कोर्ट में विवाह पंजिका पर हस्ताक्षर करने के बाद शिव शंकर सिंह वहीं बेंच पर बैठ गए। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। अपने जीवन में उन्होंने समय की ऐसी करवट की कभी कल्पना नहीं की थी।
सभी लोग गाड़ी में बैठ कर घर वापसी करने लगे। शिव शंकर सिंह ने अपना सिर पीछे सीट में टिका कर अपनी आँखें बंद कर ली और विचारमग्न हो गए।
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फैजाबाद जिले से इलेक्ट्रिशियन ट्रेड में आईटीआई करने के बाद शिव शंकर सिंह लखनऊ आ गए थे। यहॉं पर एक रिश्तेदार के पास रहते हुए मकान बनाने वाले एक ठेकेदार के साथ काम करने लगे। कुछ दिनों के बाद किसी ने बताया कि बिजली विभाग में भर्ती हो रही है तो वह जाकर भर्ती की लाइन में खड़े हो गए। नंबर आने पर उनके कागजात जाँचे परखे गए और एक साल की अप्रेंटिसशिप के लिए इलेक्ट्रीशियन पद पर उन्हें नियुक्त कर लिया गया।
कुछ महीनों के बाद उन्होंने स्वयं किराये पर कमरा ले लिया और अलग रहने लग गए। साल बीतते ही वह परमानेंट हो गए थे। अगले एक साल बाद ही उनका विवाह मालती से हो गया। पत्नी को अपने साथ ले आए लखनऊ में ही।
बड़े आराम से दिन गुजर रहे थे। धीरे धीरे वे तीन बच्चों के पिता बन गए। पहला संजय, उससे 2 साल छोटी मोनिका और सबसे छोटा राहुल।
जिस तरह से शिव शंकर सिंह को अपनी रिश्तेदारी में सहायता मिली थी उसी प्रकार वे भी दिलदार थे। वे अपने रिश्तेदारों की जैसे भी हो जितनी भी हो सहायता करते रहते थे। गाँव में घर परिवार के सदस्यों को भी जब जैसी जरूरत होती थी वे निःसंकोच पैसे उपलब्ध करा देते थे।
बच्चे बड़े हो रहे थे। किराये के नन्हे से कमरे में व्यवस्था नहीं बन पा रही थी। थोड़ी सी बचत और थोड़ा सा लोन आदि लेकर उन्होंने दुबग्गा के अविकसित क्षेत्र में एक प्लाट ले लिया और अगले एक-दो साल में वहॉं रहने योग्य मकान बनाकर तैयार कर लिया। जिस दिन उन्होंने "मालती भवन" में गृहप्रवेश किया था उस दिन एक बड़ी पार्टी का आयोजन भी किया था।
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संजय अब शादी के योग्य हो चला था। वह एक नामी बिस्कुट कम्पनी में मार्केटिंग का कार्य देखता था। समय पर उसका विवाह संजना से हो गया। अगले चार सालों में संजय और संजना दो सन्तानों के मातापिता बन गए। बड़ी बेटी नीलांजना 2 वर्ष की और बेटा स्पर्श दो माह का है।
शिव शंकर सिंह अब लाइनमैन के पद पर पहुँच चुके थे। अब उनके रिटायरमेंट के कुछ ही साल शेष बचे थे। वे मोनिका के विवाह के लिए बहुत अधिक चिंतित दिख रहे थे। चाहते थे कि उनकी रिटायरमेंट से पहले ही वे बिटिया के हाथ पीले कर के उसे राजीखुशी अपनी ससुराल भेज दें।
तभी एक पारिवारिक आघात लगा। शिव शंकर सिंह को पक्षाघात हो गया। परिवार पर बड़ी विपत्ति आ पड़ी लेकिन संजय व राहुल ने अच्छे से इलाज और सेवा की और अपने पिताजी को फिर से खड़ा कर दिया। दाहिने हाथ व दाहिने पैर में अभी असर है किंतु अब वे अपने आप चल फिर सकते थे। ड्यूटी जाने लगे थे किंतु विभागीय अधिकारियों द्वारा अब उन्हें फील्ड में भेजने के बजाय दफ्तर में और गोदाम में काम दे दिए जाते थे।
बिटिया की शादी के लिए वह फिर से हाथ पैर मारने लगे। इस बार उनकी खोज रंग लाई और कानपुर में एक लड़का पसंद आया। चार भाइयों का सम्पन्न ऑरिवार था। सभी भाई किसी न किसी (सरकारी/प्रायवेट) नौकरी में लगे हुए थे। पिता रविंदर सिंह एक सरकारी ठेकेदार थे। बहुत जल्द दोनों परिवारो में रिश्ता बना और मोनिका का विवाह विश्वजीत सिंह से हो गया।
