मैं एक फेरीवाला, आज भी उसी घर के सामने खड़ा हूँ, जहाँ एक बूढ़ी माई रहती हैं, मगर आज घर में ताला लगा है। नवम्बर से ही कश्मीरी चादर और ऊनी कपड़े बेचता हूँ। आज तक इस माई ने मुझसे एक भी चादर नहीं खरीदा। इधर से निकलता था तो, रोज रोक के सारी चादरें देखती फिर बहुत महंगे हैं या..उतने अच्छे नहीं हैं, बोल देती और मेरा एक घंटा इसी में बरबाद हो जाता। शुरू में तो बहुत गुस्सा आता था पर दो चार दिन के बाद मुझे भी आदत हो गयी इस माई की। सब फेरीवाले बोलते हैं मुझे..और माई!..माई मेरा नाम जान गई है दिनेश! मैं भी हक़ से अब पानी या कुछ खाने को मांग लेता हूँ।
"भाई! यहाँ एक माई रहती हैं.. कहीं गयीं हैं क्या?" मैंने एक पड़ोस के लड़के से पूछा
"पता नहीं कहाँ गयी है बुढ़िया..उधार है क्या?" कसम से खून उबल आया.. ऐसा लगा किसी ने मेरी अपनी माँ को..
तभी देखा माई चली आ रही है
"कहाँ गयी थी माई? मैं कब से.."
"तू ही तो बोला था ना कि आज तेरा आखरी फेरा है इस शहर में.. तेरे लिए गुड़ लाने गयी थी.. पानी के साथ अच्छा लगता है ना तुझे! ट्रेन में खाते जाना" हाथों में गुड़ और आँखों में पानी था माई के..समझ गया उसे मेरा जाना अच्छा नहीं लग रहा था
"मैं अब नहीं जा रहा हूँ माई"
"क्यूँ रे?"
"अब यहीं रहूँगा.. वहाँ मेरी माई नहीं है"
हम दोनों हँसते हँसते रो पड़े..!
विनय कुमार मिश्रा
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