कोई सपना बड़ा या छोटा नहीं होता, बस सच्चा होना चाहिए

 “वाह रे भगवान! आखिर तूने हमारी सुन ही ली!”

रमेश चाचा मिठाई का डिब्बा खोलते हुए बोले, “मुकेश भाई, दिल से बधाई! बेटी का चयन प्रशासनिक सेवा में हुआ है — अब तो सरकारी बंगला, गाड़ी, नौकर-चाकर, सब मिलेगा। तुम लोगों की तो किस्मत खुल गई।”

मुकेश मुस्कुराते हुए बोले, “हां चाचा, यह तो सच में ईश्वर की कृपा है। देखो, अब हमारे घर की बेटी अफसर बन गई है। क्या ठाठ-बाट होंगे, सोचकर ही मन खुश हो जाता है।”
उनकी पत्नी सावित्री गर्व से बोलीं, “हमारी रीना ने तो पूरे खानदान का नाम रोशन कर दिया। बचपन से ही कहती थी — ‘मां, मैं बड़ी अफसर बनूंगी।’ अब देखो, वो सपना सच हो गया।”

रमेश ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा, “सच कहूं तो, मुकेश भाई, आपकी मेहनत रंग लाई। लेकिन…”
“लेकिन क्या?” मुकेश ने चौंककर पूछा।

“लेकिन कभी ये मत भूलिए कि जिस आज़ादी और सपनों की उड़ान के लिए आपकी बेटी ने संघर्ष किया, उसी में अब आप लोग अनजाने में बंधन डाल रहे हैं,” रमेश ने धीमे स्वर में कहा।

मुकेश ने हैरानी से कहा, “आपका मतलब?”

“देखिए, रीना की अभी पहली पोस्टिंग हुई है। नई जगह, नए लोग, नई जिम्मेदारियां। उसके भी कुछ अपने अरमान होंगे — अपने पैरों पर खड़ा होना, अपने निर्णय खुद लेना, अपनी मेहनत से पहचान बनाना। लेकिन आप लोग वहाँ जाकर उसके आसपास दीवार बन रहे हैं। आपने देखा नहीं, पिछले तीन दिनों से वो ऑफिस से आते ही आपके साथ व्यस्त हो जाती है — कभी बाजार, कभी पूजा, कभी रिश्तेदारों से वीडियो कॉल। अब ज़रा सोचिए, जब अफसर खुद अपने जीवन पर नियंत्रण न रख पाए तो दूसरों पर क्या प्रभाव छोड़ेगी?”

सावित्री कुछ खिन्न होकर बोलीं, “आप ये क्या कह रहे हैं, रमेश जी? बेटी तो हमारी है। उसकी खुशी में शामिल होना क्या गुनाह है?”

रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं भाभी, गुनाह तो नहीं, मगर कभी-कभी प्यार भी बंधन बन जाता है। रीना अब सिर्फ आपकी बेटी नहीं, बहुत से लोगों की जिम्मेदारी है।”

मुकेश को कुछ खटकने लगा। वह सोच में डूब गया। पर तभी दरवाज़ा खुला और रीना अंदर आई — ऑफिस की वर्दी में, चेहरे पर थकान, मगर आँखों में चमक थी।

“पापा, चाचा आए हैं?” उसने हँसते हुए पूछा।
“हाँ बेटी,” मुकेश बोले, “तेरी ही बात चल रही थी।”

रीना ने अपने जूते उतारे, और जैसे ही सोफे पर बैठी, रमेश बोले, “बिटिया, बहुत व्यस्त लग रही हो आजकल।”

“हाँ चाचा, काम तो बहुत है। सब कुछ नया है — स्टाफ, सिस्टम, और जिम्मेदारियाँ। पर मज़ा भी आ रहा है।”

सावित्री बोलीं, “तू थोड़ा संभल के चल रीना, अब तो बड़ी अफसर है। ज्यादा देर ऑफिस में मत रुकना, रात को बाहर मत जाना। और देखो, खाने-पीने का भी ध्यान रखना।”

रीना मुस्कुरा दी, “माँ, आप फिक्र मत करो। सब ठीक है।”

पर रमेश चाचा ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “रीना, तू खुश तो है न?”