शिव शंकर सिंह अब पेंशन आ गए थे। बड़े बेटे संजय ने अपने कारोबार को बढ़ा लिया है। नौकरी तो वह पहले ही छोड़ चुका था। अब वह स्वयं कई कम्पनियों का डिस्ट्रीब्यूटर है और ड्राइवर की सहायता से कंपनियों का माल अपनी गाड़ी में लेकर शहर व आसपास के जिलों में भी सप्लाई देने लगा था। शिव शंकर सिंह अब अपनी अंतिम जिम्मेदारी राहुल की शादी के लिए लड़की देख रहे थे। आखिरकार इलाहाबाद में राहुल का विवाह संपन्न हो गया।
हनीमून के लिए राहुल और रिचा बेंगलुरु और कोचीन गए। वहॉं पर राहुल को रिचा का व्यवहार तनिक असामान्य सा दिखा। वह प्रायः राहुल को कमतर बताती रहती। उसके व्यक्तित्व में कमी, उसके पहनावे में कमी, उसके चलने में कमी, उसके बोलने में कमी और न जाने क्या क्या।
10 दिनों की यात्रा उनकी निरर्थक रही। इस यात्रा में प्रेम कहीं था ही नहीं। थी तो बस रिचा की चख चख, कमियां और परेशानियां। अंतिम दिन तो उसने यह भी कहा कि 'राहुल तुम अपनी मम्मी से मेरे गहनों वाला डिब्बा मुझे दिला दो। मुझे अच्छा नहीं लगता कि मेरा सामान किसी और के पास रहे।' राहुल ने कहा ठीक है लखनऊ चलकर उसे वह डिब्बा मिल जाएगा।
रिचा अपने मायके गयी और फिर राहुल में ढेरों कमियाँ और उसे नापसन्द बताकर वापस नहीं लौटी। उसकी माँ एक बड़ी अफसर थी अतः शिव शंकर सिंह ने झगड़ा झंझट बढ़ाने के बजाय राहुल के सेपरेशन का मुकदमा लगा दिया।
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कुछ साल बाद...
जनवरी की एक सर्द रात में जब देर रात तक नज़दीक गोदाम से संजय नहीं लौटा तो राहुल वहॉं देखने गया। गोदाम के दरवाजे उढ़के हुए थे और अंदर संजय सीढ़ियों पर बेसुध पड़ा था। उसके माथे पर गहरा निशान था और खून से उसकी जैकेट व पेंट सने हुए थे।
डॉक्टर ने जाँच के बाद मृत घोषित कर दिया। यह शिव शंकर सिंह के परिवार के लिये विशाल वज्राघात था। वही अर्निंग मेम्बर था।
संजना, बारह वर्षीय नीलांजना, दस साल का स्पर्श, राहुल, मम्मी मालती, मोनिका, विश्वजीत व अन्य पारिवारिक सदस्य किंकर्तव्यविमूढ़ और चित्रलिखित से हो गए थे। सर्वाधिक खराब स्थिति शिव शंकर सिंह की थी। उनका युवा बेटा..... जैसे दायीं बाँह ही कट गयी हो। निरन्तर बहती आँसुओं की धार उनकी छाती गीली किये जा रही थी। एक तो पक्षाघात, दूसरे मधुमेह और अब यह पहाड़ सा दुःख!
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दो वर्ष बाद..
कोरोना महामारी ने उनकी बिटिया मोनिका को निगल लिया तो शिव शंकर सिंह जैसे टूट से गये।
विश्वजीत अपनी 5 वर्षीय बेटी मुग्धा को सीने से चिपटाये दूर खड़ा था और धू धू कर जल रही मोनिका की चिता को एकटक देखे जा रहा था।
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एक दिन मालती शाम को शिव शंकर सिंह के पैरों में मालिश कर रही थी तब कहा, "क्यों जी, क्या हम एक काम कर सकते हैं?"
"मैं स्वयं कई दिनों से वही सोच रहा हूँ मालती। एक बार विश्वजीत के परिवार से बात करनी पड़ेगी।"
"तो फिर सोच किस बात की। गाड़ी में बैठो और डेढ़ घण्टे में कानपुर।"
"मालती, यह बात शान्ति पूर्वक एकांत में करनी है। मैं विश्वजीत के पापा को यहीं बुला लेता हूँ। "
"रविंदर सिंह जी आ जायेंगे?"
