नवरात्रि का प्रथम दिन था, मैं अपनी कक्षा में अपनी बच्चियों को पढ़ा रही थी। पढ़ाने के बाद प्रतिदिन पांच -दस मिनट उनको कोई अच्छी सी कहानी ,नैतिक शिक्षा, प्रेरणा वाली बात जरूर बताती हूं... यह मेरा हर कक्षा में प्रतिदिन का नियम है ।मुझे भी अच्छा लगता है और बच्चियों को भी अच्छा लगता है। हमारी स्कूल में अधिकतर बच्चियां बहुत गरीब परिवारों से हैं। उस दिन मैंने बच्चियों से खड़ा होकर पूछा कि
" तुम्हें क्या चाहिए"?
बालिकाओं का छोटा-सा दिल और छोटी-सी आशाएं थी।
सरिता बोली" मैडम मेरी सहेली रोशनी के पास चप्पल नहीं है, मैं पैसे इकट्ठे कर रही हूं ,जब इकट्ठे हो जाएंगे तब उसे चप्पल दिलाऊंगी"।
नन्ही सी अर्पिता जिसकी मां नहीं है ,वह घर का सारा काम खुद करती है, जब उससे पूछा तो उसने कहा कि "मुझे एक कुकर चाहिए, क्योंकि जब मैं दाल बनाती हूं तो उसे सीझने में बहुत समय लग जाता है"। अंजलि बोली" मैडम मेरे पापा का काम नहीं चल रहा, जब काम चलेगा, तब मैं स्कूल की यूनिफार्म लाऊंगी"।
नन्ही तानिया बोली" मैडम मैंने कभी भी फाइव स्टार चॉकलेट नहीं खाई ,मुझे खाना है"।
बालिकाओं की इन ख्वाहिशों को सुनकर मुझे दुख हुआ, और मैंने सोचा जहां एक तरफ देश के प्रसिद्ध अभिनेता के बेटे प्रतिदिन दस लाख रुपए खर्च करते हैं ..कई गाड़ियां हैं... बंगला है और नैतिकता के अभाव के कारण ड्रग्स का सेवन करने लगे हैं.... और इन प्यारी प्यारी बालिकाओं की छोटी-छोटी ख्वाहिशें भी पूरी नहीं हो रही है। अमीरी और गरीबी की यह खाई क्या पता कब पट पाएगी?
मैंने अपने मन ही मन संकल्प करके उन बच्चियों को अपने साथ लिया ।बाजार स्कूल के पास ही हैं। अर्पिता को कुकर दिलाया ... चार बालिकाओं को यूनिफॉर्म दिलाई..... रोशनी को चप्पल दिलाई ....और सभी बच्चियों के लिए फाइव स्टार चॉकलेट खरीदी...
सभी अपनी जरूरत की चीजें पाकर बहुत खुश हो गई... और मैं बालिकाओं की छोटी सी मदद करके अपने आप को धन्य समझ रही थी .. मुझे लग रहा था, ये कन्याएं साक्षात देवी मां का रूप है और प्रसन्न होकर मुझे आशीर्वाद दे रही है।
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