अपने हिस्से की धूप

 सुबह के नौ बजे थे। छत पर सूरज की हल्की धूप फैल चुकी थी। जानकी देवी दोनों हाथों में धोए हुए कपड़े लेकर छत पर आईं। धीरे-धीरे एक-एक कपड़ा फैलाती जातीं और हर बार आसमान की ओर देखतीं। आंखें कुछ ढूंढतीं, शायद खुद से ही सवाल करतीं — “कहां खो गया वो वक्त जब यही धूप अपने हिस्से की गर्मजोशी लेकर आती थी?”

नीचे आकर देखा, दाल उबल रही थी और बगल में मटके में रखा पानी पीने के लिए उनके पति दयाशंकर जी बैठ चुके थे। रिटायरमेंट के बाद जीवन जैसे थम गया था, लेकिन उम्र से ज़्यादा उन्हें थकाया था अपनों की बेरुखी ने।

दयाशंकर जी दो बेटों के पिता थे — मनोज और दीपक। दोनों शादीशुदा, दोनों पढ़े-लिखे और शहर की एक बड़ी कंपनी में जॉब करने वाले। कई साल पहले उन्होंने अपने मकान का ऊपरी हिस्सा दोनों बेटों को दे दिया था और खुद नीचे के दो कमरों में रहना शुरू कर दिया था।

जब बंटवारे की बात आई थी, दयाशंकर जी ने रसोई का बंटवारा जानबूझकर नहीं किया था। बोले थे, “खाना साथ बनेगा तो मन भी जुड़ा रहेगा।”

लेकिन वक्त के साथ-साथ वह रसोई अब ‘जिम्मेदारी’ बन चुकी थी। बहुएं बारी-बारी से आकर खाना बनातीं और अपने हिस्से की थाली ले जाकर ऊपर चली जातीं। दयाशंकर और जानकी को बस बचा हुआ खाना ही मिलता था — अगर कुछ बचा हो तो।

कुछ महीनों से जानकी देवी की तबीयत बिगड़ रही थी। डॉक्टर ने साफ कहा था — “मांजी को शुगर है, दिन में दूध और फल ज़रूरी हैं, नहीं तो कमजोरी और बढ़ेगी।” लेकिन दवाओं के साथ पौष्टिक आहार का इंतज़ाम करना इतना आसान नहीं था जब दोनों बेटों की प्राथमिकता अब खुद का परिवार हो चुका हो।

दयाशंकर जी हर महीने की पेंशन से बिजली, पानी और दवाइयों का खर्चा निकालते थे। बचता कुछ नहीं था, लेकिन उन्होंने कभी बेटे से पैसे नहीं मांगे, कभी शिकायत नहीं की।

एक शाम जब जानकी देवी ने चुपचाप बिना दूध के हल्दी वाला पानी पिया, दयाशंकर जी समझ गए कि अब उन्हें अपने हिस्से की धूप खुद तलाशनी होगी।

अगले दिन उन्होंने पास की दूध डेयरी से एक लिटर दूध और कुछ सेब खरीद लिए। दोनों बहुओं को यह पसंद नहीं आया। दीपक की पत्नी सीमा ने ताना कसते हुए कहा, “बाबूजी को अब अपने खर्चे खुद उठाने की आज़ादी चाहिए, तो फिर खाना भी खुद ही बना लिया करें।”

दयाशंकर जी मुस्कराए, “बिलकुल, अब हमें किसी पर बोझ नहीं बनना है।”

उसी शाम उन्होंने दोनों बेटों को बैठक में बुलाया और कहा, “आज से नीचे की रसोई सिर्फ हमारी होगी। आप लोग अपने हिस्से में अलग रसोई बना लीजिए। हम अपने लिए खुद खाना बनाएंगे। इस उम्र में ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम खुद का सम्मान खुद संभालें।”

मनोज कुछ कहने ही वाला था कि जानकी देवी ने हाथ उठाकर कहा, “बच्चों, जो समय हमने तुम्हारे बचपन को सजाने में लगाया, वही समय अब हमें अपनी बुढ़ापे को संवारने में लगाना है।”

दीपक शर्मिंदा हो उठा, “मां... हमें माफ कर दो। शायद हम अपने आप में इतना उलझ गए कि आपके हिस्से की मुस्कान भी छीन ली।”

दयाशंकर जी ने कहा, “माफ करना नहीं, बस समझना जरूरी है बेटा। आज हम अपना हिस्सा नहीं मांग रहे, हम सिर्फ अपने आत्मसम्मान को वापस ला रहे हैं। रिश्ते बोझ नहीं होते, मगर जब उनमें एहसान जुड़ जाएं तो वो बोझ बन जाते हैं।”

उस दिन पहली बार जानकी देवी ने अपनी पसंद की दाल बनाई — गरमागरम, बिना हिसाब-किताब के। पहली बार उन्होंने अपने ही हाथों से बनाकर दयाशंकर जी को परोसा।

और अगले दिन छत पर जब जानकी देवी कपड़े फैला रहीं थीं, महरी के साथ बातें करती रहीं और अचानक मुस्करा उठीं। अब धूप फिर से अपनी थी। अपने हिस्से की।


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