफी तेज गति से गाड़ी चलाते हुए घर आये।दस किलोमीटर की दूरी दस मिनट में तय की।

आते ही सबसे पहले अपने भाई को खींचकर चार पाँच तमाचे लगाये और बोला" हिम्मत कैसे हुई मेरी बीबी को गालियाँ देने की मैं अभी थाने में FIR करता हूँ और अभी अपनी बीबी बच्चों के साथ अलग होता हूँ।जहाँ मेरी बीबी का सम्मान नही उस घर से मेरा कोई नाता नहीं आज से मैं आपलोगों से सारे रिश्ते नाते ख़त्म करता हूँ"

गुस्से में पैर पटकते हुए पति ने जाकर सूटकेस निकालकर कपड़े पैक करना शुरू कर दिया ।साधना परिवार टूटने के डर से घबरा सी गयी पति के पैरों में गिरते हुए बोली "मेरी अंतिम इच्छा का मान रखिये मैं इस घर में बहु बनकर आयी थी और मैं चाहती हूँ कि मेरी अर्थी ही इस घर से निकले।"

दरवाज़े के पीछे खड़े बाकी परिवार के सदस्यों को थोड़ी थोड़ी अपनी गलती का अहसास हो चला था।


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