अपना_घर

 “देखो बहू तुम इस घर को अपना घर और हम दोनों को अपने माता-पिता ही समझो!”

“मम्मी जी आप कितनी अच्छी हो!”

बहू खुश हुई लेकिन सास उसे आगे समझाने लगी..

“जैसे तुम अपने माता-पिता के साथ अपने घर में रहती थी हमारे साथ भी वैसे ही रहो!”

“लेकिन मम्मी जी मैं तो अपने घर में”..

“मैंने कहा ना तुम इसे अपना ही घर समझो! बिल्कुल खुल कर रहो कोई बंधन नहीं,.और तुम मुझे मम्मी जी नहीं सिर्फ मम्मी कहा करो!”

“ठीक है मम्मी!”

“अच्छा सुनो! आज शाम खाने में क्या बना रही हो!”

“जो आपको पसंद हो!”

“छोले भटूरे कैसे रहेंगे!”

“मम्मी आपने तो मेरे मुंह की बात छीन ली! बहुत मन कर रहा है सुबह से ही कुछ चटपटा खाने का!”

“तो चलो झटपट तैयारी कर लो छोले भटूरे बनाने की!”

“नहीं मम्मी आप झटपट तैयार हो जाओ छोले भटूरे खाने बाहर चलते हैं!”

“ऐसे तो बहुत पैसे खर्च हो जाएंगे! छोले भटूरे तो घर पर ही बनने चाहिए।”

“लेकिन मुझे तो शेर-ए-पंजाब के छोले भटूरे बहुत पसंद है! चलिए ना आज बाहर से ही खाकर आते हैं।”

“बहू मैंने कहा ना!.छोले भटूरे घर पर ही बनेंगे और वैसे भी यह तुम्हारा ससुराल है मायका नहीं जहां तुम्हारी मनमानी चलेगी!”

पुष्पा कुमारी “पुष्प”

पुणे (महाराष्ट्र)


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