पागलपन

 “क्या कह रही हो नेहा बहू, दिमाग़ ठीक है न तुम्हारा?”

सावित्री देवी की आवाज़ पूरे घर में गूंज गई। वह सोफे से उठते हुए घबराई नज़र से बहू को देखने लगीं।

नेहा, जिसका चेहरा आँसुओं से भीगा था, काँपती आवाज़ में बोली —
“मैं सच कह रही हूँ, मम्मी जी… अभी-अभी आर्या से बात हो रही थी, तभी वो ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगी और उसके बाद फोन गिरने की आवाज़ आई… फिर कुछ नहीं। बस मिट्टी और घास की आवाज़ें आ रही थीं… फिर फोन कट गया। लगता है आर्या और विवेक किसी जंगली जानवर के चपेट में आ गए।”

ये सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा छा गया।
सावित्री देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उनके बड़े बेटे विवेक और बहू आर्या सुबह राखी बंधवाने आर्या के मायके गए थे, और अब ये खबर — कि वो किसी जंगल में गायब हो गए हैं!

सावित्री देवी काँपते हुए बोलीं, “कब की बात है ये?”
“मम्मी जी, अभी आधे घंटे पहले की। मैं बस वीडियो कॉल पर आर्या से बात कर रही थी। उसने कहा कि ‘देखो नेहा, ये जगह कितनी खूबसूरत है, फोटो भेजती हूँ’ — और फिर वो चिल्लाने लगी। उसके बाद फोन कट गया।”

अब घर में अफरातफरी मच गई।
छोटे बेटे मोहित ने तुरंत विवेक को फोन लगाया — “नंबर नॉट रीचेबल।”
फिर आर्या को फोन किया — “स्विच्ड ऑफ।”

सावित्री देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
“हे भगवान, मेरे बच्चों को कुछ हो गया तो…”

नेहा भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी — “मम्मी जी, मैंने ही उसे कहा था कि फोटो भेजो। अगर मैंने नहीं कहा होता तो शायद वो गाड़ी से नीचे न उतरती।”

पूरा परिवार बेचैन था।
रात के करीब ग्यारह बज चुके थे। सबकी आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं।
हर छोटी सी आहट पर सबकी साँसें थम जातीं।

तभी अचानक दरवाज़े की घंटी बजी — “ट्रिन… ट्रिन…”
सावित्री देवी का दिल जैसे उछल गया।
मोहित भागकर दरवाज़े की ओर गया, और दरवाज़ा खोला तो सामने जो दृश्य था, देखकर सब स्तब्ध रह गए।

विवेक और आर्या दरवाज़े पर खड़े थे — दोनों के सिर पर पट्टी बँधी थी, कपड़ों पर मिट्टी और कीचड़ लगा था, चेहरों पर थकान और डर के निशान थे।

“अरे भगवान!” सावित्री देवी भागकर आगे बढ़ीं,
“क्या हाल बना लिया तुम लोगों ने! क्या हुआ?”

विवेक ने आर्या को सहारा देते हुए अंदर बैठाया और बोला —
“माँ, आज अगर भगवान की दया न होती तो शायद हम दोनों जिंदा नहीं होते।”

आर्या सिर झुकाकर बैठ गई, चेहरा अपराध-बोध से भरा था।

विवेक ने गुस्से से उसकी तरफ देखा और बोला —
“और सब कुछ किस वजह से हुआ? ‘फोटो खिंचवाने के शौक़’ के चक्कर में। मैंने मना किया था माँ, पर ये मानती कहाँ है।”

“माफ़ कर दो विवेक, अब ऐसा कभी नहीं होगा,” आर्या ने आँसू पोंछते हुए कहा।

सावित्री देवी और बाकी सब हैरान थे — आखिर ऐसा हुआ क्या था?


विवेक ने धीरे-धीरे पूरी कहानी सुनाना शुरू किया —

“सुबह जब राखी बंधवाने के लिए आर्या के घर गए थे, तो वापसी में शाम हो गई थी। बारिश की वजह से सड़क फिसलन भरी थी। रास्ते में जंगल का एक छोटा रास्ता पड़ता है — वहाँ से शॉर्टकट निकलता है। मैंने सोचा, थोड़ा जल्दी घर पहुँच जाएँगे।

रास्ते में आर्या ने कहा, ‘विवेक, ज़रा गाड़ी रोकना, इस जंगल में कितनी खूबसूरत हरियाली है, एक फोटो खिंचवा लूँ।’

मैंने मना किया — ‘आर्या, ये जगह सुरक्षित नहीं है, बारिश के कारण रास्ते फिसलन भरे हैं।’
पर उसने कहा — ‘बस दो मिनट लगेंगे, तुम ऐसे ही डरते रहते हो।’

