आज लगातार चौथा दिन था जब वो मुझे लिफ्ट में घुरता हुआ मिल गया।
यूँ तो देखने में शरीफ ही लगता था और मेरे साथ कोई बदतमीजी भी उसने नहीं की थी लेकिन उसका एकटक बिना पलकें झपकाए मुझे देखना अन्दर तक डरा देता।
रोज तो कोई न कोई लिफ्ट में जरुर होता था पर आज हम दोनों के अलावा कोई नहीं था।
उसकी आंखें देख कर मुझे उससे इतना डर लग रहा था कि जैसे आज अकेला पाकर कुछ गलत ना कर दे। मेरा मन किया कि सीढ़ियों से ही चली जाऊँ पर मेरा आफिस अपार्टमेंट की पाँचवी मंजिल पर था। सीढ़ियों से जाने पर बीस मिनट तो साँसें सम्भालने मे ही लग जाते मुझे।
खैर लिफ्ट पाँचवी मंजिल पर पहूँची जहाँ वह भी मेरे पीछे ही बाहर निकला और मेरे पीछे आने लगा। मैं लगभग दौड़ती हुई अपने आफिस मे घुसी और धड़ाम से अपनी कुर्सी पर गिर गयी।
मेरी सांसे जोर जोर से चल रही थी।
देखकर मेरी सहकर्मी मीता , रानी , रूचि ने मुझे घेर लिया। उन्होंने बहुत पुछा कि क्या हुआ पर मैं कुछ नहीं बता पायी।
दिन भर काम में मेरा मन नहीं लगा। सहकर्मीयों के कहने पर भी मैं लंच के लिये नहीं गयी।
मैं अपनी सोच में गुम थी-"ऐसा कब तक चलेगा? आखिर वह मुझे घुर कर क्यों देखता है।"
कि मीता ने कहा -"कहाँ गुम हो? बाॅस का काॅल आया है," तब मेरी तन्द्रा टुटी।
मैं बाॅस के केबिन में गयी तो उन्होंने भी मेरी परेशानी भाँप ली और कारण पुछा पर मैं क्या बताती?
अचानक मेरे मन मे ख्याल आया कि अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी। उससे अपना बचाव करना है तो क्यों ना सेल्फ डिफेंस का कोर्स कर लूँ।
मैं अपने कम्प्यूटर पर जुडो-कराटे सिखाने वाले संस्थान का पता सर्च इंजन पर ढुंढ ही रही थी कि तभी मीता आ गई।उसने मेरे कम्प्यूटर स्क्रीन को देखा तो उसे मेरी परेशानी का अंदाजा हो गया।
फिर उसके बहुत जोर देकर पुछने पर मैंने सारी बात बता दी।
मेरे अन्य सहकर्मी भी आ गये थे। मेरी बात सुन कर तुरंत सारे सहकर्मी उग्र हो गये उसे सबक सिखाने को।
मैंने कहा भी कि अभी उसने कुछ गलत नहीं किया है, बस बिना पलक झपके घुरता है तो रूचि बोली "तो क्या उसके कुछ करने का इंतजार करेगी। उसको समय रहते पहले ही चेतावनी देना जरुरी है।"
सभी ने रूचि की बात का समर्थन किया और उसको सबक सिखाने का सोच लिया।
अगले दिन सबने लिफ्ट के आसपास मोर्चा ले लिया।
मैं जब लिफ्ट के पास पहुँची तो वह फिर मौजुद था। वैसे ही घुरता हुआ। फिर क्या? सबने मिल कर उसकी इतनी पिटाई की कि बेचारा लहुलुहान हो गया।उसे मेरा पीछा नहीं करने की धमकी देकर सिक्युरिटी वालों ने उठाकर बाहर फेंक दिया।सभी उसको पीटने पर अपनी बहादुरी का बखान कर रहे थे कि ऐसे लोगों को ऐसे ही सबक सिखाना चाहिए।
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@@ ठीक दस दिन बाद एक बुढ़ी औरत ने आॅफिस मे मेरे पैर पकड़ लिए-"बेटी मेरे बेटे को माफ कर दो।बहुत मुश्किल से तुमको खोजते हुए आई हूँ।"
मैं आश्चर्य से उस बुढ़ी को देखने लगी।
मेरी कुछ समझ में नहीं आया। मेरे सारे सहयोगी इकट्ठा हो गये थे। लेकिन बुढ़ी कह रही थी- "उस दिन जिसे तुम सबने पीटा था ,मैं उसकी माँ हूँ।उसने मुझे सब बताया ।वह तुम्हारा पीछा नहीं करता था बल्कि वह अपनी ड्यूटी पर आता था।इत्तफाक से उसका ड्यूटी का वक्त तुम्हारे वक्त पर है और उसका आफिस भी इसी मंजिल पर है। उसके पिता पहले यहीं सफाई कर्मी थे।उनकी मौत के बाद मालिक ने रहम करके उसको रख लिया।वह यहीं काम करता है। पर सिक्युरिटी वालों ने उसका पास छीन लिया है और अंदर नहीं आने दे रहे। कहते हैं तुम उसको माफ करोगी तभी पास देंगे।बेचारा ड्यूटि भी नहीं कर पा रहा।उसकी नौकरी चली जाएगी बेटी।"
मुझे उस बेचारी वृद्धा पर बहुत तरस आया फिर भी बोली-
"लेकिन वो मुझे घुरता क्यों है?"
