आज दिन में उतनी कमाई नहीं हुई। उम्मीद है रात में कुछ सवारियां मिल जायें। यही सोच बाहर से आने वाली बस स्टैंड के ब्रिज के नीचे रिक्शा लगा उनका इन्तेजार कर रहा था। रात में अक्सर नहीं चलाता पर कल पैसों की बहुत जरूरत है। देखा दो जवान लड़कें कुछ सामान के साथ बस से उतर इधर ही आ रहे हैं।
"मिलिट्री कैम्प एरिया चलोगे"
"हाँ जाएंगे, डेढ़ सौ लगेंगे"
"बहुत ज्यादा बता रहे हो, शायद पास में ही है यहाँ से"
"जी पांच किलोमीटर चढ़ाई का रास्ता है। रात भी है, बहुत मेहनत लगता है" उन्होंने कुछ देर इधर उधर देखा शायद ऑटो रिक्शा देख रहे हों, पर ब्रिज के नीचे ऑटो वाले नहीं लगाते। फिर दोनों मेरे रिक्शे पर बैठ गए। कुछ ही दूर चला था कि उनके सामान और चढ़ाई के कारण मेरी हालत खराब हो रही थी, सुबह से आज कुछ खाया भी नहीं था ठीक से
"क्या हुआ काका.. रिक्शा खराब है क्या?"
मैं बिलकुल पस्त हो रहा था।
"आज पता नहीं क्या हुआ है रिक्शा ही नहीं खींच पा रहा हूँ"
उनमें से एक उतर गया।
"आप नीचे उतरो.. मैं देखता हूँ" उसने मेरी बाँह पकड़ कर अपनी सीट पर बिठा दिया
"रिक्शा वो खुद चलाता हुआ कैम्प एरिया में आ गया। आज का दिन ही खराब है, अब कमाई की कोई उम्मीद भी नहीं। वो दोनों नीचे उतर अपना सामान भी उतार लिए मैं जाने लगा
"काका रुकिए!" उन्होंने दो सौ रुपये दिए।
"आपको शायद बुखार भी है.. दवा भी ले लेना आप"
"पर मैंने तो मेहनत भी नहीं किया..ये मैं कैसे रख लूँ बेटा"
"क्या काका! बेटा भी बोलते हो और..! रख लो आप"
वो दोनों जवान अपने कैम्प की ओर बढ़ रहे थे और मेरा कांपता हुआ हाथ तन कर दाहिने तरफ के माथे पर जा चुका। बरबस ही उन्हें देख निकल पड़ा.. जय हिंद
विनय कुमार मिश्रा
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