सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अम्मा ! पापा_कहाँ_!

  ईंट भट्ठे पर मुंशीगीरी में पैसा तो बस कहने को था लेकिन सुबह से शाम तक केशव के लिए वह एक सम्मान की जगह थी। चार लोग रोज़ सलाम करते थे। घर पर डेढ़ बीघा खेती....जो ज्यादा तो नहीं लेकिन उससे इतना गल्ला तो मिल ही जाता था कि आंटे-चावल के लिये बाज़ार न जाना पड़े। घर पर एक बूढ़ी मां और उसकी बीबी मालती और इन तीनों के बीच एक चंचल खिलौना, उसका चार साल का बेटा 'सुन्दर'!... केशव के दिनभर के थकान और उलझन की दवा!.. केशव अपने रोज की कमाई से घर का खर्चा चलाता और अगले दिन के लिए प्रभु पर अटूट विश्वास रखता। अगर कोई बड़ी विपदा न पड़े तो रोजमर्रे के खर्च ऐसे थे भी नहीं कि केशव को उसके लिये शिकन भी लेना पड़े। आज शाम केशव जब भट्ठे से घर लौटा तो देखा की सुन्दर अपनी मां की गोद में गुमसुम लेटा है और सुन्दर की दादी तखत पर बैठे सुन्दर का पैर सहला रहीं हैं। क्या हुआ बाबू को?....केशव ने व्यग्रता से पूछा। दोपहर से ही बुखार है, न कुछ खाया, न पीया.... गोदी से नीचे उतर ही नहीं रहा.. सुन्दर की अम्मा ने उसका सिर सहलाते हुए कहा। ज्वर की तीव्रता जानने के लिये केशव ने सुन्दर के माथे को स्पर्श किया। "अरे बुखार तो तेज ह...

बदलते रिश्ते

  चार दिन हुए थे नीला को मायके आए। ससुराल की जिम्मेदारियों और भागदौड़ में डूबी नीला को मायके आए बरसों बीत गए थे। इस बार जब वह आई तो घर भर में जैसे रौनक लौट आई हो। भाभी रजनी ने तो जैसे अपने सारे काम छोड़ दिए थे। सुबह से शाम तक नए-नए पकवान, मिठाइयाँ, चटपटे व्यंजन बनाकर नीला को खिलातीं। “आखिर ननद इतने सालों बाद जो आई है… उसका स्वागत खाली हाथ के शब्दों से कैसे पूरा होगा?” रजनी हँसते हुए कहतीं। नीला को बहुत अच्छा लगता। मायके की वही पुरानी गंध, वही आँगन, वही दीवारें… सब उसे बचपन की यादों में लौटा ले जातीं। लेकिन चौथे दिन नीला ने ठान लिया – “आज तो मैं खुद रसोई सँभालूँगी। इतने सालों बाद आई हूँ, सबको अपनी पसंद का खाना बनाकर खिलाऊँगी।” भाभी ने हँसते हुए कहा – “आप ही का है सब। बनाइए, खिलाइए… आज हम भी मौज करेंगे।” और कहकर वह अपनी सिलाई मशीन उठाकर आँगन में जा बैठीं। नीला पूरे उत्साह से रसोई में जुट गई। उसने सोचा – “भैया को खीर बहुत पसंद है।” तो खूब रच-रचकर खीर बनाई। आलू की कचौड़ियाँ बेलीं, तलते ही खुशबू से घर महक उठा। खट्टा-मीठा काशीफल, उबले आलू की चटक रसेदार तरकारी, झन्नाटेदार बूंदी का...

अंतरात्मा_मां

  फीके "दाल-चावल" के अलावा वह उसे कुछ और बना कर खिला नहीं पाया था,..उसे कुछ और बनाना आता भी तो नहीं था... कुक रखने की तो बात तो दूर,..... ऐसी गंदी बीमारी ने पांव पसारा था कि झाड़ू-बर्तन करने वाली बाई को भी बाहर से उस सोसाइटी में आने की अनुमति नहीं थी... वैसे भी जब से ये "कोरोना" नाम वाली बीमारी आई थी तभी से सोसाइटी  के अन्य लोग उससे थोड़ा ज्यादा ही दूरी बनाने लगे थे,.... उसकी पत्नी  बैंककर्मी जो थी! (वर्क फ्रॉम होम भी नहीं कर सकती थी) और अब तो.... वो "कोरोना पॉजिटिव" भी पाई गई थी... "टेस्ट" तो बाप-बेटे दोनों का भी हुआ था,..रिपोर्ट "नेगेटिव" आई थी और दोनों "आइसोलेशन" में ही थे कोई उनसे मिल नहीं सकता था,.....वैसे मिलने भी कौन आने वाला था... जब से उसकी पत्नी आईसीयू में भर्ती हुई थी "कोरोना" का नाम सुनते ही अजनबी तो दूर उसके अपने भी मानो अजनबी से हो गए थे... आखिर बच्चे को संभालने के लिए बुलाए तो बुलाए किसे,..कोई रिश्तेदार  यहां तक की उस बच्चे की दादी/नानी भी आने को तैयार नहीं थी खैर आज उसने खुद मोर्चा संभाला था और खाना ब...

काम करने की कोई उम्र नहीं होती

  “सुमिता बुटीक कलेक्शन” बड़े बड़े अक्षरों में लिखे इस नाम को देख कर आसपास खड़े सारे लोग सुमिता जी को बधाई दे रहे थे…सब की नज़रें कौतूहल से सुमिता जी को ही देख रही थी आख़िर पचास साल की उम्र में ये सब करने की हिम्मत कहाँ से जुटा सकी । इधर बाहर गेट पर अपने नाम का बोर्ड देख कर सुमिता जी की आँखें भर आई थी…. बेटे-बहू ,पोते-पोतियों ,बेटी-दामाद ,नाती -नातिन वाली सुमिता जी कभी ये सोची भी नहीं थी कि ज़िन्दगी के उस मोड़ पर जब सब आराम करने का सोचते…भजन कीर्तन में लगे रहते वो कुछ हासिल करने का प्रयास कर रही है…..उनकी खुद के हाथ में पैसे हो ये सपना कहीं दबा हुआ सा था जिसे वो अंजाम देना को चाहती थी पर कभी दे नहीं पाई … आत्मनिर्भरता का पाठ सबको पढ़ाती पर खुद आत्मनिर्भर नहीं बन पाई थी… आश्रिता की ज़िन्दगी जीते जीते वो कही ना कही से खुद को कमजोर और लाचार महसूस करने लगी थी…बहुत दुख देखे थे जीवन में इसलिए बेटों ने भी माँ को आराम मिले इसका पूरा ध्यान रखा था…पर वो कुछ करना चाहती थी इस उम्र में आ कर जिसके लिए बच्चों को तैयार करना बहुत मुश्किल था पर वो भी माँ कीं ख़ुशी देख कर मान गए थे और सच है ये दिन भी...