रीना ने चौककर कहा, “क्यों चाचा? बिल्कुल खुश हूँ।”

“अच्छा, सच बता। क्या तू अपने मन की जिंदगी जी रही है या माँ-बाप के सपनों की?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।
रीना कुछ पल चुप रही। फिर धीमे स्वर में बोली,
“चाचा, सच कहूं तो मेरे भी कुछ सपने थे — शायद थोड़ा अलग, थोड़ा अपने जैसे। मैं विदेश जाकर काम करना चाहती थी, एक NGO खोलना चाहती थी जहाँ गरीब बच्चों को पढ़ा सकूँ। लेकिन पापा का सपना था कि मैं अफसर बनूं। उनके लिए मैंने वो सपना अपना लिया।”

सावित्री ने बीच में कहा, “और इसमें बुरा क्या है बेटी? अफसर बनना तो बड़ी बात है। कितने लोग सपना देखते हैं, पर पूरा कितनों का होता है?”

रीना ने मुस्कुराकर कहा, “माँ, बुरा कुछ नहीं है। मुझे भी गर्व है कि मैं अफसर हूँ। पर कभी-कभी लगता है कि मैंने अपनी मंज़िल किसी और के लिए चुनी।”

रमेश ने गंभीर स्वर में कहा, “बिटिया, यही बात मैं तेरे पापा से कह रहा था। हर इंसान का अपना आसमान होता है। हम अपने बच्चों को पंख दे सकते हैं, उड़ान नहीं तय कर सकते। अगर हम ही तय करेंगे कि उन्हें कहाँ तक उड़ना है, तो फिर उनकी उड़ान का क्या मतलब रह जाएगा?”

मुकेश ने सिर झुका लिया।

रीना ने आगे कहा, “पापा, मेरे लिए ये नौकरी कोई शान की बात नहीं, एक जिम्मेदारी है। मैं चाहती हूँ कि आप दोनों मेरे साथ रहें, पर मेरे कंधों पर बोझ बनकर नहीं, मेरी ताकत बनकर।”

सावित्री ने प्यार से कहा, “बिटिया, तू जो भी करेगी, हमें मंज़ूर है।”

रीना ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा, आपको याद है न, आप कहते थे — ‘जब तू अफसर बनेगी, तो मैं तेरे साथ सरकारी गाड़ी में घूमूँगा।’ चलिए आज आपका सपना पूरा करते हैं।”

मुकेश ने हैरान होकर पूछा, “क्या मतलब?”

रीना बोली, “ड्राइवर बाहर इंतज़ार कर रहा है। चलिए, शहर घुमा लाती हूँ आपको। लेकिन रास्ते में एक स्कूल भी चलेंगे — वहाँ बच्चों के लिए कुछ किताबें देना चाहती हूँ। मेरी पहली तनख्वाह से।”

रमेश के चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी।
रीना बोली, “पापा, अब मैं समझ गई हूँ — कोई सपना बड़ा या छोटा नहीं होता, बस सच्चा होना चाहिए।”

मुकेश की आँखें भर आईं।
“बिटिया, तूने आज मेरी सोच बदल दी। मैं तेरे अरमानों में अपनी खुशी ढूँढता रहा, पर तूने मेरी खुशी में अपना सपना ढूँढ लिया।”

रीना ने हँसते हुए कहा, “पापा, अब चलिए — सपने भी घूमने निकले हैं।”

रमेश बोले, “मुकेश, आज तो तेरे पास तीन-तीन खुशियाँ हैं — अफसर बेटी, समझदार बेटी, और इंसानियत से भरी बेटी।”

मुकेश ने कहा, “हाँ भाई, अब गर्व के साथ कह सकता हूँ — मैंने अफसर नहीं, इंसान पाला है।”

रीना माँ का हाथ थामकर बाहर निकली।
ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला, कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

सावित्री खिड़की से बाहर देख रही थीं — वही सड़कें, वही शहर, पर आज उन्हें सब कुछ नया लगा।

क्योंकि आज उन्होंने पहली बार महसूस किया था —
सच्चा सुख सरकारी गाड़ियों, बंगले या ठाठ-बाट में नहीं, बल्कि अपने बच्चों की सच्ची मुस्कान और उनकी आत्मा की आज़ादी में होता है।

लतिका श्रीवास्तव 


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