बैसाखी

 "देखिये अनंत मैं घुमा कर बात नहीं करती। मुझे इसमें कोई एतराज नहीं कि आप मुझसे नौ साल बड़े हैं। आपके एक पैर में पोलियो का असर है, बावजूद इसके मैं आपकी सरकारी नौकरी के कारण, इस रिश्ते के लिए हां कर रही हूँ मगर!"

मीरा की इन बातों से मैं परेशान नहीं हुआ। मुझे ऐसी बातें सुनने की आदत थी।

"जी शुक्रिया! आप कुछ कह रही थीं"

"हां यही कि मैं आज के ख़यालात की लड़की हूँ। छोटे और शिक्षित परिवार में पली बढ़ी हूँ। गवार लोग मुझे पसंद नहीं, नाहीं मैं अपने लाइफ में किसी की दखलंदाजी पसंद करती हूँ"

मीरा मेरी कमियों का पूरा फायदा उठा अपनी मर्जी रिश्ते से पहले ही थोप देना चाहती थी।

"जी मैं कुछ समझा नहीं"

"यही कि शादी के बाद मैं आपके साथ आपके माँ बाप का बोझ नहीं उठा सकती,"

उसकी इस बात से उस माँ बाप का चेहरा आँखों में नाच गया जिसने मुझे छतीस साल तक कभी बोझ नहीं समझा।

"मीरा जी मुझे आपके बैसाखी की जरूरत नहीं। मैं लंगड़ा हूँ  मगर उतना भी अपाहिज नहीं कि खुद के माँ बाप को हीं अपाहिज कर दूं।"

उसने अपनी आंखों से, मुझपर लानत का बोझ डालना चाहा,मगर मैंने अपना बोझ, अपनी बैसाखी पर डाल, अपने माँ बाप की तरफ बढ़ गया..!

विनय कुमार मिश्रा।


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