सुबह का वक्त था। कॉलोनी के पार्क में कुछ बुज़ुर्ग लोग आपस में बैठकर गप्पें मार रहे थे, कोई अखबार पढ़ रहा था, कोई धीरे-धीरे टहल रहा था। दूसरी ओर कुछ युवा लोग दौड़ लगा रहे थे और बच्चे अपनी साइकिलों और गेंदों के साथ मस्ती में खेल रहे थे।
इन्हीं बुज़ुर्गों में आज एक दिलचस्प चर्चा चल रही थी।
रामेश्वर बाबू, जो सरकारी बैंक से रिटायरमेंट के करीब थे, अपने पुराने दोस्त दीवान सिंह से कहने लगे —
“अरे भाई, छोटी बिटिया साक्षी के लिए कोई अच्छा रिश्ता बताइए न, अब ये जिम्मेदारी भी निपट जाए तो चैन की सांस लूँ। रिटायरमेंट से पहले यह काम निपट जाए तो समझो जीवन का सबसे बड़ा काम पूरा।”
दीवान सिंह मुस्कुराए, “अरे भाई रामेश्वर, तुम तो बहुत बेचैन लगते हो इस काम को लेकर! अच्छा, बताओ तो सही कैसी चाह है तुम्हें दामाद के रूप में?”
रामेश्वर बाबू ने ठोड़ी खुजाई और बोले,
“देखो भाई, साक्षी बैंक में नौकरी करती है। हमारी सबसे छोटी है, बहुत नाजो से पाली है। ज़रा भी कुछ कह दो तो नाराज़ हो जाती है। इसलिए मैं ऐसा लड़का ढूँढना चाहता हूँ जो अच्छा कमाने वाला हो, स्मार्ट हो, और सबसे जरूरी — अपनी पत्नी को बराबर का सम्मान दे। अब आजकल की लड़कियाँ सुनना नहीं चाहतीं… पढ़ी-लिखी हैं, कमाती हैं तो अपने हिसाब से सोचती हैं।”
ये कहते हुए उन्होंने ज़ोर का ठहाका लगाया।
पास ही बैठे कुछ लोग भी मुस्कुरा दिए।
दीवान सिंह ने थोड़ा गंभीर होकर कहा,
“देखो, मुझे एक अच्छा परिवार पता है। लड़का इंजीनियर है, कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है। पिता का व्यापार है, माँ गृहिणी हैं, और दादी भी जीवित हैं। सब मिलजुल कर रहते हैं, बहुत संस्कारी लोग हैं। अगर चाहो तो बात आगे बढ़ाऊँ?”
रामेश्वर बाबू ने तुरंत हाथ हिलाते हुए कहा,
“ना भाई, ना! इतनी बड़ी फैमिली में मेरी साक्षी कैसे रहेगी? इतने सारे लोगों के बीच वो घुट जाएगी। अब देखो, साक्षी को हमने नौकरानी थोड़े ही पाला है कि ससुराल वालों की सेवा करती फिरे। हम चाहते हैं कि उसका पति और वो दोनों अपने हिसाब से जीवन जिएँ। कोई टोकने वाला न हो। कोई शहर में अकेला लड़का हो, वहीं ठीक रहेगा।”
दीवान सिंह ने कुछ कहने को मुँह खोला, फिर मुस्कुराकर बोले,
“पर भाई, जब ससुराल वाले साथ हों, तो परिवार का सहारा रहता है। कल को दोनों के बीच मतभेद हो जाएँ तो बड़े-बुज़ुर्ग संभाल लेते हैं। अकेले रहने वाले बच्चे कई बार छोटी बातों पर रिश्ते तोड़ लेते हैं। परिवार तो इसलिए होता है कि वो जोड़कर रखे।”
रामेश्वर बाबू ने सिर हिलाया,
“अरे भाई, हम हैं न सहारा देने को! वैसे भी, साक्षी बहुत कोमल दिल की लड़की है। इतने सारे लोगों की जिम्मेदारी नहीं उठा पाएगी। उसके लिए तो बस एक ऐसा घर चाहिए जहाँ सब उसकी मर्ज़ी से चले।”
दीवान सिंह ने धीरे से मुस्कुरा दिया, “बच्चों को नाज़ों से पालना बुरा नहीं है, पर उन्हें रिश्ते निभाना भी सिखाना चाहिए। वरना वो नाज़ खुद रिश्तों को तोड़ देते हैं।”
इतने में एक कोने में बैठे अस्सी वर्ष के बुज़ुर्ग, हरिप्रसाद जी, जो अब तक खामोशी से सब सुन रहे थे, हल्के से हँस पड़े।
उन्होंने चश्मा उतारकर रामेश्वर बाबू की ओर देखा और बोले —
“रामेश्वर बेटा, तुम बड़ी अजीब बातें करते हो। बेटी को तो नाजो से पाला, लेकिन बहू को क्यों नहीं? तुम्हारा बेटा भी तो शादीशुदा है न?”