बुढ़ी ने कहा-"पत्थर की आँख से तुम्हें क्या घुरेगा वह?"
"क्या कहा आपने?" मैं आश्चर्य से बोली।
उन्होंने कहा-“हां बेटी,बचपन में आग से उसकी दोनों आँखे जल कर खराब हो गयी थी।पाई-पाई जोड़ कर उसकी एक आँख पत्थर की लगवाई है।दुसरी से बस थोड़ा-थोड़ा दिखता है।वह बेचारा तुमको घुरता नहीं था,उसकी आँख ही ऐसी हैं- बेजान , बिना रोशनी ,बिना हिलडुल के। मैं उसे समझा दुंगी कि तुम्हारे रास्ते में ना आये ।अब वह कभी तुम्हारे सामने नहीं आएगा।उसकी तरफ से मैं तुमसे माफी मांगती हूं।"
वह और भी कुछ कहती जा रही थी और मैं सुन्न खड़ी थी।
आखिर उसका गुनाह क्या था?
उसे किस बात की सजा मिली थी?
सारी बात जानकर मेरे सारे सहकर्मी भी शर्मिंदा थे।
खैर हमारे प्रयास से उसका पास मिल गया लेकिन उस दिन के बाद वह मुझे कभी लिफ्ट में या उसके आस पास भी नजर नहीं आया।जबकि उसकी ड्यूटी का टाईम मेरे साथ ही था।मेरी गलतफहमी के कारण एक बेकसूर को सजा मिली थी।मेरे मन पर अपनी गलती के लिये एक बोझ था।
@@ करीब पन्द्रह दिन बाद वो मुझे बहुत भारी सामान लिये सीढ़ियां चढ़ता नजर आया। मैं दौड़ कर उसके पास पहुँची और बोली -"तुम इतना भारी सामान लेकर पाँचवी मंजिल पर कैसे जाओगे?लिफ्ट से क्यों नही चले जाते?"
उसने मेरी तरफ देखे बिना कहा- "मैं तो रोज सीढ़ियों से ही आता जाता हूँ मैडम जी !चाहे कितना भी भारी बोझ ले जाना हो।"
मैंने पुछा -"क्यों?"
वह एक क्षण रुका , मेरी तरफ देखा और बोला- "क्योंकि मेरी माँ ने मुझे लिफ्ट के पास नहीं जाने की कसम दी है। मैं लिफ्ट से नहीं जा सकता।"कहकर वह सीढियां चढ़ने लगा।
मैं सन्न रह गयी।
मैं एक क्षण के लिये ही उसकी आँखें देख पायी थी।उस घुरती हुई, पथराई, बेजान आँख में तो कोई भाव नहीं था, लेकिन वो दुसरी आँख जिसमें थोड़ी जान बाकी थी, उसमें मुझे आँसू की दो बुँदें नजर आ गयी थी।
मैं सोच रही थी गुनाहगार कौन था? वह या मैं???
और फिर अचानक-------
ना जाने क्यों, मेरी आँखों से भी आँसू गिरने लगे।
निःशब्द, बड़े बड़े आँसूँ।।।
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