"मेरे कहने पर तुरन्त हाज़िर हो जाएंगे। वे विशाल हृदय और सामाजिक आदमी हैं।लाओ मेरा फोन दो।"
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संजना, विश्वजीत, शिव शंकर सिंह, रविंदर सिंह आमने सामने बैठे हैं। मालती और राहुल दूसरे सोफे पर बैठे थे। रविंदर सिंह ने कहना आरम्भ किया - विश्वजीत और संजना, ध्यान से सुनो। यह फैसला हम और शिव शंकर भाई ले जरूर रहे हैं लेकिन इसमें तुम दोनों की सहमति अवश्य चाहिए हमे। तुम दोनों का विवाह दोनों परिवारों के लिए परम् आवश्यक है। मेरी इच्छा तो संजना और राहुल के विवाह की थी किन्तु दोनों ही मना कर रहे हैं। दोनों के अपने अपने दृष्टिकोण और मान्यताएँ हैं। ईश्वर ने न जाने क्यों ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर दिया है जहाँ पर इस घर के बच्चों के भविष्य के लिए हमे यही एक विकल्प सर्वथा योग्य और उचित जान पड़ता है।"
"पापा, मुझे मुग्धा के लिए कुछ करना पड़े तो अवश्य करूँगा और यदि यही विकल्प सामने है तो मुझे कोई इनकार नहीं है।" विश्वजीत ने सिर झुकाए हुए कहा।
"संजना बेटे! तुम बताओ, तुम क्या सोच रही हो?" शिव शंकर सिंह ने कहा।
"पापा, आप लोग जो भी निर्णय करेंगे वह परिवार के लिए अच्छा ही होगा। मैं परिवार से बाहर तो नहीं हूँ।" सिसकते हुए संजना बोली।
"ठीक है। शिव शंकर सिंह जी, अब तनिक तीनों बच्चों को भी बुला लो। नीलांजना समझदार है। उसके कानों तक यह निर्णय अवश्य पहुँचना चाहिए और उसकी प्रतिक्रिया भी जाननी आवश्यक है।"
दूसरे कमरे में खेल रहे नीलांजना, स्पर्श और मुग्धा बुलाये गए। तीनों कभी एक दूसरे को तो कभी वहाँ पर बैठे पारिवारिक सदस्यों को देख रहे थे। नीलांजना और स्पर्श संजना के आजूबाजू में बैठ गए जबकि मुग्धा विश्वजीत की गोद में।
"नीलांजना, बेटे हम लोग तुम्हारी मम्मी का विवाह मुग्धा के पापा के साथ कराने जा रहे हैं। तुम्हें अपने फूफा जी को पापा कहने की विवशता नहीं है। तुम और स्पर्श पहले की तरह ही इन्हें फूफा कहते रह सकते हो और मुग्धा तुम्हारी मम्मी को मामी कहती रह सकेगी। रिश्ता सिर्फ तुम्हारी मम्मी और मुग्धा के पापा के बीच बदलेगा। राहुल भी पहले की तरह संजना को भाभी और विश्वजीत को जीजा जी कहता रहे या भइया, कोई इस्यु नहीं। मालती भाभी और शिव शंकर सिंह जी की बहू उनके ही पास रहेगी जबकि उनका दामाद अब बेटे की तरह उनकी सेवा करेगा। मेरे तीन और बेटे हैं सेवा करने के लिए।" रविंदर सिंह ने कहकर मामले के सभी पक्ष स्पष्ट कर दिये।
अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते और अपनी गीली आँखों को पोछते हुए मालती औऱ शिवशंकर सिंह उठकर रविंदर सिंह के चरण स्पर्श करने लगे किन्तु रविंदर सिंह ने ऐसा करने से रोक दिया और पास ही बिठा लिया और बोले,"विश्वजीत, तुम एक दो दिन यहीं रुक कर कोर्ट मैरिज के लिए आवेदनपत्र प्रस्तुत कर दो ताकि शीघ्रतिशीघ्र विवाह पंजीकृत हो जाय औऱ तुम्हारा और संजना के नवजीवन का शुभारंभ हो सके।"
विश्वजीत ने सहमति में सिर हिलाया और उठ कर पापा व सास-ससुर के पैर छू लिए। तभी संजना भी सचेत हुई और सिर और दुपट्टा ठीक करते हुए सामने आयी औऱ तीनों वरिष्ठ पारिवारिक सदस्यों के पैर छू लिए।
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"पापा, घर आ गया। चलिए उतरिये।" शिव शंकर सिंह का कन्धा पकड़ कर हिलाते हुए विश्वजीत ने कहा तो उनकी तन्द्रा टूटी। कार से बाहर निकल कर उन्होंने मालती निवास को देखा जो बिजली की झालरों से जगमगा रहा था।
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