इसी साल के आखिरी रोज मैं रिटायर हो जाऊँगा, मुझे भविष्यनिधि वगैरह का सब मिलाकर कुल जमा सात लाख रुपया मिलेगा। अब मैं ठहरा अकेली जान (पत्नी पिछले वर्ष ही लम्बी बीमारी के बाद चल बसी थी) अब मुझे क्या करना है इतने रुपयों का! भगवान की दया से मैं अपनी जिम्मेदारियों से फारिग ही हूँ। दोनों बेटे व इकलौती बेटी समय रहते ही ब्याह दिए
थे। सब कुछ बेटी-बेटों में बराबर -बराबर बाँट दूँगा। बड़के को अपनी दुकान का विस्तार करना है, छुटका गाड़ी लेने को कह रहा है, बेटी-दामाद को भी अपना अधबना मकान पूरा करना है। सब खुश हो जाएँगे, मेरा क्या है। मेरा गुजारा तो जो मुझे चार हजार के
करीब की पेंशन मिलेगी उसी में ही हो जाएगा। दो रोटी ही तो खानी है मैंने, कोई न कोई बेटा दे ही देगा....
मैं ये सब हिसाब-किताब बिठा ही रहा था कि गोकुल चाचा ने(मेरे पड़ोसी) मेरा हाथ पकड़ लिया। कहने लगे,‘‘ ऐसी भूल कभी मत करना रामचन्द्र, कभी मत करना। जो अपना बुढ़ापा सम्मान से व आराम से
काटना है तो सारा रुपया औलाद में बाँटकर खुद को कंगाल कभी मत करना....तेरे तो दो ही हैं, मेरे तो पाँच -पाँच बेटे हैं रामचंद्र। आज दो रोटी के लिए तरसकर रह जाता हूँ.... परमात्मा गवाह है रामचंद्र जो मैंने एक फूटी कौड़ी भी अपने पास रखी हो,
सारा पैसा सालों में बराबर -बराबर बाँट दिया था, इसके बावजूद मेरी छोटी-सी पेंशन के लिए मुझे जलील करते हैं , धमकाते हैं और आपस में भी सिर- फुटौव्वल करते हैं सो अलग।... मैं बहुत पछता रहा हूँ रामचंद्र, आज मैं बहुत पछता रहा हूँ। अगर मैंने अपने पास लाख- दो लाख रखे होते तो ये साले लालच में ही सही ,पर मेरी सेवा तो करते....।
उनका शरीर गुस्से से काँप रहा था और मेरा शरीर अपने भविष्य को देखकर काँप रहा था।
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