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बदलते रिश्ते

 चार दिन हुए थे नीला को मायके आए। ससुराल की जिम्मेदारियों और भागदौड़ में डूबी नीला को मायके आए बरसों बीत गए थे। इस बार जब वह आई तो घर भर में जैसे रौनक लौट आई हो।

भाभी रजनी ने तो जैसे अपने सारे काम छोड़ दिए थे। सुबह से शाम तक नए-नए पकवान, मिठाइयाँ, चटपटे व्यंजन बनाकर नीला को खिलातीं।
“आखिर ननद इतने सालों बाद जो आई है… उसका स्वागत खाली हाथ के शब्दों से कैसे पूरा होगा?” रजनी हँसते हुए कहतीं।

नीला को बहुत अच्छा लगता। मायके की वही पुरानी गंध, वही आँगन, वही दीवारें… सब उसे बचपन की यादों में लौटा ले जातीं।

लेकिन चौथे दिन नीला ने ठान लिया –
“आज तो मैं खुद रसोई सँभालूँगी। इतने सालों बाद आई हूँ, सबको अपनी पसंद का खाना बनाकर खिलाऊँगी।”

भाभी ने हँसते हुए कहा –
“आप ही का है सब। बनाइए, खिलाइए… आज हम भी मौज करेंगे।”

और कहकर वह अपनी सिलाई मशीन उठाकर आँगन में जा बैठीं।

नीला पूरे उत्साह से रसोई में जुट गई।
उसने सोचा – “भैया को खीर बहुत पसंद है।”
तो खूब रच-रचकर खीर बनाई।

आलू की कचौड़ियाँ बेलीं, तलते ही खुशबू से घर महक उठा।
खट्टा-मीठा काशीफल, उबले आलू की चटक रसेदार तरकारी, झन्नाटेदार बूंदी का रायता और गरमागरम पूड़ियाँ… सब तैयार हो गया।

खाने की थाली सजते ही घर में सब जुट गए। सब उंगलियाँ चाट-चाटकर खाते और नीला की तारीफ करते।
नीला का दिल खुशियों से भर गया।

सबको खिला-पिलाकर नीला ने सोचा –
“छोटे भैया अकेले हैं, उसकी छोटी भाभी मायके गई हैं। बेचारा खुद ही बनाकर खाता होगा। क्यों न उनके लिए भी थाली सजा दूँ?”

उसने हिम्मत करके भाभी रजनी से कहा –
“भाभी… मैं यह थाली छोटे भैया को दे आऊँ? वो अकेले हैं।”

भाभी सिलाई मशीन चलाते-चलाते रुकीं। फिर मुस्कुराकर बोलीं –
“दीदी… अपने बड़े भैया से पूछ लीजिए। वही बताएँगे।”

उनकी आवाज़ में एक हल्की खटास थी।
नीला के कानों में वही शब्द गूँज उठे –
“आप ही का है सब, बनाइए-खिलाइए…”

नीला के दिल में कुछ चुभा।
भाभी के स्वर में अपनापन था या ताना?
वह समझ नहीं पाई।

यादों का पिटारा खुल गया।
उसे याद आया – बचपन में कैसे वही भाभी उसे दुलार से खिलाती-पिलाती थीं। त्योहारों पर उसके लिए नए कपड़े सिलतीं, गहनों के डिब्बे से चुनकर चूड़ियाँ पहनातीं।

लेकिन अब वक्त बदल गया था।
अब वही भाभी अपने हिस्से की सीमाएँ खींचने लगी थीं। छोटे देवर और उनके हिस्से को लेकर मन में खटास थी। शायद यही वजह थी कि उन्होंने टाल दिया।

नीला चुप रह गई। उसके होंठ हिले, मगर शब्द गले में अटक गए।

इसी बीच पीछे से कहीं रेडियो पर गीत बज उठा –
“ना जाने कैसे पल में बदल जाते हैं… ये दुनिया के बदलते रिश्ते…”

नीला का दिल भर आया।
वह सोचने लगी –
“सच ही तो है। रिश्ते वक्त के साथ बदल जाते हैं। वही भाभी जो कभी माँ-सी थीं, आज दीवार-सी हो गई हैं। कहाँ गया वह अपनापन?”

शाम को नीला माँ के पास जा बैठी।
माँ ने प्यार से सिर सहलाते हुए कहा –
“बिटिया, सोच में क्यों पड़ गई?”

नीला ने हिचकते हुए कहा –
“माँ, रिश्ते क्यों बदल जाते हैं? जो लोग कभी अपना सबकुछ लगते हैं, वही धीरे-धीरे पराये क्यों हो जाते हैं?”

माँ मुस्कुराई।
“बिटिया, वक्त के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं। जिम्मेदारियाँ, लालच, अधिकार… सब रिश्तों की मिठास को बदल देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रिश्ते खत्म हो जाते हैं। बस उनकी परिभाषा बदल जाती है।”

नीला ने माँ की आँखों में गहराई देखी। सचमुच, रिश्तों का गणित बड़ा कठिन था।

रात को नीला छत पर बैठी थी।
चाँदनी उसके चेहरे पर बिखरी थी। मन में कसक थी, लेकिन साथ ही दृढ़ता भी।

उसने सोचा –
“मैं यहाँ मेहमान की तरह आई हूँ। लेकिन भाभी रोज़-रोज़ के खटास-मीठास से जी रही हैं। मुझे शिकायत नहीं करनी चाहिए। मुझे अपने हिस्से की मिठास खुद पैदा करनी होगी।”

सुबह उठकर उसने भाभी के पास जाकर कहा –
“भाभी, कल आपने सिलाई का जो सूट बनाया, बहुत सुंदर है। क्या आप मुझे भी सिलाई सिखाएँगी?”

भाभी चौंक गईं। उनके चेहरे पर अनायास मुस्कान फैल गई।
“क्यों नहीं दीदी, आप तो मेरी ननद हैं, मेरी सहेली।”

उस पल नीला ने समझ लिया –
रिश्तों में दूरी शिकायत से नहीं, अपनापन बढ़ाने से घटती है।

नीला की मायके की वह यात्रा उसके लिए एक सीख बन गई। उसने जाना कि समय चाहे जितना बदल जाए, रिश्तों को संभालने का जतन अपने हाथ में है।

भाभी चाहे ताना दें या दूरी बना लें, अगर हम दिल खोलकर मुस्कुरा दें तो शायद रिश्ता फिर से अपने पुराने रूप में लौट आए।

उस रात नीला ने डायरी में लिखा –
“रिश्ते मौसम की तरह होते हैं। कभी तपन, कभी ठंडी हवा, कभी बरसात। लेकिन अगर धैर्य रखा जाए तो फिर से बसंत आ ही जाता है।”

और उसकी आँखों में वही गीत गूँज उठा –
“ना जाने कैसे पल में बदल जाते हैं… ये दुनिया के बदलते रिश्ते…”


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