सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अंतरात्मा_मां

 फीके "दाल-चावल" के अलावा वह उसे कुछ और बना कर खिला नहीं पाया था,..उसे कुछ और बनाना आता भी तो नहीं था...

कुक रखने की तो बात तो दूर,.....

ऐसी गंदी बीमारी ने पांव पसारा था कि झाड़ू-बर्तन करने वाली बाई को भी बाहर से उस सोसाइटी में आने की अनुमति नहीं थी...

वैसे भी जब से ये "कोरोना" नाम वाली बीमारी आई थी तभी से सोसाइटी  के अन्य लोग उससे थोड़ा ज्यादा ही दूरी बनाने लगे थे,....

उसकी पत्नी  बैंककर्मी जो थी! (वर्क फ्रॉम होम भी नहीं कर सकती थी)

और अब तो.... वो "कोरोना पॉजिटिव" भी पाई गई थी...

"टेस्ट" तो बाप-बेटे दोनों का भी हुआ था,..रिपोर्ट "नेगेटिव" आई थी और दोनों "आइसोलेशन" में ही थे

कोई उनसे मिल नहीं सकता था,.....वैसे मिलने भी कौन आने वाला था...

जब से उसकी पत्नी आईसीयू में भर्ती हुई थी "कोरोना" का नाम सुनते ही अजनबी तो दूर उसके अपने भी मानो अजनबी से हो गए थे...

आखिर बच्चे को संभालने के लिए बुलाए तो बुलाए किसे,..कोई रिश्तेदार  यहां तक की उस बच्चे की दादी/नानी भी आने को तैयार नहीं थी

खैर आज उसने खुद मोर्चा संभाला था और खाना बनाने से पहले एक "मां" की तरह अपने लाड़ले से पूछा था..

"आज मेरा राजा बेटा क्या खाएगा...

"आलू के पराठे....

अपनी मां के वापस लौटने के इंतजार में गुमसुम हो चुके मासूम के मुंह से इतना सुनते ही उसने बिना एक पल गंवाए उसे गोद में उठा,.. सीने से लगा,..उसके माथे को चूम लिया था...

हफ्ते भर से दूध-बिस्किट-ब्रेड पर ही दिन काट रहे मासूम ने आज पहली बार मुस्कुरा कर उससे कुछ फरमाइश की थी....

"अभी बनाता हूं....

उसकी खोई हुई मुस्कान की हल्की झलक अचानक उसके होठों पर देख,.अब वो किसी कीमत पर उस मुस्कान को फिर से खोने को तैयार नहीं था...

चाहे जैसे भी हो,..उसने आलू के पराठे बनाने की ठान ली थी।

ठान तो लिया था.....

लेकिन आज पहली बार उस विशिष्ट व्यंजन को बनाने की विधि यूट्यूब पर बार-बार देखने के बावजूद भी उसकी स्थिति भयावह बनी हुई थी...आलू उबालना तो कोई कठिन काम नही था उसके लिए... और जैसे-तैसे कर आज आटा भी गूंथ ही लिया था....

चैलेंज था.....

उबले हुए आलू मे नमक-मसाले मिलाकर उसे स्वादिष्ट बना गूंथे हुए आटे में घुसेड़ना.....

और उससे भी बड़ा चैलेंज था.....उसे बेलन की सहायता से परफेक्ट गोल आकार देना...

वो आईटी सेक्टर के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट के बड़ी से बड़ी समस्याओं को चुटकी में सरल करता था,..

लेकिन आज अपने 4 वर्ष के बच्चे की फरमाईश पर उसका मनपसंद "आलू का पराठा" बनाना उसके लिए पहाड़ जैसा चैलेंज बना हुआ था,.लेकिन वह हार मानने वालों में से नहीं था....

नमक मसालों के साथ दोस्ती हो जाने के बावजूद आलू,..जैसे-तैसे गूंथे हुए आटे की "हदबंदी" मानने को तैयार नहीं था!..पराठे के गोल आकार लेने से पहले ही वह बार-बार "सीमा-रेखा" लांघ बाहर आ रहा था।

खैर वह भी कहां हार मानने वाला था वह समझ गया था कि आलू "बेलन" को देख घबरा रहा है,..इसलिए आटे की हदबंदी तोड़ बाहर आ रहा है!

अत: उसने बेलन छोड़ अपनी हथेलियों की "प्यार भरी थाप" से ही पराठे को आकार देने का फैसला किया था।

प्यार की हल्की थाप में आलू और आटे को उलझा उसने अंतत: अपने हाथों से पहले पराठे को गोल आकार दे ही दिया था।

उसने महसूस किया गर्म तवे पर खुशबू फैलाता घी के संग सिंकते पराठे की रंगत के साथ-साथ उसके भीतर भी कुछ बदल रहा था।

उधर कई दिनों से बमुश्किल कुछ कौर ही खाने वाला मासूम घर में फैली अपनी पसंदीदा जानी-पहचानी खुशबू में सराबोर हो रसोई तक पहुंच अचानक बोल उठा था….

"पापा जल्दी दो.....भूख लगी है....

