शकुंतला देवी की जिंदगी हमेशा से परिवार और जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द घूमती रही। पति के साथ का हर लम्हा उसने अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी माना था। लेकिन एक दिन अचानक सब बदल गया—पति का साथ छूटा और बेटे-बहू, पोते के बीच रहते हुए भी वह अपने आपको बहुत अकेला महसूस करने लगीं।
दिन गुजरते गए, घर में सबका अपना-अपना काम था, बच्चे स्कूल-कोचिंग में व्यस्त, बहू नौकरी में और बेटा अक्सर टूर पर रहता। कभी-कभी शकुंतला देवी को लगता कि वह घर में बस एक साया बन कर रह गई हैं—न तो उनके दुख-सुख में कोई शामिल होता, न उनकी खुशियों में। उनकी बातें सुनने वाला कोई नहीं था। बहू सुधा जब-तब उन्हें समझाती—"मम्मी जी, अब आपकी उम्र है, आराम कीजिए, सबकुछ हम देख लेंगे"—पर दिल के भीतर जो खालीपन था, वह भरता ही नहीं।
इसी बीच उनकी कॉलोनी में महिला क्लब की मीटिंग शुरू हुई। बहू ने उत्साह बढ़ाते हुए कहा, "मम्मी जी, क्यों न आप भी क्लब में शामिल हो जाएं, वहां आपकी उम्र की और भी बहुत सी महिलाएं आती हैं, नई दोस्ती हो जाएगी।" संकोच के साथ शकुंतला देवी मीटिंग में गईं, लेकिन पहली बार में ही उन्हें अपनी हमउम्र महिला, सुषमा जी से मुलाकात हो गई। सुषमा जी पिछले पाँच सालों से अकेली थीं, उनका बेटा विदेश में बस गया था और बेटी की शादी के बाद वे बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं।
धीरे-धीरे दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई। वे पार्क में टहलने, मंदिर में जाने, साथ में बाजार तक जाने लगीं। हर छोटी-बड़ी खुशी, पुराने दिनों की बातें, यादें, सब कुछ साझा करने लगीं। शकुंतला देवी के जीवन में जैसे फिर से रंग लौट आए।
एक दिन क्लब की महिलाओं ने हरिद्वार घूमने का प्रोग्राम बनाया। पहले तो शकुंतला देवी झिझक गईं—"अकेली जाऊंगी, क्या सोचेंगे घर वाले, बहू क्या कहेगी?" लेकिन सुषमा जी के उत्साह और बहू सुधा के प्रोत्साहन ने उन्हें हां कहने पर मजबूर कर दिया। घूमने के दौरान, ट्रिप पर मौजूद बाकी महिलाएं भी खुश थीं, लेकिन शकुंतला देवी और सुषमा जी की दोस्ती सबके लिए मिसाल बन गई।
यात्रा से लौटने के बाद, शकुंतला देवी के घर में उत्सव सा माहौल था। पोता-बहू, बेटा सभी ने तस्वीरें देखीं, उनकी कहानियाँ सुनीं। बहू ने धीरे-धीरे महसूस किया कि मां अब खिल उठी हैं, उनकी आंखों में फिर से चमक आ गई है।
कुछ दिनों बाद, शकुंतला देवी को कॉलोनी के लोगों के ताने सुनने पड़े—"इस उम्र में अकेली औरतें घूमने निकली हैं, देखो क्या जमाना आ गया है!" बेटा भी एक दिन माँ से बोला—"माँ, लोग बातें बनाते हैं, थोड़ा संभलकर रहा करो।" शकुंतला देवी मुस्कुराकर बोलीं—"बेटा, मैंने अपनी पूरी जिंदगी तुम्हारे, घर, समाज के लिए जिया, अब थोड़ा सा जीने का हक मुझे भी है। क्या मैंने अपने सपनों और खुशियों के बदले बस दूसरों की बातें ही सुनने के लिए जन्म लिया था?"
बहू सुधा ने माँ का साथ दिया—", माँ की खुशियों से बढ़कर और कुछ नहीं। समाज को समझाने की जरूरत नहीं, बस माँ के चेहरे की मुस्कान बनी रहनी चाहिए।"
समाज की परवाह किए बिना शकुंतला देवी और सुषमा जी ने मिलकर "वरिष्ठ महिला क्लब" शुरू किया, जिसमें कॉलोनी की कई और बुज़ुर्ग महिलाएं भी शामिल होने लगीं। अब उनकी मुलाकातें, यात्राएँ, उत्सव, सांझा भोजन—सब कुछ घर और समाज के लिए नई मिसाल बन गया।
उनके कदमों से धीरे-धीरे और भी महिलाओं को जीने की हिम्मत मिली। शकुंतला देवी अब खुद को अकेला नहीं मानती थीं, उनके जीवन में फिर से दोस्ती, खुशी, आज़ादी और नई उम्मीद के फूल खिल गए थे।
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