मंत्रोच्चारण के बीच दिल बैठा जा रहा है। एक ओर खुशी है छोटी बेटी शादी कर अपने घर चली जायेगी। और एक ओर विदाई के बाद मैं बिल्कुल अकेली हो जाऊँगी। बड़ी बेटी और दामाद भी आज ही चले जायेंगे। नाती की परीक्षा है। बड़ी मुश्किल से वक़्त निकाल पाए हैं। दामाद जी तो आ भी नहीं रहे थे, वो तो मैं बड़ी मुश्किल से मना पाई। झूठ नहीं बोलूंगी, जिंदगी के इस पड़ाव पर एक बेटे की कमी खलती है मुझे। इनके जाने के बाद बड़ी बेटी से थोड़ी उमीदें थी पर वो अपनी गृहस्थी में उलझ गई है और दामाद जी भी थोड़े..।
विवाह संपन्न होने के बाद सब अलग तैयारी में है और बड़ी बेटी और दामाद जाने की
"विदाई के बाद निकलते तुमलोग!" मैंने सकुचाते हुए कहा
"नहीं माँ दो घन्टे बाद की ही ट्रेन है, बड़ी मुश्किल से टिकट मिला है" मैं आगे कुछ कह ना पाई। सारे लोग जा चुके हैं। मैं अकेली खड़ी अपने आँसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थी, कि तभी एक कार वापस आकर रुक गई, जिसमें छोटी बेटी और दामाद थे, दिल धक से कर के रह गया
"क्या हुआ..?" मैंने घबराते हुए दामाद जी से पूछा
"कुछ नहीं मम्मी जी, आप भी हमारे साथ चल रही हैं"
मैं आश्चर्य से बिटिया की तरफ देखने लगी
"हाँ माँ! सुमित सही कह रहे हैं, आपको यहां अकेले छोड़ कर हमारा मन नहीं लगेगा"
"पर दामाद जी! लोग क्या कहेंगे..?"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ मुस्कुराते हुए कहा
"यही कि.. एक माँ अपने बच्चों के साथ रह रही है"
आज एक बेटे की माँ बनकर मैं अपने आंसू ना रोक सकी..!
विनय कुमार मिश्रा
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