सभी दोस्त अपने हिसाब से खाना ऑर्डर कर रहे थे और मेरा हाथ बार बार अपने रखे पैसे की तरफ जा रहा था सिर्फ आठ सौ रुपये! आज मेरी बारी थी वो भी पहली बार। सभी दोस्त गाहे बगाहे पार्टी देते हैं। आज मेरे बहुत अच्छे मार्क्स आये तो इन्हें बहाना मिल गया। मैं बहाना बना नहीं पाई। ये नहीं जानते कि एक ही कॉलेज में पढ़ने वाले सभी की माली हालत एक सी नहीं होती। जैसे जैसे टेबल पर ऑर्डर बढ़ते जा रहे थे मेरा मन और आठ सौ रुपये छोटे होते जा रहे थे ।
"स्मृति! अब एक एक आइसक्रीम हो जाये" वीरू ने हम सातों के लिए आइसक्रीम का ऑर्डर भी दे दिया। आज सबके सामने शर्मिंदा होने की मेरी बारी नज़दीक थी। बैरा लगभग सत्ताईस सौ का बिल टेबल पर रख चला गया।
इस बीच मैं आठ सौ को कितनी बार टटोल चुकी थी। माथे पर परेशानी के कुछ पसीने भी थे। तभी वीरू ने मुझे गौर से देखा और अपने पॉकेट से पैसे निकाल बिल के साथ टेबल पर रख दिया।
"वीरू ये क्या है.. आज स्मृति की बारी है ना?" मेरी एक सहेली ने उसे टोका
"हाँ पार्टी तो स्मृति की ही है, बस बिल मैं दे रहा हूँ"
"तुम क्यूँ दे रहे हो.."
"मेरी कोई बहन नहीं है ना. स्मृति को अपनी बहन मानता हूँ.. इसलिए ये पैसे आज मैं ही दूंगा"
मैं वीरू को देख रही थी, कि कैसे इसने समझ लिया कि आज मैं बिल देने में असमर्थ हूँ"
"क्या देख रही है.. बस इस बार राखी में मेरी कलाई सुनी नहीं रहनी चाहिए.."
ये सुनकर मेरी आँखें नम हो आईं
"जबतक मैं हूँ भाई.. तुम्हारी कलाई कभी सुनी नहीं होगी"
मैंने भाई की कलाई पर अपने प्यार का धागा बांध दिया.. हमेशा के लिए..!
विनय कुमार मिश्रा
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