आईना

 आज सुबह से ही धूप कितनी तेज थी. दो घण्टे में ही रस्सी पर डले सारे कपड़े सुख गए थे.अमोली एक एक कपड़े उतार कर कंधे पर डालती जा रही थी.दोपहर के दो बज बज रहे थे.अभी तो अमोली को सारे घर मे पोछा लगाना था.फिर रसोई तैयार करनी थी और अंत मे खुद तैयार होना था.लड़के वाले आ रहे थे आज शाम उसे देखने. पांच बजे का समय दिया था उनलोगों ने.

उनके लिए नास्ता तो बाज़ार से ले आया था आनन्द.पर रात के खाने का इंतजाम घर पर ही करना था.

अमोली और आनन्द दोनो जुड़वा पैदा हुए थे. दोनो जिस दिन प्लस टू का आखिरी पर्चा देकर घर आये थे उसी रात बाबुजी को तेज दौरा पड़ा था दिल का. दोनो ने हर सम्भव कोशिश की थी.शहर के बड़े अस्पताल में क़ई दिनों तक इलाज चला था.सारे प्रयासों के बावजूद बाबुजी नही रहे बस इलाज का भारी भरकम कर्ज दोनो भाई बहन पर रह गया था.

आनन्द ने बाबुजी की स्टेशनरी शॉप को संभाल लिया था और अमोली ने घर के पास के एक निजी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था.स्कूल में तनख्वाह तो ज्यादा नही थी पर इसी बहाने घर पर आकर ट्यूशन लेने वाले बच्चे मिल जाते थे.

स्कूल, ट्यूशन और सुबह से रात तक का घर का सारा काम करते करते अमोली बुरी तरह थक जाती थी.खुद को आईने में देखने भर का समय कहाँ मिलता था उसे.बचपन मे जिस अमोली को फैशन की दुनिया से बेहद प्यार था उस अमोली ने जैसे सौंदर्य शास्त्र को तिलांजलि दे दी थी.

रसोई बनाकर अमोली ने जल्दी से पोछा लगाया और नहा धोकर तैयार होने चली गयी थीं.

नहाकर उसने कपड़े तो पहन लिए थे पर लड़के वालों के सामने जाने के हिसाब से सजना सँवरना उसे कहाँ आता था भला.न कोई सहेली और न करीबी रिश्तेदार में उसके उम्र की कोई लड़की.

ऐसे अवसर पर किस तरह साड़ी पहनी जाती थी,कैसे बालों को सँवारा जाता था.गालों में या फिर आंखों में क्या लगाना है?सबकुछ अमोली के लिए एक पहेली सा बन गया था.

अपने हिसाब से तैयार होकर आखिर अमोली लड़के वालों के सामने जाकर बैठ गयी थी.

लड़के की मां और छोटी बहन ने जैसे ही अमोली को देखा तो पहले तो उन्हें बेहद अटपटा लगा था.आखिर किस जमाने की लड़की है ये? आजकल तो इतने सारे मेकअप करती है लड़किया.एक से बढ़कर एक तरीके से खुद को तैयार करती है.

अमोली से थोड़ी बहुत बाते सबलोग करने लगे थे. अमोली की मां चुपचाप बैठी ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि सबकुछ ठीक से हो जाये.

"बेटा तुमने काफी हल्का मेकअप किया है.जबकि आजकल तो तुम्हारी उम्र की लड़कियां पार्लर में जाकर तैयार होने का बहाना खोजती रहती है.ऐसे साधारण से मेकअप की कोई खास वजह?"लड़के की माँ गंगा देवी ने आखिर अमोली से पूछ ही लिया था.

"जी आंटीजी मेकअप तो साधारण है पर इतना भी शायद मैंने पहली बार किया है.मेरे लिए तो इतना भी बहुत ज्यादा है." सामने आए सवाल का सहजता से जवाब देते हुए अमोली मेहमानों को चाय के कप पकड़ाने लगी थी.

अमोली के जवाब से मेहमान एक दूसरे का चेहरा देखने लगे थे.अमोली भांप रही थी कि लड़के की बड़ी बहन उसकी उंगलियों की तरफ बार बार देख रही है और वो इस बारे में  असमंजस में है कि  कुछ पूछे या न पूछे.

"दीदी दरअसल कपड़े धोने और बर्तन मांजने के लिए हमने कोई मेड नही रखी है.यही वजह है कि मेरी उंगलियों में कठोरता उभर आई है."

अमोली की बातों से लड़के वाले कुछ असहज से लग रहे थे.

आनन्द और उसकी मां को समझ मे आने लगा था कि अब ये रिश्ता तो होने से रहा पर अमोली का सबकुछ साफ साफ बता देना उन्हें भी पसन्द आ रहा था.

अमोली उठकर अन्दर जा चुकी थी.सबलोग एकदम चुप थे.सारा माहौल एकदम गम्भीर बना हुआ था.

"बहन जी आपको हमारे फैसले का अंदाजा तो हो गया होगा." गंगा देवी के इन शब्दों के साथ ही जैसे सबकुछ साफ हो गया था.

"पर हम अपना निर्णय आपकीं बिटिया के सामने ही सुनाएंगे." पहली बार लड़के के पिताजी ने कुछ कहा था.

आनन्द भाग कर अमोली के पास जाने को हुआ ही था.

"बेटे जरा ठहरना मैं आती हूँ अमोली को लेकर." लड़के की माताजी गंगा देवी ने आनन्द को रोकते हुए कहा.

अंदर अमोली कमरे में  चुपचाप बैठी आईने में खुद को देख रही थी.

अचानक सभी को अंदर कमरें में देख वो हैरान थी.

"बेटी आईना तो आप हो समाज के लिए.आप जैसी बेटियां ही तो सिखाती है कि परिवार की जिम्मेवारियों को निभाने से बड़ा श्रृंगार कुछ भी नही है."गंगा देवी ने अमोली के दोनो कन्धों पर हाथ रखते हुए कहा था.

"तुम्हारे मम्मी पापा ने तुम्हारा 'अमोली' कितना सही नाम रखा है बेटी तुम्हारा.......

साफगोई ,निडरता और अपने कर्तव्यों के प्रति दृढ़ता के अनमोल गुणों वाली अमोली." लड़के के पिता के शब्दों में भावुकता दिख रही थी.

अमोली मां और आनन्द की तरफ आश्चर्य से  देख रही थी.रजत ने आगे बढ़कर अमोली को विवाह के लिए प्रोपोज़ किया तो हर किसी के चहरे पर बेहिसाब खुशियां थी और आंखों में खुशी के आंसू .

-संजय सहरिया

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