श्यामा देवी एक शांत, सुलझी हुई और अनुभवी महिला थीं। पति का देहांत हुए पाँच साल हो चुके थे। अब उनकी उम्र सत्तर के करीब थी। उनके दो बेटे—अमित और सुमित—और दोनों की पत्नियाँ—संध्या और कविता—एक ही घर में रहते थे। बड़ा बेटा अमित बैंक में मैनेजर था, और छोटा बेटा सुमित अपने छोटे बिज़नेस में व्यस्त रहता था।
घर के कामकाज में दोनों बहुएँ बराबर हिस्सा लेती थीं, लेकिन मन-मुटाव अक्सर हो जाता था—कभी रसोई की सफाई पर, तो कभी बच्चों की पढ़ाई पर। श्यामा देवी को ये सब अच्छा नहीं लगता था। उन्हें डर था कि उनके जाने के बाद बेटों और बहुओं में बंटवारे को लेकर बड़ी लड़ाई न हो जाए।
श्यामा देवी जानती थीं कि उनके पास अच्छे-खासे गहने, कुछ नकदी, और दो बीघे खेत हैं। वह चाहती थीं कि सब बराबर बँट जाए, लेकिन इस तरह कि उनके जीते-जी घर में कलह न हो और अंत समय तक दोनों बेटे-बहू उनकी सेवा करते रहें।
एक दिन उन्होंने अपने कमरे में संध्या को बुलाया और अलमारी से एक सुंदर चूड़ी का जोड़ा निकालकर दिया,
"ये चूड़ियाँ तेरे लिए हैं। लेकिन कविता को मत बताना, उसे लगेगा मैं उससे कम प्यार करती हूँ।"
संध्या को लगा कि सास उसे ज्यादा मानती हैं। वह खुशी-खुशी चूड़ियाँ रख आई और सास के प्रति और भी आदर दिखाने लगी।
कुछ दिन बाद कविता को अपने कमरे में बुलाकर श्यामा देवी ने वैसी ही चूड़ियों का एक और जोड़ा दिया और कहा,
"ये बस तेरे लिए हैं, संध्या को मत बताना।"
कविता भी मन ही मन खुश हुई और उसने सोचा—"सास मुझे ज्यादा मानती हैं।"
धीरे-धीरे दोनों बहुएँ, यह सोचकर कि सास उन्हें ज्यादा मानती हैं, उनकी सेवा करने लगीं। चाय, खाना, दवाई—सब समय पर।
एक महीने बाद श्यामा देवी ने सुमित को अपने कमरे में बुलाकर कहा,
"बेटा, ये पचास हजार रुपये हैं, संभालकर रख ले। अमित को मत बताना, वरना नाराज़ हो जाएगा।"
सुमित को लगा मां को वही सबसे प्यारा है, और उसने माँ की सेवा में और मेहनत बढ़ा दी।
कुछ समय बाद उन्होंने अमित को भी उतने ही पैसे देकर वही बात कही। अमित भी अंदर से खुश हो गया और माँ के लिए हर ज़रूरत का इंतज़ाम करने लगा।
अब घर का माहौल बदलने लगा। बहुएँ आपस में पहले जितना झगड़ती थीं, उतना अब नहीं झगड़तीं, क्योंकि दोनों अपने-अपने मन में सोचती थीं कि सास उन्हें ज्यादा मानती हैं। बेटे भी अपने-अपने मन में यही सोचते कि मां उन्हें ज्यादा प्यार करती हैं।
श्यामा देवी का मकसद साफ था—लालच नहीं, लेकिन अपने लिए जगह और सम्मान बनाए रखना।
तीन साल इस तरह बीत गए। इस दौरान श्यामा देवी ने धीरे-धीरे अपने सारे गहने, नकदी, और ज़मीन से होने वाली आमदनी बेटों-बहुओं में बराबर-बराबर बाँट दी, लेकिन किसी को एक-दूसरे के हिस्से का पता नहीं चलने दिया।
उनका स्वास्थ्य भी अब कमजोर पड़ने लगा था।
एक दिन उन्होंने सबको अपने कमरे में बुलाया और गंभीर स्वर में कहा,
"मेरे पास अब भी कुछ है, जो मैं अपने जाने के बाद तुम्हें दूँगी। वो तिजोरी में है। चाबी मैं सही समय पर दूँगी।"
यह सुनकर सबको लगा कि अभी भी मां के पास अच्छा-खासा धन या गहने बचे हैं। इस सोच में सब और भी सेवा-भाव से लग गए।
कुछ महीने बाद श्यामा देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टर ने कह दिया कि अब समय कम है। उन्होंने बेटों-बहुओं को पास बुलाकर कहा,
"मेरे जाने के बाद तिजोरी खोल लेना और आपस में बराबर-बराबर बाँट लेना।"
कुछ ही दिनों में श्यामा देवी का निधन हो गया। घर में शोक का माहौल था, लेकिन साथ ही सबके मन में यह भी था कि तिजोरी में क्या होगा।
जब तिजोरी खोली गई, तो उसमें सिर्फ दो संपत्ति के कागज़ थे—एक खेत अमित के नाम और दूसरा खेत सुमित के नाम। साथ में एक पत्र था—
"मेरे प्यारे बच्चों,
मैंने अपने जीते-जी अपने गहने, नकदी और ज़मीन से होने वाली आमदनी बराबर-बराबर बांट दी थी। तुम्हें कभी एक-दूसरे के हिस्से का पता नहीं चलने दिया, ताकि तुम सब मेरे साथ रहने और मेरी सेवा करने में मन लगाओ।
ये दोनों खेत भी मैंने बराबर बाँट दिए हैं—एक अमित के नाम, एक सुमित के नाम।
मेरे लिए सबसे बड़ी संपत्ति यह है कि तुम दोनों भाई और बहुएँ मिल-जुलकर रहो। मेरे जाने के बाद भी घर की दीवारें खामोश न हों, उनमें हँसी-खुशी की गूंज बनी रहे।"
पत्र पढ़कर सबकी आँखें भर आईं। उन्हें एहसास हुआ कि मां ने कितनी दूरदर्शिता और प्यार से घर को संभाला, और बंटवारे को इस तरह किया कि न किसी को शक हुआ, न लड़ाई हुई।
अमित ने सुमित का हाथ पकड़कर कहा, "भाई, मां सच में महान थीं। अब हम मां की इस अमानत—अपने रिश्ते—को हमेशा संभालकर रखेंगे।"
घर में पहली बार बहुत दिनों बाद सब साथ बैठकर खाना खा रहे थे, और दीवारों पर फिर से हँसी की परछाइयाँ लौट आई थीं।
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