खून के रिश्ते

 59 वर्षीय मिश्रा जी आज बेहद खुश लग रहे थे ।बार बार दर्पण में अपने डाई किये हुऐ बाल देख देखकर मन ही मन हर्षित हुऐ जा रहे थे ।बड़े दिनों बाद अपने सफारी सूट की कड़क प्रेस की ।

"सरस्वती,आप आज भी वैसी ही खूबसूरत लगती हैं जैसी पहली बार लगी थी..शादी के बाद.."

"बस बस रहने दीजिये ,एक तो इस उम्र में सफेद बालों को काला करवा दिया...बेटे बहु क्या सोचेंगे ?"

"अरे सोचना क्या है !! देखकर खुश हों जायेंगे और क्या...वैसे भी अभी हमारी उम्र ही क्या है ..60 साल होने में अभी भी 2 दिन बाकी हैं ।"

सरस्वती सीधी व सरल स्वभाव महिला थी।परिवार के लिये समर्पित ,धीर गम्भीर सरस्वती अपने जीवन के 56 वसंत देख चुकी थी ।

"वैसे लग तो रही हूँ 25 साल की...."

सरस्वती अकेले में खुद को आईने में निहारते हुऐ बुदबुदाई ।

"उहु उहु...तो चलें...सरस्वती ?"

मिश्रा जी हँसते हुऐ बोले ।

"जी...वो...मैं...बस यूँ ही देख रही थी..."

सरस्वती बुरी तरह झेंप गई।

2 दिन बाद नारायण मिश्रा का 60 वां जन्मदिन था ।बेटा बहु महानगर में किसी बड़ी प्राइवेट कम्पनी में लाखों के पैकेज पर कार्यरत थे, पिता का जन्मदिवस मनाने के लिये गाँव से बुलाया गया।मिश्रा दम्पत्ति पहली बार महानगर अपने बेटे से मिलने जा रहे थे ,खुशी का कोई ठिकाना न था।

"सरस्वती वो नारियल के लड्डू और गुझिया रख ली ना आपने ?

" जी रख लिया था रात को ही..कैसे भूल सकती हूँ ?ओमू को कितनी पसंद हैं गुझिया..याद है आपको जब वो छोटा था तब 2 दिन के अंदर अंदर सारी मिठाइयाँ चट कर जाता था..।"

सरस्वती खिलखिलाते हुऐ बोली ।

घर गृहस्थी की जिम्मेदारियों में दोनों को कभी बाहर घूमने का समय नहीं मिला ,आज कई वर्षों के बाद मिश्रा दम्पत्ति साथ निकले ।सरस्वती बस की खिड़की से बड़ी उत्सुकता से लगातार झाँक रही थी ,नारायण मिश्रा के चेहरे पर भी इस तरह रौनक बनी हुई थी जैसे पहली बार कोई दम्पत्ति हनीमून पर जा रहा हो।

"सरस्वती मैंने सोच लिया...अब जब दिल्ली जा ही रहे हैं तो कुछ दिन तसल्ली से ठहर कर आयेंगे ,लगभग 1 महीना तो मान कर ही चलो।"

मिश्रा जी पर्यटन की किताब को बैग में डालते हुऐ बोले ।

"हाँ जी इस बार मेरा भी मन है वहाँ रुकने का ,लक्ष्य 3 साल का हो गया होगा ना..? बड़ा मन कर रहा है उसे गोद में लेकर दुलारने का ,हॉस्पिटल में देखा था उसे पहली बार जब वो हुआ था...।"

सरस्वती भावुक हो उठी ।

यादों में खोये हुऐ कब दिल्ली आया ,कुछ पता न लगा।बस से उतरते ही मिश्रा जी नें अपने कदमों की रफ्तार तेज कर दी।

"अजी जानती हूँ आप कितना उत्सुक हैं अपने बेटे से मिलने को..पर ज़रा हमारा भी ख़याल रखिये ।भागे जा रहे हैं बस..इस उम्र में हमसे नहीं होगी ये मैराथन ।"

"ओहो सरस्वती आप अभी जवान हैं थोड़ा फुर्ती कीजिये ।"

मिश्रा जी नें चुटकी लेते हुऐ कहा।

पता पूछते हुऐ मिश्रा दम्पत्ति एक बड़ी सी बहुमंजिली इमारत तक पहुँच गये ।दोनों बड़े कौतूहल से इमारत की ऊँचाई को देख रहे थे ।लिफ्ट का प्रयोग ना कर दोनों सीढियों से ही 5वीं मंज़िल पहुँचे ।

"मैं कहती हूँ आखिर ज़रूरत क्या थी यूँ बिना सूचना दिये 1 दिन पहले ही आने की ?ओमू को बता देते तो वो हमें लेने आ जाता इतनी परेशानी होती ही नहीं ।"सरस्वती हांफ़ते हुऐ बोली ।

"आप भी ना...कुछ समझती ही नहीं हो...अंग्रेजी में इसे सरप्राइज देना कहते हैं ,सोचो ज़रा वो दोनों हमें अचानक देखेंगे तो कितने खुश होंगे ।अब तुम चुप रहना ।ओमू का फ्लैट नम्बर यही है ।"

दरवाजे पर ओम मिश्रा लिखा देखकर नारायण मिश्रा नें अंदाजा लगाया ।दरवाजा हल्का सा खुला था ।अंदर से ओम और उसकी पत्नी के तीखे स्वर बाहर तक आ रहे थे ।

"रिलेक्स रिमि...बात को समझने की कोशिश करो.."

"क्या समझूं मैं..? यही कि जन्मदिन मनाने के बहाने तुम उन्हें हमेशा के लिये यहाँ रखने वाले हो..!"

"हमेशा के लिये कौन रख रहा है ,बात सिर्फ़ लक्ष्य की देखभाल की है ,माँ यहाँ होंगी तो हमें लक्ष्य की कोई चिंता नहीं रहेगी ।तुम भी ऑफिस निकल जाती हो..आया के भरोसे कब तक रखेंगे अपने बेटे को...? एक बार ये थोड़ा बड़ा हो जाये स्कूल जाने लग जाये तो मम्मी पापा को वापस गाँव भेज देंगे..।"

"तुम्हारे लिये आसान है ये सब कहना..मैं ही जानती हूँ कितनी मुसीबतें आने वाली हैं...तुम्हारी मम्मी को हर बात से दिक्कत होती है...सारी फ्रीडम ख़त्म होने वाली है और फ़िर मैं 4 लोगों का खाना रोज़ रोज़ नहीं बना सकती...साफ साफ कह रही हूँ...।"

मिश्रा दम्पत्ति अवाक खड़े सारी बातें चुपचाप सुन रहे थे ,उनके क़दम वहीं ठिठक कर रह गये ।

"अब चलो भी....यहीं पूरा दिन बिताने का विचार है क्या ?"

नारायण मिश्रा नें कहा ।

"कहाँ जाना है...अंदर ?"सरस्वती अपने आँसू छिपाने का विफल प्रयास कर रही थी ।

"अरे नहीं.. वहीं...इंडिया गेट ,कुतुबमीनार ,अक्षरधाम ,लाल किला....और भी बहुत सारी जगह हैं...।"

नारायण मिश्रा बैग से पर्यटन की किताब निकालते हुऐ बोले ।


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