उसने लपक कर बेटे को गोद में उठा लिया था और अच्छी तरह सिंक चुका इकलौता पराठा तवे से उतार,..वही पड़ी तश्तरी में डाल सीधे डायनिंग टेबल पर आ गया था।

उस गर्म पराठे को एक किनारे से तोड़,..अपने होठों से फूंक कर उसे ठंडा किया था..और अपने बच्चे का पहला मनपसंद निवाला उसके मुंह में डालते ही उसकी आंखें खुद-ब-खुद छलक पड़ी थी।

बड़े दिनों बाद बच्चे ने मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी को मिला एक खास इशारा जो किया था।

"टेस्टी".....👌👌

बेशक उस वक्त उसके शरीर के भीतर "कोख" जैसी कोई संरचना नहीं उभरी होगी!.. किंतु आज उस नन्हीं सी जान को अपने हाथों से बनाकर उसका कुछ मनपसंद खिलाते हुए उसकी अंतरात्मा "मां" जैसी "ममता से भर उठी थी...

दोस्तो करोना भयंकर बिमारी है पर आपसी प्रेम भी जरुरी है। एक दुसरे का साथ दे।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सोने का पिंजरा

  "सास को लगता था कि पैसे की लगाम कसकर वो बहू को मुट्ठी में रख सकती है, लेकिन उसने यह नहीं सोचा था कि जिस दिन बहू ने अपनी 'कमाई' का पहला गहना उसके कदमों में रखा, उस दिन सास का अहंकार और तिजोरी का ताला, दोनों एक साथ टूट जाएंगे..." सुबह के दस बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा हुआ था, लेकिन घर में एक अजीब सा तनाव पसरा हुआ था। सृष्टि अपनी सास, गायत्री देवी के सामने सिर झुकाए खड़ी थी। उसके हाथ अपनी साड़ी के पल्लू में कसकर बंधे हुए थे, जैसे वह खुद को बिखरने से रोक रही हो। "माँ जी , वो... अगले हफ्ते मेरी मौसी की बेटी की शादी है। मुझे शगुन के लिए और कुछ अपनी तैयारियों के लिए पांच हजार रुपये चाहिए थे," सृष्टि ने बहुत हिम्मत जुटाकर, दबी हुई आवाज़ में कहा। गायत्री देवी ने चाय की चुस्की ली और अखबार से नज़रें हटाए बिना कहा, "पाँच हजार? अभी पिछले महीने ही तो तुमने करवा चौथ पर नई साड़ी ली थी। और शगुन के लिए तो तुम्हारे पास वो लिफाफे रखे होंगे जो पिछले साल दिवाली पर रिश्तेदारों ने दिए थे। उनका इस्तेमाल कर लो। हर छोटी-छोटी बात पर पैसे खर्च करने की आदत अच्छी नहीं होत...

कड़वी दवा

  "कभी-कभी परिवार को बिखरने से बचाने के लिए एक स्त्री को 'बुरी' बनना पड़ता है। क्या एक बहू का अधिकार मांगना हमेशा लालच होता है, या कभी-कभी यह एक डूबते हुए घर को बचाने की आखिरी कोशिश होती है?" "नहीं आदित्य!" शिखा की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जो आज से पहले किसी ने नहीं देखी थी। "मैं माफ़ी नहीं मांगूंगी। पिछले तीन साल से मैं चुप थी, लेकिन अब और नहीं। क्या आपको पता है कि पिछले महीने मुन्नू की स्कूल फीस भरने के लिए मुझे अपने मायके से पैसे मांगने पड़े थे? क्या आपको पता है कि घर में राशन नहीं था और माँ जी ने पैसे देने से मना कर दिया था?" महीने की पहली तारीख थी। शाम का वक्त था और घर के बाहर हल्की बारिश हो रही थी, लेकिन शर्मा निवास के अंदर का माहौल किसी तूफ़ान से कम नहीं था। आदित्य ऑफिस से लौटा ही था। पसीने से लथपथ, कंधे पर बैग टांगे वह सीधा अपनी माँ, सुमित्रा देवी के पास गया। सुमित्रा जी सोफे पर बैठी माला जप रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें बार-बार दरवाजे की तरफ उठ रही थीं। बेटे को देखते ही उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। यह पिछले पांच सालों का नियम था। आद...

"कीमत साड़ी की नहीं, मुस्कान की"

  दुकानदार ने काउंटर पर दो साड़ियां फैलाईं। एक गहरे लाल रंग की बनारसी साड़ी थी, जिसकी जरी का काम आंखों को चकाचौंध कर रहा था, और दूसरी हल्के गुलाबी रंग की शिफॉन की साड़ी थी, जो सुंदर तो थी लेकिन बनारसी के आगे फीकी लग रही थी। "मैडम, यह लाल वाली पंद्रह हजार की है और यह गुलाबी वाली पांच हजार की। आप देख लीजिये," दुकानदार ने कहा। सुमन ने दोनों साड़ियों को हाथ लगाकर देखा। फिर उसने अपनी ननद, कोमल की तरफ देखा, जो उस लाल साड़ी को ललचाई नज़रों से देख रही थी। कोमल की अगले महीने शादी थी और आज शगुन की साड़ी खरीदी जा रही थी। सुमन ने धीरे से अपने पति, राजेश के कान में फुसफुसाया, "राजेश, कोमल की शादी का बजट पहले ही ऊपर जा रहा है। पंद्रह हजार की साड़ी सिर्फ एक दिन के लिए पहनना समझदारी नहीं है। यह गुलाबी वाली भी तो अच्छी है, और हल्की भी रहेगी। पांच हजार में काम हो जाएगा, बाकी पैसे कैटरिंग में काम आ जाएंगे।" राजेश थोड़ा हिचकिचाया। वह अपनी इकलौती बहन की खुशी कम नहीं करना चाहता था, लेकिन सुमन की बात भी व्यावहारिक (Practical) थी। घर की आर्थिक स्थिति थोड़ी तंग थी। सुमन ने तुरंत फैसला लेते ...