मैं गाड़ी रोकने के लिए मजबूर हो गया।

वो कैमरा लेकर उतर गई। मैं भी उसके पीछे गया, लेकिन कुछ दूर जाते ही उसने कहा —
‘ज़रा पीछे जाओ न विवेक, पूरा बैकग्राउंड आए फोटो में।’

मैंने जैसे ही कदम पीछे किया, उसने पैर बढ़ाया और अचानक झाड़ी में पैर उलझ गया। वो गिरने लगी। मैं दौड़ा, उसे संभालने की कोशिश की, लेकिन हम दोनों नीचे कीचड़ भरे ढलान में लुढ़क गए।

पास ही एक पत्थर पर मेरा सिर लगा और खून बहने लगा।
आर्या का फोन दूर जा गिरा — शायद टूट भी गया। वो वहीं बेहोश हो गई।

मैं किसी तरह उठकर उसके पास पहुँचा, पानी के छींटे मारकर होश में लाया।
उस वक्त शाम के करीब साढ़े सात बज चुके थे, और अंधेरा छा गया था।

जंगल के बीचोंबीच नेटवर्क गायब था।
बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
किसी तरह टॉर्च जलाकर रास्ता ढूँढने की कोशिश की, पर झाड़-झंखाड़ में रास्ता ही नहीं मिल रहा था।

करीब तीन घंटे तक भटकते रहे।
फिर दूर से एक ट्रक की लाइट दिखी।
हम आवाज़ देते हुए उसी दिशा में बढ़े।
ड्राइवर ने हमें देखा और रुक गया — उसने हमें पास के गाँव तक छोड़ा, जहाँ एक छोटे अस्पताल में पट्टी करवाई और वहीं से तुम्हें फोन करने की कोशिश की। पर नेटवर्क नहीं मिला।”

विवेक बोलते-बोलते रुका।
“माँ, आज अगर हम पाँच मिनट और वहाँ रहते, तो शायद ज़िंदा नहीं बचते। वहाँ पास ही एक गड्ढा था, जिसमें पानी भर गया था… एक कदम और बढ़ाते, तो शायद वहीं डूब जाते।”

सावित्री देवी की आँखें भर आईं।
वो आर्या के सिर पर हाथ रखते हुए बोलीं —
“बेटी, मैं जानती हूँ तुम्हें फोटो खींचने का शौक है, पर ज़िंदगी किसी शौक से बड़ी होती है।”

आर्या सिर झुकाए बोली —
“माफ़ कर दीजिए मम्मी जी… ये सब मेरी गलती थी। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि फोटो खिंचवाने के लिए की गई ज़िद हमें मौत के मुँह तक ले जाएगी। आज के बाद मैं कभी किसी शौक़ के लिए जान को खतरे में नहीं डालूँगी।”

नेहा भी रोते हुए बोली —
“माफ़ करना दीदी, मैंने ही कहा था फोटो भेजो। अब से मैं भी ऐसी बात नहीं कहूँगी।”

सावित्री देवी ने दोनों बहुओं को गले लगा लिया।
“ठीक है, गलती सब से होती है, लेकिन जो गलती से सीख ले, वही समझदार होता है।”

विवेक ने कहा —
“माँ, अब हम सबके लिए सबक है ये — ज़िंदगी की छोटी-छोटी खुशी अगर जान को खतरे में डाल दे, तो वो खुशी नहीं, मूर्खता है।”

आर्या ने सिर झुका लिया, और धीरे से बोली —
“माँ, अब से मैं अपनी हर फोटो घर की छत पर ही खिंचवाऊँगी।”

सब ज़ोर से हँस पड़े, और घर का सन्नाटा खत्म हो गया।


अगली सुबह जब सूरज की रोशनी आँगन में फैली, तो सावित्री देवी ने भगवान के आगे दीपक जलाते हुए कहा —
“भगवान, शुक्र है तूने मेरे बच्चों को सही-सलामत लौटा दिया।”

और आर्या रसोई में जाकर सबके लिए चाय बना रही थी।
आज उसके चेहरे पर शिकन नहीं, बल्कि एक नई समझदारी की चमक थी।

विवेक पास आया और बोला —
“फोटो तो खिंचवा सकती हो अब।”

आर्या मुस्कुराई —
“हाँ, पर अब सिर्फ तुम्हारे साथ, और सिर्फ घर में।”

विवेक ने कहा — “बस, यही तो समझदारी है।”

और पूरे घर में हँसी की गूंज फैल गई।

उस दिन के बाद से आर्या ने कैमरा तो छोड़ा नहीं,
पर उसने एक चीज़ ज़रूर सीख ली —
“शौक अगर जान से बढ़ जाए, तो वो शौक नहीं, पागलपन है।”


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