“हाँ, हाँ अंकल,” रामेश्वर बाबू गर्व से बोले, “अर्जुन तो यहीं शहर में नौकरी करता है। हमने उसे कहीं और भेजने नहीं दिया। आखिर माँ-बाप की सेवा करना उसका फर्ज़ है।”
हरिप्रसाद जी हल्के से मुस्कुराए,
“और उसकी पत्नी… वो बहू? उसे क्या तुम्हारे बेटे की सेवा का अधिकार नहीं? या उसके माता-पिता ने उसे इसलिए पाला कि वो ससुराल में नौकरानी बने?”
रामेश्वर बाबू कुछ हकलाने लगे,
“नहीं-नहीं अंकल, बात वो नहीं है…”
हरिप्रसाद जी ने बीच में टोका —
“बात तो वही है बेटा। तुम अपनी बेटी के लिए ऐसा घर ढूँढ रहे हो जहाँ कोई उसे कुछ कह न सके, पर अपने बेटे की पत्नी के लिए ऐसा घर बना दिया है जहाँ वो बोले तो तुम्हें बुरा लगे।
तुम्हें अपनी बेटी के लिए ‘अकेले रहने वाला बेटा’ चाहिए, और अपने लिए ‘साथ रहने वाला बेटा’।
मतलब साफ़ है — तुम्हें सुविधाजनक रिश्ते चाहिए, इंसाफ़ नहीं।
और याद रखना बेटा, जो माँ-बाप अपनी बेटियों के लिए ऐसे घर चाहते हैं जहाँ कोई रोक-टोक न करे, वही माँ-बाप अपने बेटे की बहू से उम्मीद रखते हैं कि वो बिना सवाल किए सबकी सेवा करे। यही दोहरा मापदंड आज परिवारों को तोड़ रहा है।”
यह सुनते ही पार्क में सन्नाटा छा गया।
सभी बुज़ुर्ग अब गंभीर हो गए।
रामेश्वर बाबू का चेहरा उतर गया। वो कुछ कह नहीं पाए।
हरिप्रसाद जी ने उठते हुए कहा —
“आज की पीढ़ी को दोष देने से पहले हमें खुद को देखना होगा। अगर तुम चाहते हो कि बहू तुम्हारी इज़्ज़त करे, तो पहले बेटी को भी किसी के घर में वही संस्कार देना होगा जो तुम बहू से चाहते हो। परिवार प्यार से चलते हैं, सुविधा से नहीं।
तुम कहते हो न कि साक्षी नाज़ुक है… उसे ज़िम्मेदारी निभाना नहीं आता।
तो सोचो, कहीं वही नाज़ुकपन कल उसकी शादी को कमजोर न बना दे।”
इतना कहकर वो उठे, अपनी छड़ी सँभाली और धीरे-धीरे पार्क से बाहर चले गए।
बाकी सब उन्हें जाते हुए देखते रहे।
रामेश्वर बाबू वहीं बेंच पर बैठ गए, सोच में डूबे हुए।
शर्मिंदगी उनके चेहरे पर साफ दिख रही थी।
दीवान सिंह ने उनके कंधे पर हाथ रखा —
“भाई, बात कड़वी थी, लेकिन सच थी।
बेटी और बहू में फर्क करोगे तो रिश्ते कभी संतुलित नहीं रहेंगे।
परिवार तभी टिकेगा जब दोनों को बराबरी का सम्मान मिलेगा।”
रामेश्वर बाबू ने गहरी साँस ली, “तुम सही कहते हो, दीवान भाई। हम अपने बच्चों के भविष्य को अपने नजरिए से गढ़ना चाहते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि उनकी भी अपनी दुनिया, अपनी सोच है। आज हरिप्रसाद अंकल ने आईना दिखा दिया। अब मैं साक्षी के लिए ऐसा रिश्ता ढूँढूँगा जहाँ वो न सिर्फ खुश रहे, बल्कि जिम्मेदारी निभाना भी सीखे।”
कुछ दिनों बाद रामेश्वर बाबू सच में बदले हुए दिखाई दिए।
उन्होंने साक्षी से कहा —
“बेटी, हम तुम्हारे लिए रिश्ता देख रहे हैं, लेकिन इस बार हमारी शर्त नहीं, तुम्हारी राय ज़्यादा अहम होगी। बस इतना याद रखना — रिश्ते दो लोगों के नहीं, दो परिवारों के होते हैं। ससुराल वालों के साथ रहोगी तो कुछ सीखने को मिलेगा, कुछ देने को भी।”
साक्षी मुस्कुराई और बोली —
“पापा, मैं समझ गई। आपने हमेशा मुझे सुरक्षित रखना चाहा, लेकिन अब मैं रिश्ते निभाने की जिम्मेदारी लेना चाहती हूँ।”
रामेश्वर बाबू की आँखों में गर्व और शांति दोनों थे।
उन्होंने पहली बार महसूस किया कि सच बोलने वाले बुज़ुर्ग, जो कभी कड़वे लगते हैं, वही हमें जीवन की सबसे मीठी सीख देकर जाते हैं।
अब जब भी सुबह वो पार्क जाते, तो हरिप्रसाद जी को ढूँढते — ताकि उन्हें धन्यवाद कह सकें।
क्योंकि उस एक सुबह की बातचीत ने उनके सोचने का नजरिया ही बदल दिया था।
0 टिप्पणियाँ