"तुम्हारा नियुक्ति पत्र आया है कुसुम! तुम्हारा प्राइमरी स्कूल में चयन हो गया है "
मैं स्तब्ध थी मगर इन्हें विश्वास था।अपने चश्मे के पीछे अपनी खुशियों और संघर्ष को छुपाते हुए इन्होंने नियुक्ति पत्र मेरे हाथों में रख दिया। मेरी आंखों में भी दो बूंद खुशी के आ गए।
मैं कोई ज्यादा पढ़ी लिखी महिला नहीं थी। बल्कि गाँव की आठवीं फेल लड़की थी, जिसकी शादी मेरे ताऊ जी ने एक शिक्षित परिवार में धोखे से कर दी थी। ये भी पढ़े लिखे और नौकरी में थे। मेरे ताऊ जी का ये धोखा मुझे रोज ही इस घर में ज़लील करता। मेरी बोली, मेरी अशिक्षा का रोज ही मज़ाक उड़ाया जाता। पढ़ीलिखी छोटी बहू के आने के बाद और भी ज्यादा।
"विमल! तुम इस अनपढ़ को इसके ताऊ जी के यहाँ छोड़ आओ या दो दिनों के लिए गाँव लेकर चले जाओ। कल छोटी बहू के मायके से कुछ लोग आ रहे हैं, तुम्हारे भले के लिए ही कह रही हूँ। बस दो दिनों की बात है, तुम्हारा मज़ाक बनने से रह जायेगा"
ऐसी बातें इनपर क्या असर करतीं थीं मैं नहीं जानती पर उस वक़्त मुझे इनसे आँख मिलाने में भी शर्म आती थी। पूरे घरवालों के सामने जब इन्हें मेरी वजह से बेबस देखती तो अंदर से रो पड़ती थी। मैंने इस अशिक्षा के अभिशाप को अपनी किस्मत मान लिया था पर इन्होंने शायद कुछ और।
इन्हें धोखा मिला था ताऊ जी से। मुझे इनसे प्यार पाने का भी हक़ नहीं था। मगर बदले में इन्होंने मुझे प्यार के साथ सम्मान भी दिया।आज मेरे इस नियुक्ति पत्र के पीछे इनके बारह साल का संघर्ष और परिश्रम है। मैं भरी आँखों से इनके गले लग नियुक्ति पत्र पर लिखे नाम को गौर से देख रही थी
"कुसुम विमल त्यागी" जो सिर्फ कहने और लिखने के लिए नहीं है
एक सफल पुरूष के पीछे एक स्त्री का हाथ कहते बहुतों को सुना है पर आज एक स्त्री की सफलता में एक पुरूष का हाथ है..!
विनय कुमार मिश्रा
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